लिए फिरते हैं ज़िंदाँ-ख़ाना हम!

क्या बला जब्र-ए-असीरी है कि आज़ादी में भी,
दोश पर अपने लिए फिरते हैं ज़िंदाँ-ख़ाना हम|

अली सरदार जाफ़री

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