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6. परला घर

अपने मोहल्ले में कुछ समय तो और बिताना होगा। आज अपने वकील भाई साहब के बारे में बात कर लेते हैं, जिनके पास हम जाकर बसे थे इस मोहल्ले- भोलानाथनगर, शाहदरा में। वकील साहब मेरे मामा के बेटे होने के नाते मेरे बड़े भाई लगते थे, लेकिन असल में उनके बेटे मेरे हमउम्र, मुझसे एक-दो वर्ष छोटे थे। यहाँ यह भी बता दूं कि मेरे पिताश्री ने अपनी घोर आर्थिक तंगी के दिनों में वकील साहब से कुछ उधार लिया था, यह रकम थी 700 रुपये। इस उधारी का उलाहना मेरे पिता अंत तक झेलते रहे, क्योंकि वो यह रकम नहीं चुका पाए थे। मैंने सुना था कि किसी समय मेरे पिता ने पालम हवाई अड्डे के आसपास कुछ जमीन भी खरीदी थी, लेकिन वो कब और कैसे हाथ से निकल गई, पता ही नहीं चला।

यहाँ अपनी निजी कहानी से अलग एक बात और बता दूं कि शाहदरा या यमुना पार का इलाका अधिकांशतः ऐसा था जहाँ जंगल थे, जमीनों पर लोग कब्ज़ा करते गए और अपनी हिम्मत और बेशर्मी के दम पर धीरे-धीरे खाकपति से करोडपति बनते गए। बस ये करना था कि बीच-बीच में जब चुनाव आएं तब प्रमुख राजनैतिक पार्टियों के झण्डे लगा लें। ऐसे में ईमानदार और कानून का पालन करने वाले लोग वहीं के वहीं रह गए और बे‌ईमान लोग करोड़पति बन गए।

खैर फिर से वकील साहब की बात पर आने से पहले एक प्रसंग बताऊं, मेरे मामाजी, याने वकील साहब के पिता, जो गांव में रहते थे वहाँ आए हुए थे, तभी नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद पर पहुंचे। ये खबर उनको बताने की कोशिश की गई, लेकिन अपनी सहज-बुद्धि से वो इसे मानने को तैयार नहीं हुए। उनका यही कहना था कि वहाँ कोई जाएगा, तो गिर नहीं जाएगा क्या?

वकील साहब राजनीति में भी काफी हद तक सक्रिय थे और कविता भी लिखा करते थे। एक बात और कि पूजा होने पर वे बहुत से भजन भी गाते थे, कुछ भजन मैंने भी उनसे सुनकर याद किए थे।

हम क्योंकि उनके कर्ज़दार थे, इसलिए जब मैं उनके घर जाता था तो भाभी को कोई काम याद आ जाता था, अक्सर भाभी बोलती थीं, किशन भागकर एक किलो चीनी, या चाय या कुछ और लेकर आ जा। वैसे भी हमारा हर रास्ता उनके यहाँ होकर जाता था, परला घर कहते थे हम उनके घर को। हाँ कभी-कभी यह भी होता था, जब हमसे कहा जाता था कि कहीं भी चले जाओ, परले घर मत जाना।

मोहल्ले के एक दो कैरेक्टर रह गए, एक मेरी आयु का मित्र था- विनोद कपूर, हम साथ मिलकर पढ़ाई भी करते थे। उसके पास जासूसी उपन्यासों का खज़ाना रहता था। जैसे एक लेखक थे- इब्ने सफी और उपन्यास होते थे,  चीखती लाशें…  आदि। हम दोनों में एक और प्रतियोगिता थी, ये निर्णय करना मुश्किल था कि दोनों में से कौन ज्यादा कमज़ोर है। दोनो जिसे बोलते हैं सूखी हड्डी। एक बार ऐसा हुआ कि उसके बगल में रहने वाला एक बंगाली लड़का मुझे काटकर चला गया। उस लड़के पर तो मेरा बस नहीं चला, मैंने विनोद से बोलचाल बंद कर दी। इसके बाद जासूसी उपन्यासों की सप्लाई बंद। जब कभी हम आमने-सामने आते, लगता कि मैं बोल पड़ूंगा या वो बोल देगा, लेकिन कई साल तक हम उसी मोहल्ले में रहे, विनोद पिछली गली में था, लेकिन ये चुप्पी नहीं टूटी।

विनोद के पिता कपूर साहब काफी धार्मिक व्यक्ति थे। अक्सर संते की डेयरी में वो दूध लेने आते थे तब उनको देखता था। वो गुनगुनाते रहते थे- ‘दीनदयाल विरिदु संभारी – संते मेरा नंबर है, हरहु नाथ मम संकट भारी – मुझे दूध कब दोगे भाई — ।’ कभी लगता कि उनका संकट यही है कि उनको दूध जल्दी नहीं मिल रहा!

