बहारों ने भी दिल तोड़ दिया है!

माना कि थी ग़मगीन कली ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ से,
चुप रह के बहारों ने भी दिल तोड़ दिया है|

महेश चंद्र नक़्श

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