उड़ने दे घनश्याम गगन में!

स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी जी अपने युग के एक महत्वपूर्ण कवि थे, जिन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा पद्मभूषण जैसे विशिष्ट सम्मान भी प्राप्त हुए थे|
लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी जी की यह कविता –

उड़ने दे घनश्याम गगन में|

बिन हरियाली के माली पर
बिना राग फैली लाली पर
बिना वृक्ष ऊगी डाली पर
फूली नहीं समाती तन में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!

स्मृति-पंखें फैला-फैला कर
सुख-दुख के झोंके खा-खाकर
ले अवसर उड़ान अकुलाकर
हुई मस्त दिलदार लगन में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!

चमक रहीं कलियाँ चुन लूँगी
कलानाथ अपना कर लूँगी
एक बार ’पी कहाँ’ कहूँगी
देखूँगी अपने नैनन में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!

नाचूँ जरा सनेह नदी में
मिलूँ महासागर के जी में
पागलनी के पागलपन ले–
तुझे गूँथ दूँ कृष्णार्पण में
उड़ने दे धनश्याम गगन में!


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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