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ब्लॉगिंग के बहाने!

काफी लंबे समय से ब्लॉगिंग से जुड़ा हूँ, बहुत पहले कविताएं लिखा करता था, वे तो लंबे समय से बंद थीं, फिर नौकरी से भी रिटायर हो गया तो सोचा कि कहां इनवॉल्व हुआ जाए, तब इसके लिए ब्लॉगिंग अच्छी लगी और इस बहाने बहुत से क्रिएटिव लोगों से भी जुड़ने का मौका मिला ‘वर्डप्रेस’ पर भी जहां मैं ब्लॉग लिखता हूँ और ‘इन्डीब्लॉगर’ पर भी जहां मैं नियमित रूप से उनको शेयर करता है|

एक बात का अफसोस है कि ‘इन्डीब्लॉगर’ धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है, यह देखकर अच्छा नहीं लगता| बहुत कम लोग अब वहां अपनी ब्लॉग-पोस्ट शेयर करते हैं और उन पर प्रतिक्रिया/वोट करने वाले भी अब नहीं हैं|
एक बात तो मुझसे, मेरी ब्लॉगिंग से जुड़ी है, वह मैं कहना चाहता हूँ, क्योंकि मुझे लगता है कि यह ज़रूरी है|

लगभग एक महीने पहले तक, जबकि ‘इन्डीब्लॉगर’ में अपनी पोस्ट शेयर करने वाले लोग ज्यादा थे, तब मेरी ब्लॉग पोस्ट लगभग हर दिन अथवा दूसरे या तीसरे दिन, ‘इंडिवाइन’ में ‘पॉपुलर पोस्ट्स’ के अंतर्गत प्रदर्शित होती है, अब पोस्ट भी कम आ रही हैं, परंतु शायद पोस्ट्स को चुनने वाले सज्जन बदल गए हैं अथवा उनका मन बदल गया है| पिछले लगभग एक माह से, श्रेष्ठ कविताओं अथवा फिल्मी लिरिक्स से संबंधित मेरी एक भी ब्लॉग-पोस्ट यहाँ प्रदर्शित नहीं हुई है|
मुझे लगा कि यह कहना भी आवश्यक है, क्योंकि इस प्रकार के लोग किसी भी संगठन अथवा संस्थान की प्रगति में सहायक नहीं होते, जो कभी किसी की 4-5 पोस्ट एक साथ प्रदर्शित कर देते हैं और किसी को पूरी तरह ब्लैक-आउट कर देते हैं|

आज यह कहने का मन हुआ, सो कह दिया, क्योंकि हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो है न!

नमस्कार|
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ऐ शरीफ़ इंसानों!

हिंदुस्तान के एक नामवर शायर, जिनका भारतीय फिल्मों के गीत-ग़ज़ल लेखन में भी बहुत बड़ा योगदान है और जो कवि-लेखकों के स्वाभिमान की रक्षा के लिए सदा संघर्ष करते रहे, ऐसे महान शायर और गीतकार स्वर्गीय साहिर लुधियानवी जी की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ|

इस रचना में साहिर साहब ने युद्ध की विभीषिका से परिचित कराया है और बताया है कि अगर दुनिया में जंग न हो और पूरी मानव-जाति शांति से रहे तो उससे बेहतर कुछ नहीं है क्योंकि युद्ध से किसी का भला नहीं होता| लीजिए प्रस्तुत है साहिर जी की यह नज़्म-


खून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ऐ-आदम का खून है आख़िर,
जंग मशरिक में हो या मगरिब में ,
अमन-ऐ-आलम का खून है आख़िर !

बम घरों पर गिरे कि सरहद पर ,
रूह-ऐ-तामीर जख्म खाती है !
खेत अपने जले कि औरों के ,
जीस्त फ़ाकों से तिलमिलाती है !

टैंक आगे बढे कि पीछे हटें,
कोख धरती की बांझ होती है !
फतह का जश्न हो कि हार का सोग,
जिंदगी मय्यतों पे रोती है !


जंग तो खुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी ?
आग और खून आज बख्शेगी
भूख और एहतयाज कल देगी !

