माँ!

आज मैं श्री रामदरश मिश्र जी की माँ के बारे में लिखी गई एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस छोटी सी कविता ने मुझे काफी प्रभावित किया है| मैंने श्री रामदरश मिश्र जी की कुछ कविताएं पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता –

चेहरे पर
कुछ सख्त अँगुलियों के दर्द-भरे निशान हैं
और कुछ अँगुलियाँ
उन्हें दर्द से सहलाती हैं।

कुछ आँखें
आँखों में उड़ेल जाती हैं रात के परनाले
और कुछ आँखें
उन्हें सुबह के जल में नहलाती हैं।

ये दर्द-भरी अँगुलियाँ
ये सुबह-भरी आँखें
जहाँ कहीं भी हैं
मेरी माँ हैं।

माँ, जब तक तुम हो
मैं मरूँगा नहीं।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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