चूड़ी का टुकड़ा!

आज एक बार फिर से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित एक समय के प्रतिनिधि कवियों काव्य संकलन ‘तारसप्तक’ में शामिल रहे स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में शामिल की हैं| सफलता के संकल्प वाला प्रसिद्ध गीत ‘हम होंगे कामयाब’ भी स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी द्वारा किया गया अनुवाद है|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी की यह कविता –

आज अचानक सूनी-सी संध्या में
जब मैं यों ही मैले कपड़े देख रहा था
किसी काम में जी बहलाने
एक सिल्क के कुर्ते की सिलवट में लिपटा
गिरा रेशमी चूड़ी का छोटा-सा टुकड़ा
उन गोरी कलाइयों में जो तुम पहने थीं
रंग भरी उस मिलन रात में।

मैं वैसा का वैसा ही रह गया सोचता
पिछली बातें
दूज कोर से उस टुकड़े पर
तिरने लगीं तुम्हारी सब तस्वीरें
सेज सुनहली
कसे हुए बन्धन में चूड़ी का झर जाना।
निकल गईं सपने जैसी वे रातें
याद दिलाने रहा सुहाग भरा यह टुकड़ा।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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