ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ!

इक न इक रोज़ कहीं ढूँढ ही लूँगा तुझको,
ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ|

राहत इन्दौरी

Leave a Reply