जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या!

हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने,
इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या|

मुनीर नियाज़ी

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