उम्र ज्यों—ज्यों बढ़ती है!

आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक छोटी सी लेकिन प्रभावशाली कविता शेयर कर रहा हूँ, बढ़ती उम्र के बारे में एक अलग ही नजरिया इसमें प्रस्तुत किया गया है| सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता –


उम्र ज्यों—ज्यों बढ़ती है
डगर उतरती नहीं
पहाड़ी पर चढ़ती है.
लड़ाई के नये—नये मोर्चे खुलते हैं
यद्यपि हम अशक्त होते जाते हैं घुलते हैं.
अपना ही तन आखिर धोखा देने लगता है
बेचारा मन कटे हाथ —पाँव लिये जगता है.
कुछ न कर पाने का गम साथ रहता है
गिरि शिखर यात्रा की कथा कानों में कहता है.
कैसे बजता है कटा घायल बाँस बाँसुरी से पूछो—
फूँक जिसकी भी हो, मन उमहता, सहता, दहता है.
कहीं है कोई चरवाहा, मुझे, गह ले.
मेरी न सही मेरे द्वारा अपनी बात कह ले.
बस अब इतने के लिए ही जीता हूँ
भरा—पूरा हूँ मैं इसके लिए नहीं रीता हूँ.


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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