वैसे भी फ़ुर्सत नहीं मिलती!

हँसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत,
रोने की यहाँ वैसे भी फ़ुर्सत नहीं मिलती|

निदा फ़ाज़ली

Leave a Reply