दिन दिवंगत हुए!

मेरे लिए बड़े भाई और गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी ने बहुत सुंदर गीत लिखे हैं और हम युवावस्था में उनके गीत गुनगुनाते रहते थे, जैसे- ‘जितनी दूर नयन से सपना, जितनी दूर अधर से हँसना, बिछुए जितनी दूर कुँवारे पाँव से, उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की यह रचना –

रोज़ आँसू बहे रोज़ आहत हुए
रात घायल हुई, दिन दिवंगत हुए!

हम जिन्हें हर घड़ी याद करते रहे
रिक्त मन में नई प्यास भरते रहे
रोज़ जिनके हृदय में उतरते रहे
वे सभी दिन चिता की लपट पर रखे
रोज़ जलते हुए आख़िरी ख़त हुए
दिन दिवंगत हुए!

शीश पर सूर्य को जो सँभाले रहे
नैन में ज्योति का दीप बाले रहे
और जिनके दिलों में उजाले रहे
अब वही दिन किसी रात की भूमि पर
एक गिरती हुई शाम की छत हुए!
दिन दिवंगत हुए!


जो अभी साथ थे, हाँ अभी, हाँ अभी
वे गए तो गए, फिर न लौटे कभी
है प्रतीक्षा उन्हीं की हमें आज भी
दिन कि जो प्राण के मोह में बंद थे
आज चोरी गई वो ही दौलत हुए।
दिन दिवंगत हुए!

चाँदनी भी हमें धूप बनकर मिली
रह गई जिंन्दगी की कली अधखिली
हम जहाँ हैं वहाँ रोज़ धरती हिली
हर तरफ़ शोर था और इस शोर में
ये सदा के लिए मौन का व्रत हुए।
दिन दिवंगत हुए!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वो जो इक शख़्स था वही है अभी!

ऐसा लगता है ख़ल्वत-ए-जां में,
वो जो इक शख़्स था वही है अभी|

अहमद फ़राज़

मुड़ मुड़ के देखती है अभी!

ज़िन्दगी कू-ए-ना-मुरादी से,
किसको मुड़ मुड़ के देखती है अभी|

अहमद फ़राज़

बर्फ़ सी दिल पे गिर रही है अभी!

मैं भी किस वादी-ए-ख़याल में था,
बर्फ़ सी दिल पे गिर रही है अभी|

अहमद फ़राज़

ज़ुल्फ़ों में टांकती है अभी!

फ़सले-गुल में बहार पहला गुलाब,
किसकी ज़ुल्फ़ों में टांकती है अभी|

अहमद फ़राज़

दूरियों में भी दिलकशी है अभी!

क़ुरबतें* लाख खूबसूरत हों,
दूरियों में भी दिलकशी है अभी |
*नज़दीकियाँ
अहमद फ़राज़

कैसा मौसम है कुछ नहीं खुलता!

कैसा मौसम है कुछ नहीं खुलता,
बूंदा-बांदी भी धूप भी है अभी|

अहमद फ़राज़

याद का आसरा!

स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ साहित्यकार थे जिनको पद्मश्री सम्मान तथा अनेक साहित्यिक पुरस्कार प्रदान किए गए थे और उन्होंने बच्चों की पत्रिका ‘पराग’ का कुशल संपादन भी किया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का यह गीत –

तेरी याद का ले के आसरा,
मैं कहाँ-कहाँ से गुज़र गया,
उसे क्या सुनाता मैं दास्ताँ,
वो तो आईना देख के डर गया।

मेरे ज़ेहन में कोई ख़्वाब था
उसे देखना भी गुनाह था
वो बिखर गया मेरे सामने
सारा गुनाह मेरे सर गया।

मेरे ग़म का दरिया अथाह है
फ़क़त हौसले से निबाह है
जो चला था साथ निबाहने
वो तो रास्ते में उतर गया।

मुझे स्याहियों में न पाओगे
मैं मिलूंगा लफ़्ज़ों की धूप में
मुझे रोशनी की है जुस्तज़ू
मैं किरन-किरन में बिखर गया।

उसे क्या सुनाता मैं दास्ताँ,
वो तो आईना देख के डर गया।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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