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जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत!

आज कैफ़ी आज़मी साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| कैफ़ी साहब एक क्रांतिकारी शायर थे, वे मुशायरों की शान हुआ करते थे और फिल्मों के लिए भी उन्होंने अनेक यादगार गीत लिखे हैं|


लीजिए प्रस्तुत है कैफ़ी साहब की यह रचना –

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे
फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ
बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को
उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ|

रोज़ बसते हैं कई शहर नए
रोज़ धरती में समा जाते हैं,
ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी
वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं|


जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत
न कहीं धूप न साया न सराब,
कितने अरमान हैं किस सहरा में
कौन रखता है मज़ारों का हिसाब|

नब्ज़ बुझती भी भड़कती भी है
दिल का मामूल है घबराना भी,
रात अंधेरे ने अंधेरे से कहा
एक आदत है जिए जाना भी
|

क़ौस इक रंग की होती है तुलू
एक ही चाल भी पैमाने की,
गोशे-गोशे में खड़ी है मस्जिद
शक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की|

कोई कहता था समुन्दर हूँ मैं
और मेरी जेब में क़तरा भी नहीं,
ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ
अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं
|

अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ
कभी क़ुरआँ कभी गीता की तरह,
चन्द रेखाओं में सीमाओं में
ज़िन्दगी क़ैद है सीता की तरह|

राम कब लौटेंगे मालूम नहीं,
काश रावण ही कोई आ जाता
|

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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अरे, लखिय बाबुल मोरे!

अमीर खुसरो जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| खुसरो जी एक सूफी, आध्यात्मिक कवि थे, और ऐसा भी माना जाता है की खड़ी बोली में कविता का प्रारंभ उनसे ही हुआ था| उनका जन्म 1253 ईस्वी में पटियाली में हुआ था और देहांत 1325 ईस्वी में दिल्ली में हुआ|

लीजिए प्रस्तुत है बेटी की विदाई के अवसर से जुड़ी, खुसरो जी की यह रचना, जो आज भी लोकप्रिय है-

काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस|

भैया को दियो बाबुल महले दो-महले
हमको दियो परदेस,
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गैयाँ
जित हाँके हँक जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|

हम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँ
घर-घर माँगे हैं जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


कोठे तले से पलकिया जो निकली
बीरन में छाए पछाड़
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|

हम तो हैं बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़ियाँ
भोर भये उड़ जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


तारों भरी मैंने गुड़िया जो छोडी
छूटा सहेली का साथ
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|

डोली का पर्दा उठा के जो देखा
आया पिया का देस
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस|
अरे, लखिय बाबुल मोरे|



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी !

आज फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में अवस्थी जी ने यही व्यक्त किया है कि हमारी व्यक्तिगत आस्थाएँ, आकांक्षाएँ और धार्मिक रुझान कुछ भी हों, हमारे लिए सबसे पहले देश का स्थान है|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी की यह रचना-



जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तू पूरब का हो या पश्चिम का वासी
तेरे दिल में हो काबा या हो काशी
तू संसारी हो चाहे हो सन्यासी
तू चाहे कुछ भी हो पर भूल नहीं
तू सब कुछ पीछे, पहले भारतवासी ।

उन सबकी नज़रें आज हमीं पर ठहरीं
जिनके बलिदानों से आज़ादी आई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तू महलों में हो या हो मैदानों में
तू आसमान में हो या तहखानों में
पर तेरा भी हिस्सा है बलिदानों में
यदि तुझमें धड़कन नहीं देश के दुख की
तो तेरी गिनती होगी हैवानों में ।

मत भूल कि तेरे ज्ञान सूर्य ने ही तो
दुनिया के अँधियारे को राह दिखाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तेरे पुरखों की जादू भरी कहानी
गौतम से लेकर गाँधी तक की वाणी
गंगा जमना का निर्मल-निर्मल पानी
इन सब पर कोई आँच न आने पाए
सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी ।

भारत का भाल दिनों-दिन जग में चमके
अर्पित है मेरी श्रद्धा और सच्चाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

आज़ादी डरी-डरी है आँखें खोलो
आत्मा के बल को फिर से आज टटोलो
दुश्मन को मारो, उससे मत कुछ बोलो
स्वाधीन देश के जीवन में अब फिर से
अपराजित शोणित की रंगत को घोलो ।

युग-युग के साथी और देश के प्रहरी
नगराज हिमालय ने आवाज़ लगाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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अभागों की टोली अगर गा उठेगी!

