जब भी हम ख़ानुमाँ-ख़राब आए!

जल उठे बज़्म-ए-ग़ैर के दर-ओ-बाम,
जब भी हम ख़ानुमाँ-ख़राब आए|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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