ए ज़िंदगी, थोड़ा तो दम ले ले!

ज़रूर एक नींद मेरे साथ ए मेहमान अ ग़म ले ले,
सफ़र दरवेश है ए ज़िंदगी, थोड़ा तो दम ले ले|

कैफ़ी आज़मी

मिरे साथ जलते जलते!

शब-ए-इंतिज़ार आख़िर कभी होगी मुख़्तसर भी,
ये चराग़ बुझ रहे हैं मिरे साथ जलते जलते|

कैफ़ी आज़मी

जो कही गई है मुझ से!

जो कही गई है मुझ से वो ज़माना कह रहा है,
कि फ़साना बन गई है मिरी बात टलते टलते|

कैफ़ी आज़मी

यूँही कोई मिल गया था!

यूँही कोई मिल गया था सर-ए-राह चलते चलते,
वहीं थम के रह गई है मिरी रात ढलते ढलते|

कैफ़ी आज़मी

हमने ख़ुद-कुशी कर ली!

वो जिनको प्यार है चाँदी से इश्क़ सोने से,
वही कहेंगे कभी हमने ख़ुद-कुशी कर ली|

कैफ़ी आज़मी

नज़र मिली भी न थी और !

नज़र मिली भी न थी और उन को देख लिया,
ज़बाँ खुली भी न थी और बात भी कर ली|

कैफ़ी आज़मी

काँटों से दोस्ती कर ली!

मिले न फूल तो काँटों से दोस्ती कर ली,
इसी तरह से बसर हम ने ज़िंदगी कर ली|

कैफ़ी आज़मी

विदागीत!

आज मैं आधुनिक हिन्दी कविता के श्रेष्ठ कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता–

भागते हैं,
छूटते ही जा रहे हैं पेड़
पीपल-बेर-बरगद-आम के,
बिछुड़ती पग-लोटती घासें,
खिसकती ही जा रही हैं
रेत परिचय की अनुक्षण,
दूरियों की खुल रही हैं मुट्ठियाँ!
फिर किसी आवर्त्त में बंध
कभी आऊँगा यहाँ
रेत जाने किन तहों तक धँसेगी
परिचय न चमकेगा कभी भी
चुप रहेंगे पेड़-धरती घास सब…
तब मुझे पहचान
छोड़ता हूँ आज जिसको
टेरेगा सहसा क्या
विदा का बूढ़ा-सा पाखी?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जंगल काफ़ी है वहशत के लिए!

बे-हिस दीवारों का जंगल काफ़ी है वहशत के लिए,
अब क्यूँ हम सहरा को जाएँ अब वैसे हालात कहाँ|

राही मासूम रज़ा