करतूतों जैसे ही सारे काम हो गये!

एक बार फिर मैं आज हिन्दी के एक श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय नईम जी का एक सुंदर नवगीत, बिना किसी भूमिका के प्रस्तुत कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नईम जी का यह नवगीत –

करतूतों जैसे ही सारे काम हो गये,
किष्किन्धा में

लगता अपने राम खो गये।

बालि और वीरप्पन से कुछ कहा न जाये,
न्याय माँगते शबरी, शम्बूकों के जाये।
करे धरे सब हवन-होम भी

हत्या और हराम हो गये।

स्वपनों, सूझों की जड़ में ही ज्ञानी मट्ठा डाल रहे हैं,
अपने ही हाथों अपनों पर कीचड़ लोग उछाल रहे हैं।
जनपदीय क्षत्रप कितने ही

आज केन्द्र से वाम हो गये।

देनदारियों की मत पूछो, डेवढ़ी बैठेंगी आवक से,
शायद इसीलिए प्रभु पीछे पड़े हुए हैं मृगशावक के।

वर्तमान रिस रहा तले से,

गत, आगत बदनाम हो गये।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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