मैंने तो कुछ धूप के टुकड़े माँगे थे!

हिन्दी के श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| आकाशवाणी, जयपुर में रहते हुए उनसे भेंट करने और गोष्ठियों में उनके साथ काव्य पाठ करने का भी अवसर मिला था| उनकी कुछ पंक्तियाँ जो मैं अक्सर दोहराता हूँ, वे हैं- ‘फ्यूज बल्बों के अदभुद समारोह में, रोशनी को शहर से निकाला गया’ तथा ‘काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी, देखी हमने अपनी सालगिरह देखी’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह सुंदर नवगीत–

मैंने तो कुछ धूप के टुकड़े माँगे थे
तुमने वर्गाकार अन्धेरे भेज दिए ।

मेरी सुबह नक़ाब पहन कर आई है
चितकबरा सूरज बैठा है पर्वत पर
सन्नाटा गूँजा है मेरे होंठों से
फूल नीम के महके मेरी चाहत पर

मैंने तो पुरवा के झोंके माँगे थे
तुमने अन्धड़ केश बिखेरे भेज दिए ।

मैं तट पर बैठा-बैठा यह देख रहा
नदी तुम्हारी कितनी गोरी बाँहें हैं
दो नावें जो तैर रहीं हैं पानी में
यही तुम्हारी जादूगरनी आँखें हैं

नदी, भरोसे मैंने तुमसे माँगे थे
तुमने तो भँवरों के घेरे भेज दिए ।


घिरा खजूरों से मैं एक किनारा हूँ
बहुत टूटकर मैंने चाहा है तुमको
सूखा हो या बाढ़ तुम्हारे होंठों पर
मैंने बाँहें खोल निबाहा है तुमको

मैंने तो अनियन्त्रित धारे माँगे थे
तुमने तो लहरों के फेरे भेज दिए ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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