झर गये पात!

लंबे समय के बाद आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| बैरागी जी ने अत्यंत गरीबी की स्थिति से अपना जीवन प्रारंभ किया था और अपने परिश्रम के बल पर वे एक सांसद बने और संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य भी बने| मैंने दिल्ली में रहते हुए कुछ समय तक अपने एक मित्र की पूंजी के बल पर बच्चों की एक पत्रिका ‘कलरव’ का प्रकाशन किया था, उसके लिए भी उन्होंने बड़ी उदारता से अपनी प्रतिक्रिया और शायद रचनाएं भी भेजी थीं| यद्यपि यह बहुत पुराना प्रसंग है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की यह रचना, जो वृद्धावस्था में व्यक्ति की असहायता और अशक्तता को दर्शाती है –

झर गये पात

बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी ?

नव कोंपल के आते-आते
टूट गये सब के सब नाते
राम करे इस नव पल्लव को
पड़े नहीं यह पीड़ा सहनी

झर गये पात
बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी ?

कहीं रंग है, कहीं राग है
कहीं चंग है, कहीं फ़ाग है
और धूसरित पात नाथ को
टुक-टुक देखे शाख विरहनी
झर गये पात
बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी ?

पवन पाश में पड़े पात ये
जनम-मरण में रहे साथ ये
“वृन्दावन” की श्लथ बाहों में
समा गई ऋतु की “मृगनयनी”
झर गये पात
बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी ?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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