चंपा का फूल- रवींद्र नाथ ठाकुर


आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|
आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Champa Flower’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

चंपा का फूल

कल्पना करो कि मैं, बस ऐसे ही आनंद लेने के लिए-
चंपा का फूल बन जाता, और किसी वृक्ष की ऊंची शाखा पर खिलता,
और हवा के साथ, मुक्त हंसी के साथ हिलता, और
नई-नई निकली कोंपलों के ऊपर नृत्य करता,
तब क्या तुम मुझे पहचान पातीं मां?

तुम आवाज लगातीं, “बच्चे, कहाँ हो तुम?”
और मैं भीतर ही भीतर हंसता और चुप रहता।
मैं चालाकी से अपनी पंखुड़ियां खोलता,
और तुम्हे काम में लगे हुए देखता।

जब तुम स्नान करने के बाद,
गीले केश अपने कंधों पर बिखराए हुए,
चंपा वृक्ष की छाया में चलते हुए, छोटे से आंगन में आतीं,
जहाँ तुम अपनी प्रातः वंदना करती हो,
तुम इस पुष्प की गंध तो महसूस करतीं,
परंतु नहीं जान पातीं, कि यह गंध मुझसे आ रही है।

और जब दोपहर के भोजन के बाद,
तुम खिड़की के पास बैठकर-
रामायण पढ़ोगी, और वृक्ष की छाया तुम्हारे केशों और आंचल पर पड़ेगी,
मैं अपनी छोटी सी छाया उस पृष्ठ पर, ठीक वहाँ डालूंगा, जहाँ तुम पढ़ रही होवोगी,
लेकिन क्या तुम पहचान पाओगी कि यह तुम्हारे बच्चे की नन्ही सी छाया है?
और जब संध्या वेला में, जब तुम अपने हाथ में जलता दीपक लेकर
गाय के अहाते में जाओगी, तब मैं अचानक धरती पर कूद जाऊंगा
और फिर से तुम्हारा बच्चा बन जाऊंगा, और तुमसे कहूंगा
कि मुझे तुम कहानी सुनाओ।
“कहाँ थे तुम अब तक, मेरे शैतान बच्चे?” तुम कहोगी,
“मैं तुमको नहीं बताऊंगा, मां”
यही है जो तुमको और मुझको उस समय करना चाहिए।


रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Champa Flower

Supposing I became a chanpa flower,
just for fun, and grew on a
branch high up that tree, and shook
in the wind with laughter and
danced upon the newly budded leaves,
would you know me, mother?
You would call, “Baby, where are you?”
and I should laugh to
myself and keep quite quiet.
I should slyly open my petals
and watch you at your work.
When after your bath, with wet hair
spread on your shoulders,
you walked through the shadow
of the champa tree to the little court
where you say your prayers,
you would notice the scent of the
flower, but not know that it cane from me.
When after the midday meal you sat at the window reading
ramayana, and the tree’s shadow
fell over your hair and your lap,
I should fling my wee little shadow
on to the page of your book,
just where you were reading.
But would you guess that it was
the tiny shadow of your
little child?
When in the evening you went
to the cow shed with the lighted
lamp in your hand I should
suddenly drop on to the earth again and
be your own baby once more,
and beg you to tell me a story.
“Where have you been, you naughty child?”
“I won’t tell you, mother.”
That’s what you and I would say
then.

Rabindranath Tagore

नमस्कार|
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