स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बातचीत के लहजे में कविता कहने के लिए प्रसिद्ध थे| उन्होंने अनेक बहुमूल्य काव्य संकलन हमें दिए हैं, जिनमें ‘बुनी हुई रस्सी’, ‘गीत फ़रोश’, ‘खुशबू के शिलालेख’, ‘त्रिकाल संध्या’ आदि शामिल हैं और उनके संकलन- ‘बुनी हुई रस्सी’ के लिए उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्रदान किया गया था|

लीजिए प्रस्तुत है भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता-

चलो गीत गाओ, चलो गीत गाओ।
कि गा – गा के दुनिया को सर पर उठाओ।

अभागों की टोली अगर गा उठेगी
तो दुनिया पे दहशत बड़ी छा उठेगी
सुरा-बेसुरा कुछ न सोचेंगे गाओ
कि जैसा भी सुर पास में है चढ़ाओ।


अगर गा न पाए तो हल्ला करेंगे
इस हल्ले में मौत आ गई तो मरेंगे
कई बार मरने से जीना बुरा है
कि गुस्से को हर बार पीना बुरा है

बुरी ज़िन्दगी को न अपनी बचाओ
कि इज़्ज़त के पैरों पे इसको चढ़ाओ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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सूर्यास्त : एक इंप्रेशन

आज एक बार फिर से मैं स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी को आपातकाल में लिखी गई उनकी गज़लों के कारण विशेष रूप से प्रसिद्धि मिली थी, जिनको उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल किया गया था और मैंने उनकी कुछ गज़लें पहले शेयर भी की हैं| आज मैं उनकी अलग तरह की कविता शेयर कर रहा हूँ, जो उन्होंने सूर्यास्त के अनुभव को लेकर लिखी है|


लीजिए प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी की यह कविता-

सूरज जब
किरणों के बीज-रत्न
धरती के प्रांगण में
बोकर
हारा-थका
स्वेद-युक्त
रक्त-वदन
सिन्धु के किनारे
निज थकन मिटाने को
नए गीत पाने को
आया,

तब निर्मम उस सिन्धु ने डुबो दिया,
ऊपर से लहरों की अँधियाली चादर ली ढाँप
और शान्त हो रहा।


लज्जा से अरुण हुई
तरुण दिशाओं ने
आवरण हटाकर निहारा दृश्य निर्मम यह!
क्रोध से हिमालय के वंश-वर्त्तियों ने
मुख-लाल कुछ उठाया
फिर मौन सिर झुकाया
ज्यों – ‘क्या मतलब?’
एक बार सहमी
ले कम्पन, रोमांच वायु
फिर गति से बही
जैसे कुछ नहीं हुआ!


मैं तटस्थ था, लेकिन
ईश्वर की शपथ!
सूरज के साथ
हृदय डूब गया मेरा।
अनगिन क्षणों तक
स्तब्ध खड़ा रहा वहीं
क्षुब्ध हृदय लिए।
औ’ मैं स्वयं डूबने को था
स्वयं डूब जाता मैं
यदि मुझको विश्वास यह न होता –-
‘मैं कल फिर देखूँगा यही सूर्य
ज्योति-किरणों से भरा-पूरा

धरती के उर्वर-अनुर्वर प्रांगण को
जोतता-बोता हुआ,
हँसता, ख़ुश होता हुआ।’


ईश्वर की शपथ!
इस अँधेरे में
उसी सूरज के दर्शन के लिए
जी रहा हूँ मैं
कल से अब तक!


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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चाय-सी ठंडी हँसी, आँखें तराजू!

