दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम!

बे-नियाज़ी को तिरी पाया सरासर सोज़ ओ दर्द,
तुझ को इक दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम|

फ़िराक़ गोरखपुरी

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