इसलिए ऐ शरीफ इंसानों ,
जंग टलती है तो बेहतर है !
आप और हम सभी के आंगन में ,
शमा जलती रहे तो बेहतर है !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मैं सांसों के दो तार लिए फिरता हूँ!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य जगत के अनूठे कवि, किसी समय मंचों की शोभा बढ़ाने वाले और श्रोताओं को झूमने के लिए मजबूर करने वाले, स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसे उन्होंने आत्म-परिचय के रूप में प्रस्तुत किया है|

एक बार फिर से मुझे आकाशवाणी के लिए बच्चन जी का एक इंटरव्यू याद आ रहा है, जिसमें उनके साथ मैं भी मौजूद था| साक्षात्कारकर्ता सुश्री कमला शास्त्री ने कहा कि आपके गीत शायद इसलिए बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि इनकी भाषा बहुत सरल है|


इस पर बच्चन जी ने कहा था कि भाषा का सरल होना इतना आसान नहीं है, इसके लिए इंसान को भीतर से बच्चा बनना पड़ता है| खैर आज प्रस्तुत है बच्चन जी का यह गीत-


मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्‍यार लिए फिरता हूँ;
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ!



मैं स्‍नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्‍यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!


मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;
है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता
मैं स्‍वप्‍नों का संसार लिए फिरता हूँ!


मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्‍न रहा करता हूँ;
जग भ्‍ाव-सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्‍त बहा करता हूँ!

मैं यौवन का उन्‍माद लिए फिरता हूँ,
उन्‍मादों में अवसाद लए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!


कर यत्‍न मिटे सब, सत्‍य किसी ने जाना?
नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्‍या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना!

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्‍वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्‍वी को ठुकराता!


मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिसपर भूपों के प्रसाद न्यौछावर,
मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ!

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्‍यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्‍ती का संदेश लिए फिरता हूँ!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आंसू न बहा फ़रियाद न कर!

आज फिर से मैं हम सबके प्यारे मुकेश जी का गाया एक बहुत सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर सफ़दर आह सीतापुरी जी का लिखा यह गीत मुकेश जी ने फिल्म- ‘पहली नज़र’ के लिए गाया था, इसका संगीत तैयार किया था अनिल बिस्वास जी ने|

इस गीत के साथ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मुकेश जी का गाया पहला गीत था और इस गीत को सुनकर फिल्म के निर्माता ने कहा था कि यह स्वर नायक के व्यक्तित्व से मैच नहीं होता इसलिए किसी और से यह गीत गाने को कहा जाए| मुकेश जी की आंखों में यह सुनकर आंसू आ गए थे, तब संगीतकार अनिल बिस्वास साहब ने उससे कहा था कि लोग आपकी फिल्म को भूल जाएंगे परंतु इस गीत को नहीं भूल पाएंगे|

लीजिए प्रस्तुत है यह गीत जिसके माध्यम से मुकेश जी ने फिल्मी दुनिया में अपनी पहचान बनाई थी-


दिल जलता है तो जलने दे
आंसू ना बहा फ़रियाद ना कर
दिल जलता है तो जलने दे |

तू परदा नशीं का आशिक़ है
यूं नाम-ए-वफ़ा बरबाद ना कर
दिल जलता है तो जलने दे |

मासूम नजर के तीर चला
बिस्मिल को बिस्मिल और बना
अब शर्म-ओ-हया के परदे में
यूं छुप छुप के बेदाद ना कर
दिल जलता है तो जलने दे |


हम आस लगाये बैठे हैं
वो वादा करके भूल गये
या सूरत आके दिखा जाओ
या कह दो हमको याद ना कर
दिल जलता है, दिल जलता है, दिल जलता है …


आज के लिए इतना ही,

नमस्कार
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‘आशा’ से

आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट|

आज भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि जॉन कीट्स की अंग्रेजी भाषा में लिखी गई एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल अंग्रेजी कविता प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


जॉन कीट्स

‘आशा’ से


जब मैं अपने अकेले दिल के साथ बैठा होता हूँ,
और उदासी भरे परिवेश में, घृणापूर्ण विचार दिल को घेर लेते हैं;
जब मेरे ‘मन की आंखों’ के सामने कोई सुंदर स्वप्न नहीं आते हैं,
और जीवन की खाली बंजर जमीन पर कोई फूल नहीं खिलते;
ओ मीठी आशा, मेरे दिल पर आकाशीय मरहम लगा दे,
और अपने चमकीले पंख मेरे माथे पर लहरा दे!

जब कभी भी मैं रात घिरने पर भटकता हूँ,
जहाँ आपस में गुंथी हुई टहनियां चंद्रमा की चमकती किरण को ढक लेती हैं,
क्या निराशा भरे मेरे चिंतन से मुझे डरना चाहिए,
और गुस्सा करना चाहिए, जिससे मेरी सहज प्रसन्नता दूर हो जाए,
चंद्रमा की किरणों के साथ, पत्तों की छत से झांको,
और अपनी उस मित्र- मायूसी को कोसों दूर रखो!

