मुझको तेरी तलाश क्यूँ है!

कभी कभी मैं ये सोचता हूँ कि मुझको तेरी तलाश क्यूँ है,
कि जब हैं सारे ही तार टूटे तो साज़ में इर्तिआ’श क्यूँ है|

जावेद अख़्तर

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