कुछ तो शर्माई भी होती है!

चमकती है कोई बिजली तो शम-ए-रहगुज़र बनकर,
निगाह-ए-बरहम इनकी कुछ तो शर्माई भी होती है|

क़तील शिफ़ाई

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