आवाज़ों के खो जाने का दुख!

आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार श्री अनूप अशेष जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| बाकी कविता अपना परिचय स्वयं देती है|

लीजिए, प्रस्तुत श्री अनूप अशेष जी की यह रचना-

आस-पास की आवाज़ों के खो जाने का
दुख कितना।
खालीपन कितना-कितना?

बाँस-वनों के साँय-साँय
सन्नाटों-सा
सब डूबा-डूबा,
खुद में होकर भी
जाने क्यों
बस्ती का मन ऊबा-ऊबा।

एक टेर थी नदी किनारे
गीला-मन
कितना-कितना?


यह आंतरिक प्रसंग
हुआ जाता
कुछ बाहर,
बूढ़ों से बच्चों तक जुड़ते
पेड़ों के रिश्ते
जैसे घर।

थोड़ी देर हवा का रुकना
काँपा तन
कितना-कितना?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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