प्रेम दीप

दीपावली के शुभ अवसर पर आज फिर से एक छोटी सी पुरानी पोस्ट दोहरा रहा हूँ|

एक बार फिर दीपावली के बहाने से बात करते हैं|

आप सभी जानते हैं दीपावली हिंदुओं का पवित्र पर्व है| हमारी प्राचीन संस्कृति जिसे हम सामान्यतः भारतीय अथवा व्यापक रूप से हिन्दू संस्कृति के नाम से जानते है, यह संस्कृति दुनिया में निराली है| कितने ही महान संत, महात्मा और धर्म गुरू हुए हैं हमारे यहाँ|

हम कभी विश्व गुरू कहलाते रहे हैं, हमने पूरी दुनिया को प्रेम का संदेश दिया है| हमारे एक प्रतिनिधि जब विदेश में जाकर, विभिन्न देशों के विद्वानों और सामान्य जनों को ‘भाइयों और बहनों’ कहकर संबोधित करते हैं, तब सब चकित रह जाते हैं| वे ऐसा सोच ही नहीं पाते थे कि हम सब दुनिया वाले भाई बहन हैं| हम सदा से सबके सुख और कल्याण की कामना करते रहे हैं|

जिस बात का उल्लेख मैं यहाँ करना चाह रहा हूँ वह यही है कि आज कुछ लोग हिन्दू धर्म के रक्षक बनकर, हमारी संस्कृति और सभ्यता का विकृत और वीभत्स रूप प्रस्तुत कर रहे हैं| ऐसे लोगों से आज वास्तव में हिन्दू धर्म को खतरा है!

कुछ लोग कह सकते हैं कि दूसरे धर्मों में भी ऐसे लोग हैं, होंगे मैं इनकार नहीं करता, उनसे कानून द्वारा निपटा जा सकता है, लेकिन जो लोग आज विभिन्न हिन्दू सेना, बजरंग दल आदि के नाम से, धर्म रक्षा के नाम पर गुंडागर्दी करते हैं, उनके साथ सख्ती से निपटा जाना जरूरी है|

गाय की हत्या होने पर मुझे दुख होता है, लेकिन उससे कहीं अधिक दुख मुझे तब होता है, जब ऐसे किसी आरोप में किसी इंसान की हत्या कर दी जाती है|

बातें बहुत सी है कहने के लिए, लेकिन अंत यहाँ मैं रमानाथ अवस्थी जी के शब्दों में यही कहूँगा

जो तुझमें है वो सब में है,
जो सब में है वो तुझ में है,
इसलिए प्यार को धर्म बना,
इसलिए धर्म को प्यार बना|

इसके साथ ही दीपावली पर नीरज जी का लिखा एक गीत भी यहाँ शेयर कर लेता हूँ-

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए|

नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,
भले ही दिवाली यहां रोज आए।

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,
उतर क्यों न आएं नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अंधेरे घिरे जब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

पुनः दीपावली की मंगल कामनाएं|

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 


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