ख़ुद को तराशा है बहुत!

मिरे हाथों की लकीरों के इज़ाफ़े हैं गवाह,
मैंने पत्थर की तरह ख़ुद को तराशा है बहुत|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

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