फ़क़त नक़्श-ब-दीवार नहीं हूँ!

इस ख़ाना-ए-हस्ती से गुज़र जाऊँगा बे-लौस,
साया हूँ फ़क़त नक़्श-ब-दीवार नहीं हूँ|

अकबर इलाहाबादी

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