एक बार फिर से मैं अपने एक प्रिय कवि और नवगीत विधा के प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी ने हर प्रकार के गीत लिखे हैं और वे जुझारूपन और बेबाकी के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है रंजक जी का यह गीत-

मरने दे बन्धु!
उसे मरने दे

एक रोगी की तरह जो दोस्ती
रोज़ खाती है दवाई चार सिक्के की
और फिर चलती बड़े अहसान से
चाल इक्के की
जो अँगूठी
रोज़ उँगली में करकती है
उतरने दे


मोल के ये दिन, मुलाक़ातें गरम
सामने भर का घरेलूपन
चाय-सी ठंडी हँसी, आँखें तराजू,
एक टुकड़ा मन
खोलने इस बन्दगोभी को
एक दिन तो बात करने दे

मरने दे बन्धु!
अरे! मरने दे


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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नए तीर हैं, निशाने ढूँढते हैं !

प्रसिद्ध शायर अहमद फ़राज़ साहब की एक गजल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| फ़राज़ साहब भारतीय उपमहाद्वीप के बहुत मशहूर शायर हैं, वैसे विभाजन के बाद वे पाकिस्तान में रहते थे |

शायरी की दुनिया में फ़राज़ साहब बहुत मशहूर हैं और उनकी अनेक गज़लें जगजीत सिंह जी और गुलाम अली जी ने भी गायी हैं-


किताबों में मेरे फ़साने ढूँढते हैं,
नादां हैं गुज़रे ज़माने ढूँढते हैं ।

जब वो थे, तलाशे-ज़िंदगी भी थी,
अब तो मौत के ठिकाने ढूँढते हैं ।


कल ख़ुद ही अपनी महफ़िल से निकाला था,
आज हुए से दीवाने ढूँढते हैं ।

मुसाफ़िर बे-ख़बर हैं तेरी आँखों से,
तेरे शहर में मैख़ाने ढूँढते हैं ।

तुझे क्या पता ऐ सितम ढाने वाले,
हम तो रोने के बहाने ढूँढते हैं ।


उनकी आँखों को यूँ ना देखो ’फ़राज़’,
नए तीर हैं, निशाने ढूँढते हैं ।



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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तरक्की के पैमाने!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है और मैं 2018 में हुई एक दुखद घटना की प्रतिक्रियास्वरूप लिखी अपनी एक पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

आज हम वर्ष 2018 में जी रहे हैं, सुना है हिंदुस्तान दुनिया की बड़ी ताक़त बन गया, आर्थिक शक्तिसंपन्न देशों में भारत की गिनती होने लगी है। कितने पैमाने होते हैं किसी देश की तरक्की को मापने, उन सबका उदाहरण देते हुए बताया जाता है कि भारतवर्ष कितना आगे बढ़ गया है!

एक बहुत पुराना पैमाना है, गोस्वामी तुलसीदास जी का बताया हुआ-


जासु राज सुन प्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी


और हम रामराज्य की कल्पना करते हैं, एक गाय को मारने अथवा ऐसा प्रयास करने में हमारे यहाँ लोग, कुछ इंसानों को मारने में भी संकोच नहीं करते।
रामराज्य के बारे में एक और उद्धरण गोस्वामी जी का याद आता है-


दैहिक, दैविक, भौतिक तापा
रामराज्य नहीं काहुई व्यापा।

मैं दलगत राजनीति की बात नहीं करना चाहता, सीधे बात करना चाहूंगा- देश की राजधानी दिल्ली में, तीन बच्चे भूख से मर गए। ये किसी भी समाज के लिए डूब मरने की बात है।


दिल्ली में- नगर की, केंद्र शासित क्षेत्र की और केंद्र की, दोनो सरकारें हैं। लेकिन मैं इस घटना को किसी पार्टी अथवा सरकार से नहीं जोड़ना चाहता। सबसे पहली बात तो यह है कि हमारे समाज में, आस-पड़ौस के लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि उनके आस पास किसी परिवार में ऐसी स्थिति है कि बच्चों के भूख से मरने की नौबत आ रही है।


