सुमिरो ना मन!

आज एक बार फिर मैं अपने एक प्रिय कवि और नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| श्री मिश्र जी की रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और उनके बारे में काफी चर्चा भी की है|

लीजिए, आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह सुंदर नवगीत –

चंदन के गाछ बने
हाशिए बबूल के
सुमिरो न मन मेरे
बीते दिन भूल के ।

एक हँसी झलकी थी होंठों पर
आग-सी
धुँआ-धुँआ हुई ज़िन्दगी
काले नाग-सी
अनगिनत विशाखाएँ
दहक उठीं याद की
पैताने सो गईं
दिशाएँ अनुराग की

पंखड़ियाँ नोच रहीं
आंधियाँ ख़ुमार की
टूटेंगे क्या रिश्ते
गंध और फूल के?

छूट गए दूर कहीं
इन्द्रधनुष नीड़ के
रेत-रेत दिखे
जहाँ जंगल थे चीड़ के
जुड़े हुए हाथ औ’
असीस की तलाश में
थके हुए पाँव
बुझे चेहरे हैं भीड़ के

तैर रही तिनके-सी
पतवारें नाव की
काँप रहे लहरों पर
साए मस्तूल के ।


विशाखा=सबसे अधिक दाहक क्षेत्र;
मस्तूल=नाव या जलयान के बीच में खड़ा वह ऊँचा स्तम्भ, जिस पर पाल पाल बांधा जाता है ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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