एक बार जो ढल जाएंगे!

आज एक बार फिर मैं आधुनिक हिन्दी के प्रसिद्ध रचनाकार, अनेक साहित्यिक पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित माननीय श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| जैसा मैंने पहले भी बताया है भोपाल में साहित्य और संस्कृति को समर्पित ‘भारत भवन’ की संकल्पना उनकी ही थी|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

एक बार जो ढल जाएँगे
शायद ही फिर खिल पाएँगे।

फूल शब्द या प्रेम
पंख स्वप्न या याद
जीवन से जब छूट गए तो
फिर न वापस आएँगे।
अभी बचाने या सहेजने का अवसर है
अभी बैठकर साथ
गीत गाने का क्षण है।
अभी मृत्यु से दाँव लगाकर
समय जीत जाने का क्षण है।

कुम्हलाने के बाद
झुलसकर ढह जाने के बाद
फिर बैठ पछताएँगे।

एक बार जो ढल जाएँगे
शायद ही फिर खिल पाएँगे।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

Leave a Reply