यह तीन बच्चों की नहीं, ये इंसानियत की मौत है, बेशक हमारी सरकारों को भी ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए कि कहीं ऐसी नौबत आने वाली है तो उसको पहचाना जाए और जरूरी कदम उठाए जाएं। और हाँ आस-पड़ौस के लोगों को भी सहायता के लिए तत्पर रहना चाहिए।


आज गुरुदत्त जी की फिल्म का एक गीत याद आ रहा है, जिसे यहाँ शेयर कर रहा हूँ। फिल्म प्यासा के इस गीत को साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है और एस.डी.बर्मन जी के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी साहब ने गाया है। प्रस्तुत है ये गीत-


ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के
कहाँ है, कहाँ है मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है


ये पुरपेच गलियां, ये बदनाम बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदे पे तकरार
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


ये सदियों से बेखौफ़ सहमी सी गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

वो उजले दरीचों में पायल की छन-छन
थकी हारी सांसों पे तबले की धन-धन
ये बेरूह कमरो में खांसी की ठन-ठन
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िक़रे
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवां भी
तनूमन्द बेटे, अब्बा मियां भी
ये बीवी भी है और बहन भी, माँ भी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हम्जिन्स, राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत , जुलेखां की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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खेल का मेरा साथी- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘My Playmate’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

My Playmate!



अब मेरे मुख से , कोई शोर भरे स्वर नहीं निकलेंगे, ऐसी है मेरे स्वामी की इच्छा| अब मैं केवल धीमे स्वर में ही बात करूंगा|
मेरे हृदय की ध्वनि, किसी गीत को गुनगुनाने में ही अभिव्यक्त होगी| लोग तेज़ी से आगे बढ़ते हैं, राजा के बाजार की तरफ, सभी विक्रेता और खरीदार वहाँ हैं| परंतु मुझे असमय ही दूर जाना है, भरी दोपहरी में, कार्य की व्यस्तता के बीच|
चलो फिर पुष्पों को मेरे बगीचे में खिलने दो, यद्यपि ये उनके खिलने का समय नहीं है, और दोपहरी में मधुमक्खियों को अपनी सुस्त धुन में गुनगुनाने दो|
मैंने कितने ही घंटे बिताए हैं, अच्छे और बुरे की पहचान करने में, परंतु अब मेरे पास आनंद है, जब खाली दिनों में मेरे खेल का साथी, मेरे हृदय को अपनी ओर खींचता है, मुझे नहीं मालूम कि अचानक आया यह बुलावा, किस निरर्थक असंगति के लिए है!


-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


My Playmate




No more noisy, loud words from me, such is my master’s will. Henceforth I deal in whispers. The speech of my heart will be carried on in murmurings of a song.
Men hasten to the King’s market. All the buyers and sellers are there. But I have my untimely leave in the middle of the day, in the thick of work.
Let then the flowers come out in my garden, though it is not their time, and let the midday bees strike up their lazy hum.
Full many an hour have I spent in the strife of the good and the evil, but now it is the pleasure of my playmate of the empty days to draw my heart on to him, and I know not why is this sudden call to what useless inconsequence!




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अपनी रात की छत पर, कितना तन्हा होगा चांद!

प्रसिद्ध लेखक, उपन्यासकार, पटकथा लेखक और गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल मैं आज शेयर कर रहा हूँ| उनके उपन्यास – आधा गाँव, दिल एक सादा कागज, टोपी शुक्ला, मैं एक फेरीवाला आदि बहुत प्रसिद्ध हुए थे और बड़ी भावुकता और राजनीति पर पैनी दृष्टि के साथ उन्होंने ये उपन्यास लिखे हैं| उनको पद्मश्री, पद्मभूषण आदि प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था| उनके लिखे कई गीत भी काफी लोकप्रिय हुए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब की ये खूबसूरत ग़ज़ल, जिसे जगजीत सिंह जी ने भी गाया है-

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद,
अपनी रात की छत पर, कितना तन्हा होगा चांद|

जिन आँखों में काजल बनकर, तैरी काली रात,
उन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद|

रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर,
आँगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चांद|

चांद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते,
मेरे बिन किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद|



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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