किरण धेनुएं!

आज मैं ज्ञानपीठ पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मानों से अलंकृत किए गए स्वर्गीय नरेश मेहता जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| मेहता जी की रचना मैं आज पहली बार शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेश मेहता जी की यह सुंदर कविता –


उदयाचल से किरन-धेनुएँ
हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला।

पूँछ उठाए चली आ रही
क्षितिज जंगलों से टोली
दिखा रहे पथ इस भूमा का
सारस, सुना-सुना बोली

गिरता जाता फेन मुखों से
नभ में बादल बन तिरता
किरन-धेनुओं का समूह यह
आया अन्धकार चरता,
नभ की आम्रछाँह में बैठा बजा रहा वंशी रखवाला।

ग्वालिन-सी ले दूब मधुर
वसुधा हँस-हँस कर गले मिली
चमका अपने स्वर्ण सींग वे
अब शैलों से उतर चलीं।

बरस रहा आलोक-दूध है
खेतों खलिहानों में
जीवन की नव किरन फूटती
मकई औ’ धानों में
सरिताओं में सोम दुह रहा वह अहीर मतवाला।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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4 Comments

    1. shri.krishna.sharma says:

      Thanks a lot ji

    1. shri.krishna.sharma says:

      Thanks a lot ji

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