युवा जंगल!

आधुनिक हिन्दी कवि और भारत सरकार की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में किसी समय अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| मैंने पहले भी अशोक वाजपेयी जी की कुछ कविताएं शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

एक युवा जंगल मुझे,
अपनी हरी पत्तियों से बुलाता है।
मेरी शिराओं में हरा रक्त बहने लगा है
आँखों में हरी परछाइयाँ फिसलती हैं
कंधों पर एक हरा आकाश ठहरा है
होंठ मेरे एक हरे गान में काँपते हैं :
मैं नहीं हूँ और कुछ
बस एक हरा पेड़ हूँ
– हरी पत्तियों की एक दीप्त रचना!
ओ युवा जंगल
बुलाते हो
आता हूँ
एक हरे बसंत में डूबा हुआ
आऽताऽ हूं…।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

Leave a Reply