तिश्नगी तो मुझे ज़िंदगी से प्यारी है!

इसी से जलते हैं सहरा-ए-आरज़ू में चराग़,
ये तिश्नगी तो मुझे ज़िंदगी से प्यारी है|

वसीम बरेलवी

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