वर्षान्त!

आज फिर से मैं आधुनिक हिन्दी के एक प्रमुख कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ जो एक उच्च अधिकारी भी रहे हैं और जैसा मैंने पहले भी लिखा है भोपाल में निर्मित भारत भवन साहित्य एवं संस्कृति कर्मियों के लिए उनकी अमूल्य भेंट है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

वर्षान्त किसी की प्रतीक्षा नहीं करता
मेरी या तुम्हारी।

हरे-हलके बाँसों से
एक दिन अचानक आ
मुट्ठी से अन्तिम बादल बह जाने देगा।

फिर किसी दिन चौंक कर
देखेंगे हम :
अरे, यह खिड़की पर
इन्द्रधनुष कौन रच गया है,
किसने ये ढेर हरसिंगार ला धरे हैं?

वर्षान्त प्रतीक्षा नहीं करता
मेरी या तुम्हारी या किसी की।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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