बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में!

ख़राब सदियों की बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में,
अब इन बे-अंत ख़लाओं में ख़्वाब क्या देते|

मुनीर नियाज़ी

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