प्यासों की इक बस्ती है!

रंग हवा से छूट रहा है मौसम-ए-कैफ़-ओ-मस्ती है,
फिर भी यहाँ से हद्द-ए-नज़र तक प्यासों की इक बस्ती है|

राही मासूम रज़ा

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