अगर निराशा- मायूसी की जननी,
यह प्रयास करे कि उसकी संतान मेरे लापरवाह दिल पर कब्ज़ा कर ले;
जब, किसी बादल की तरह, वह हवा पर सवार हो जाए,
इस तैयारी के साथ कि मौका मिलते ही वह-
अपने शिकार पर झपट पड़े:
उसका पीछा कर सके, मीठी आशा और दमकते चेहरे के साथ,
और उसे डरा सके, जैसे सुबह डराती है रात को!

जब कभी उन लोगों का भाग्य, जो मुझे बहुत प्रिय हैं,
मेरे भयभीत दिल को निराशा की कहानी सुनाता है,
तब अरी ओ चमकती आंखों वाली आशा,
मेरी रुग्ण कल्पना को खुश करने वाली;
जरा मुझे कुछ देर के लिए, अपने मधुरतम आराम उधार लेने दे:
अपनी स्वर्ग में उपजी चमक मेरे चारों ओर बिखर जाने दे,
और अपने चमकीले पंख मेरे माथे पर लहरा दे!

अगर कभी अप्रिय प्रेम से मेरे हृदय में पीड़ा हो,
क्रूर परिस्थितियों से, अथवा अप्रिय वातावरण से;
अरे तब मुझे सोचने दो कि यह बेकार न जाए,
मैं मध्यरात्रि की वायु में, अपने गीत तैरा सकूं!
मीठी आशा, मेरे दिल पर आकाशीय मरहम लगा दे,
और अपने चमकीले पंख मेरे माथे पर लहरा दे!

आने वाले वर्षों की लंबी कतार सामने है,
मैं नहीं चाहता कि मुझे कभी अपने देश का सम्मान फीका होते देखना पड़े:
अरे, मुझे यह देखने दो कि मेरा देश अपनी आत्मा को बनाए रखे,
उसका गौरव, उसकी स्वतंत्रता और स्वतंत्रता की छाया-मात्र नहीं।
तुम अपनी दमकती आंखों की अद्भुद चमक बरसाओ—
और अपने पंखों की छतरी से मेरा सिर ढककर रखो!

मुझे देश-प्रेमियों की महान विरासत देखने दो,
महान मुक्ति! कितनी महान, सामान्य वेशभूषा में!
राजसत्ता के ज़ुल्मों के सामने लाचार, ,
अपना मस्तक झुकाते हुए, शहीद होने को तैयार:
लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम स्वर्ग से अपने पंखों पर उड़कर आ जाओ,
जिससे पूरा आकाश तुम्हारी चमक से भर जाए!

और जिस तरह, अपनी शानदार चमक से, कोई सितारा
किसी अंधियारे बादल के शिखर को सुनहरा बना देता है;
सुदूर स्वर्ग के घूंघट में आधे ढके चेहरे को चमकाते हुए:
इसलिए,जब निराशापूर्ण विचार मेरी आत्मा को घेर लें,
मधुर आशा, तुम अपना आकाशीय प्रभाव मुझ पर डालो
और अपने चमकीले पंखों को मेरे माथे पर लहराओ!



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



John Keats

To Hope

WHEN by my solitary hearth I sit,
And hateful thoughts enwrap my soul in gloom;
When no fair dreams before my “mind’s eye” flit,
And the bare heath of life presents no bloom;
Sweet Hope, ethereal balm upon me shed,
And wave thy silver pinions o’er my head!

Whene’er I wander, at the fall of night,
Where woven boughs shut out the moon’s bright ray,
Should sad Despondency my musings fright,
And frown, to drive fair Cheerfulness away,
Peep with the moonbeams through the leafy roof,
And keep that fiend Despondence far aloof!

Should Disappointment, parent of Despair,
Strive for her son to seize my careless heart;
When, like a cloud, he sits upon the air,
Preparing on his spell-bound prey to dart:
Chase him away, sweet Hope, with visage bright,
And fright him as the morning frightens night!

Whene’er the fate of those I hold most dear
Tells to my fearful breast a tale of sorrow,
O bright-eyed Hope, my morbidfancy cheer;
Let me awhile thy sweetest comforts borrow:
Thy heaven-born radiance around me shed,
And wave thy silver pinions o’er my head!

Should e’er unhappy love my bosom pain,
From cruel parents, or relentless fair;
O let me think it is not quite in vain
To sigh out sonnets to the midnight air!
Sweet Hope, ethereal balm upon me shed,
And wave thy silver pinions o’er my head!

