ख़त्म हो जाना समझ बैठे थे हम!

कान बजते हैं मोहब्बत के सुकूत-ए-नाज़ को,
दास्ताँ का ख़त्म हो जाना समझ बैठे थे हम|

फ़िराक़ गोरखपु
री

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