झरना!

आज हिन्दी कविता में छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ रहे स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ| मैंने पहले भी उनकी कुछ रचनाएं शेयर की हैं| ‘कामायनी’, ‘आँसू’ आदि उनकी कालजयी रचनाएं हैं|

लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह कविता –

तिरस्कार कालिमा कलित हैं,
अविश्वास-सी पिच्छल हैं।
कौन कसौटी पर ठहरेगा?
किसमें प्रचुर मनोबल है?

तपा चुके हो विरह वह्नि में,
काम जँचाने का न इसे।
शुद्ध सुवर्ण हृदय है प्रियतम!
तुमको शंका केवल है॥

बिका हुआ है जीवन धन यह
कब का तेरे हाथो मे।
बिना मूल्य का, है अमूल्य यह
ले लो इसे, नही छल है।

कृपा कटाक्ष अलम् हैं केवल,
कोरदार या कोमल हो।
कट जावे तो सुख पावेगा,
बार-बार यह विह्वल है॥

सौदा कर लो बात मान लो,
फिर पीछे पछता लेना।
खरी वस्तु हैं, कहीं न इसमें
बाल बराबर भी बल है ॥


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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