In the long vista of the years to roll,
Let me not see our country’s honour fade:
O let me see our land retain her soul,
Her pride, her freedom; and not freedom’s shade.
From thy bright eyes unusual brightness shed—
Beneath thy pinions canopy my head!

Let me not see the patriot’s high bequest,
Great Liberty! how great in plain attire!
With the base purple of a court oppress’d,
Bowing her head, and ready to expire:
But let me see thee stoop from heaven on wings
That fill the skies with silver glitterings!

And as, in sparkling majesty, a star
Gilds the bright summit of some gloomy cloud;
Brightening the half veil’d face of heaven afar:
So, when dark thoughts my boding spirit shroud,
Sweet Hope, celestial influence round me shed,
Waving thy silver pinions o’er my head!



नमस्कार।

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मौला जाने क्या होगा आगे!

पुराने जमाने के अमर फिल्मी गीतों को शेयर करने के क्रम में आज मुकेश जी का गाया एक और नायाब गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो मनोज कुमार जी की फिल्म से है|

लीजिए प्रस्तुत है फिल्म- ‘हरियाली और रास्ता’ के लिए हसरत जयपुरी जी का लिखा यह गीत, जिसका संगीत दिया था शंकर जयकिशन की सुरीली जोड़ी ने और इस गीत को मुकेश जी ने अपने जादुई स्वर से सजाया है-


इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम सारी रात जागे
अल्लाह जाने क्या होगा आगे
मौला जाने क्या होगा आगे
दिल में तेरी उलफ़त के बंधने लगे धागे,
अल्लाह जाने क्या होगा आगे|

क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाए
बिन कहे भी रहा नहीं जाए
रात भर करवट मैं बदलूँ
दर्द दिल का सहा नहीं जाए|
नींद मेरी आँखों से दूर-दूर भागे,
अल्लाह जाने क्या होगा आगे
|

दिल में जागी प्रीत की ज्वाला
जबसे मैंने होश सम्भाला
मैं हूँ तेरे प्यार की सीमा
तू मेरा राही मतवाला
मेरे मन की बीना में तेरे राग जागे,
अल्लाह जाने क्या होगा आगे|

तूने जब से आँख मिलाई
दिल से इक आवाज़ ये आई
चलके अब तारों में रहेंगे
प्यार के हम तो हैं सौदाई
मुझको तेरी सूरत भी चाँद-रात लागे|
अल्लाह जाने क्या होगा आगे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हम चल रहे थे, वो चल रहे थे!

हमारी फिल्मों में भी कविता/गीतों को महत्वपूर्ण स्थान मिला है| फिल्मों की कहानी को आगे बढ़ाने में गीतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है| हमारे समय के अनेक प्रसिद्ध रचनाकारों- कवियों और शायरों ने फिल्मों में अपने गीतों/ग़ज़लों के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया है| फिल्मों एक बात यह भी होती है कि गीत सिचुएशन पर आधारित होते हैं| कहीं प्रेम मे मगन नायक-नायिका, कहीं विरह में तड़पते और भी अनेक रंग होते हैं, जैसे एक रंग आप इस गीत में देखेंगे|

लीजिए आज प्रस्तुत है फिल्म ‘दुनिया ना माने’ के लिए राजिंदर किशन जी का लिखा यह गीत, जिसका संगीत दिया था मदन मोहन जी ने और इस गीत को मुकेश जी ने अपने जादुई स्वर से सजाया है-


हम चल रहे थे, वो चल रहे थे
मगर दुनियावालों के दिल जल रहे थे
हम चल रहे थे—

वही हैं फिज़ायें वही है हवायें
मगर प्यार कि अब नही वो अदायें
बुलायें हम उनको, मगर वो न आयें|
हम चल रहे थे, वो चल रहे थे—

उन्हें भूलकर भी, भुला ना सकूंगा
जो दिल में लगी है बुझा ना सकूंगा
मैं सपनों की दुनिया सजा ना सकूंगा|


हम चल रहे थे, वो चल रहे थे
मगर दुनियावालों के दिल जल रहे थे
हम चल रहे थे—



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हरी हरी दूब पर!

