नासमझ हवा पूछ रही है इक पता!

शाम की ना-समझ हवा पूछ रही है इक पता,
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मिरा ख़याल भी|

परवीन शाकिर

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