मन!

आज फिर से एक बार मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, अवस्थी जी बहुत सरल भाषा में सहजता से अपनी बात कहते थे, जैसे मन से मन का संवाद हो|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत –

मन को वश में करो
फिर चाहे जो करो ।

कर्ता तो और है
रहता हर ठौर है
वह सबके साथ है
दूर नहीं पास है
तुम उसका ध्यान धरो ।
फिर चाहे जो करो ।

सोच मत बीते को
हार मत जीते को
गगन कब झुकता है
समय कब रुकता है
समय से मत लड़ो ।
फिर चाहे जो करो ।


रात वाला सपना
सवेरे कब अपना
रोज़ यह होता है
व्यर्थ क्यों रोता है
डर के मत मरो ।
फिर चाहे जो करो ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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