दर-ए-ख़ैबर नहीं गिरता!

करना है जो सर मा’रका-ए-ज़ीस्त तो सुन ले,
बे-बाज़ू-ए-हैदर दर-ए-ख़ैबर नहीं गिरता|

क़तील शिफ़ाई

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