अब हैं पशेमाँ तुम से ज़ियादा!

अहद-ए-वफ़ा यारों से निभाएँ नाज़-ए-हरीफ़ाँ हँस के उठाएँ,
जब हमें अरमाँ तुमसे सिवा था अब हैं पशेमाँ तुम से ज़ियादा|

मजरूह सुल्तानपुरी

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