मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता!

ये क्यूँ बाक़ी रहे आतिश-ज़नो ये भी जला डालो,
कि सब बे-घर हों और मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता|

जावेद अख़्तर

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