दीमकों के नाम हैं!

आज मैं, श्रेष्ठ कवि और मंच संचालक श्री शिव ओम अम्बर जी की लिखी एक हिन्दी ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ| कविता अपनी श्रेष्ठता की गवाही स्वयं देती है, वैसे यह रचना भी कविता के क्षेत्र में फैली अराजकता को लेकर है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री शिव ओम अम्बर जी की यह ग़ज़ल –

दीमकों के नाम हैं वंसीवटों की डालियाँ,
नागफनियों की क़नीजें हैं यहाँ शेफालियाँ।

छोड़कर सर के दुपट्टे को किसी दरगाह में,
आ गई हैं बदचलन बाज़ार में कव्वालियाँ।

गाँठ की पूँजी निछावर विश्व पे कर गीत ने,
भाल अपने हाथ से अपनी लिखीं कंगालियाँ।

पूज्य हैं पठनीय हैं पर आज प्रासंगिक नहीं,
सोरठे सिद्धान्त के आदर्श की अर्धालियाँ।


इस मोहल्ले में महीनों से रही फ़ाक़ाक़शी,
इस मोहल्ले को मल्हारें लग रही हैं गालियाँ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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