आज मैं भारत के पूर्व प्रधान मंत्री, महान राजनेता, अनूठे वक्ता और एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय वाजपेयी जी ने हर भूमिका में अपनी अमिट छाप छोड़ी है| जहां आज भी हम उनके ऐतिहासिक भाषणों को यदा-कदा सुनते रहते हैं वहीं उनकी कविताएं भी हमें उस महान व्यक्तित्व की याद दिलाती रहती हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता-


हरी हरी दूब पर
ओस की बूंदें
अभी थीं,
अभी नहीं हैं|
ऐसी खुशियाँ
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं|


क्काँयर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में
पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का
पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बूंदों को ढूंढूँ?


सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?
कण-कण में बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?


सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सिर्फ अंगूठे हैं हम लोग!

आज किसी ब्लॉग पोस्ट में ही शेरजंग गर्ग जी का उल्लेख देखा तो सोचा कि उनकी ही रचना आज शेयर की जाए| बहुत पहले जब मैं दिल्ली में रहता था (1980 तक) तब कुछ कवि गोष्ठियों में उनका रचना पाठ सुनने का मौका मिला था, श्रेष्ठ रचनाकार हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री शेरजंग गर्ग जी की लिखी एक ग़ज़ल-

ख़ुद से रूठे हैं हम लोग।
टूटे-फूटे हैं हम लोग॥

सत्य चुराता नज़रें हमसे,
इतने झूठे हैं हम लोग।

इसे साध लें, उसे बांध लें,
सचमुच खूँटे हैं हम लोग।

क्या कर लेंगी वे तलवारें,
जिनकी मूँठें हैं हम लोग।

मय-ख़्वारों की हर महफ़िल में,
खाली घूंटें हैं हम लोग।


हमें अजायबघर में रख दो,
बहुत अनूठे हैं हम लोग।

हस्ताक्षर तो बन न सकेंगे,
सिर्फ़ अँगूठे हैं हम लोग।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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काहे को दुनिया बनाई!

एक बार फिर से आज सामान्य जन के कवि, शैलेन्द्र जी की बात करते हैं और उनके ड्रीम प्रोजेक्ट, फिल्म- ‘तीसरी कसम’ का एक गीत शेयर करूंगा| शैलेन्द्र जी की इस नायाब फिल्म की खास बात यह है कि फणीश्वरनाथ रेणु जी की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर ऐसी फिल्म बनाना एक बहुत बड़ा जोखिम था, जिसे शैलेन्द्र जी ने उठाया और सखा रआज कपूर जी ने , जो ड्रीम मर्चेन्ट थे, भव्य सेट्स पर बनने वाली फिल्मों के लिए जाने जाते थे, उन्होंने इस फिल्म के लिए एक सीधे-सादे देहाती की भूमिका निभाई, और यह भूमिका उन्होंने मांग कर ली, शैलेन्द्र किसी कम प्रसिद्ध कलाकार को यह भूमिका देना चाहते थे, जिसकी ग्लैमरस इमेज न हो, लेकिन मानना पड़ेगा कि रआज कपूर जी ने इस भूमिका के साथ पूरा न्याय किया|

फिल्म के बारे में बहुत सी बातें की जा सकती हैं, फिलहाल मैं जो गीत शेयर कर रहा हूँ, उसकी ही बात करूंगा और उसे शेयर करूंगा| शैलेन्द्र जी के लिखे इस गीत के लिए संगीत शंकर जयकिशन की सुरीली जोड़ी ने दिया है और इसे सीधे-साधे गाड़ीवान बने रआज कपूर पर फिल्माया गया है| गीत में शैलेन्द्र जी ने जैसे एक सरल और निष्कपट ग्रामीण के मन को जैसे खोलकर रख दिया है, किस तरह सरलता के साथ वह ईश्वर से संवाद और शिकायत करता है| बाकी तो गीत अपने आप बयान करता है| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-


दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तूने काहे को दुनिया बनायी|

काहे बनाये तूने माटी के पुतले
धरती ये प्यारी प्यारी मुखड़े ये उजले
काहे बनाया तूने दुनिया का खेला
जिसमें लगाया जवानी का मेला
गुप-चुप तमाशा देखे वाह रे तेरी खुदाई|
काहे को दुनिया बनायी|



तू भी तो तड़पा होगा मन को बनाकर
तूफां ये प्यार का मन में छुपाकर
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी
आंसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी
बोल क्या सूझी तुझको
काहे को प्रीत जगाई
काहे को दुनिया बनायी
तूने काहे को दुनिया बनायी|



प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया
हँसना सिखाया, रोना सिखाया
जीवन के पथ पर मीत मिलाये
मीत मिला के तूने सपने जगाए
सपने जगा के तूने, काहे को दे दी जुदाई
काहे को दुनिया बनायी तूने
दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनाई|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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