दहलीज़ पे ऐ ‘नूर’ उजाला है बहुत!

कोई आया है ज़रूर और यहाँ ठहरा भी है,
घर की दहलीज़ पे ऐ ‘नूर’ उजाला है बहुत|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

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