बे-कफ़न फिर ये लाश क्यूँ है!

न फ़िक्र कोई न जुस्तुजू है न ख़्वाब कोई न आरज़ू है,
ये शख़्स तो कब का मर चुका है तो बे-कफ़न फिर ये लाश क्यूँ है|

जावेद अख़्तर

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