ये ज़ुल्म न ढाओ इंशा-जी!

जितने भी यहाँ के बासी हैं सब के सब तुमसे प्यार करें,
क्या उनसे भी मुँह फेरोगे ये ज़ुल्म न ढाओ इंशा-जी|

क़तील शिफ़ाई

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