
जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए,
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए|
जाँ निसार अख़्तर
आसमान धुनिए के छप्पर सा
जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए,
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए|
जाँ निसार अख़्तर