एक और परिवार था पिछली गली में, वे सुनार का काम करते थे, उसमें एक लड़का आनंद याने अन्नू, जब किसी से झगड़ा होता और उसका अक्सर हो जाता था, तब वह बोलता था- ‘अन्नू लाला रूठेगा, बड़े-बड़ों का सिर फूटेगा।’  खैर एक घटना याद आ रही है। उस समय स्वच्छ भारत जैसा कोई अभियान तो था नहीं। शहर का काफी बड़ा हिस्सा जंगल था और वहीं लोग दिशा-मैदान के लिए जाते थे। और यह भी बता दूं जिधर लोग इस शुभ-कर्म के लिए जाते थे, उधर ही एक टेम्प्रेरी सिनेमा बना हुआ था, टीन-टपारे वाला सिनेमा हाल। एक बार अन्नू लाला ने बड़े भाई की जेब से पैसे निकालकर सिनेमा देखने का मन बनाया। जैसे ही वो घर से बाहर निकला, उसको बड़े भाई लोटा लेकर लौटते हुए मिले। पूछा तो दिशा-मैदान का बहाना बना दिया। इस पर भाई ने हाथ में लोटा पकड़ा दिया। अब अन्नू लाला इस धर्म संकट में कि लोटा लेकर सिनेमा देखने कैसे जाएं।

खैर किस्से तो बहुत से हैं, फिर से आते रहेंगे।

जैसा मैंने बताया कि मेरे पिता, वकील साहब के कर्ज़दार थे, जीवन में एक असफल इंसान थे। ईश्वर में आस्था इतनी गहरी थी कि वो उसी से लड़ते रहते थे। नहाते समय हनुमान चालीसा पूरी गाते थे और यदा-कदा भगवान को गालियां देकर अपनी शिकायत भी दर्ज कराते रहते थे।

उन पर कर्ज़ था 700 रुपये, और जो मुसीबतें थीं जीवन में, कई बार मेरे मन में आता है, कि आज की तारीख में मेरे लिए एक-दो लाख रुपये कोई बड़ी बात नहीं है। मैं सोचता हूँ कि अगर टाइम-मशीन जैसी कोई चीज़ होती तो मैं एक-दो लाख लेकर उस कालखंड में चला जाता और पूरे हालात ही बदल जाते।

मैंने कई बार सोचा कि इस विषय पर उपन्यास लिखा जाए कि पैसा लेकर भूतकाल में जाएं और अतीत को बदलकर रख दें। इसमें दो रास्ते हैं, सोना लेकर जाएं हालांकि उसकी कीमत भूतकाल में उतनी नहीं थी। अगर मुद्रा लेकर जाएं तो आज की तारीख के नोटों को समय-समय पर चल रही मुद्राओं के अनुसार बदलना होगा, जिस गवर्नर के हस्ताक्षर उस समय चलते थे उसके अनुसार। तो बीच में स्टेशनों पर रुकते हुए यात्रा करनी होगी।

खैर यह बड़ी सुंदर कल्पना है, लेकिन प्रक्रिया बहुत जटिल है, कल्पनाओं का क्रियान्वयन भी तो सरल होना चाहिए।

दिल भी ये ज़िद पे अड़ा है, किसी बच्चे की तरह,

या तो सब कुछ ही इसे चाहिए, या कुछ भी नहीं।

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मोहल्ला मेरा

अब थोड़ा समय उस मोहल्ले को भी दे दें, जो लगभग 25 वर्ष तक मेरा ठिकाना था। जैसा मैंने अपने पिछले ब्लॉग में लिखा था, दरियागंज छोड़कर हम भोलानाथ नगर, शाहदरा में जाकर बसे और वहाँ पर पहली कक्षा से मेरी पढ़ाई शुरू हुई। भोलानाथ नगर आने का एक कारण यह भी था कि मेरे मामा के बेटे वहाँ रहते थे, वकील साहब! इस प्रकार मेरी मां यहाँ आकर अपने मायके के निकट आ गई थी।

जैसे हम अपनी भाषा को मातृभाषा कहते हैं, क्योंकि मां से सीखते हैं, उसी तरह आस-पड़ौस की पहचान भी हमें मां के द्वारा दी गई शब्दावली में ही होती है। तो हमारे मोहल्ले में हमारे बगल का मकान डाकखाने वालों का था, उसके बाद था वकील साहब का मकान, मेरी मां जिनकी और उनके बहाने पूरे मोहल्ले की बुआ थीं। उसके बाद एक प्लॉट खाली था उस समय, उसके बाद वाले मकान में पंजाब के एक सज्जन थे, जो मां की भाषा में पंजाबी नाम से ही पहचाने जाते थे। हमारे सामने एक बुज़ुर्ग रहते थे, वे मुल्तान से थे। हम उनको मुल्तानी बाबाजी के नाम से जानते थे। उनका ज्योतिष आदि में भी दखल था। उनके परिवार में उनकी पत्नी और आधुनिक बेटियां भी थीं। हर मकान के सामने का भाग एक गली में आता था और पिछला भाग दूसरी गली में। ये मुल्तानी बाबाजी हमारी तरफ घर से निकलते थे और उनका परिवार दूसरी गली से ही घर में आता-जाता था।

उससे अगले घर में एक चबूतरा भी था और उस घर की मालकिन को हमारी मां ने नाम दिया था, चौंतरे (चबूतरे) वाली। चौंतरे वाली का बेटा इंजीयरिंग की पढ़ाई कर रहा था। वह जवान था, देवानंद जैसे बाल रखता था और उसके पास पटरियों पर दौड़ने वाली ट्रेन थी, वैसी मैंने बाद में नहीं देखी, वैसे तो बच्चों के खिलौनों में वह आती ही है। उनके घर में समृद्धि की अच्छी खासी झलक मिलती थी।

एक बात और याद आ रही है, हमारे ही एक रिश्तेदार हैं, जो सिविल इंजीनियर थे, काफी बड़ा बंगला था उनका, एक बड़े से ड्राइंग रूम में बड़ी सी डाइनिंग टेबल और उस पर एक बड़ी सी टोकरी में ढ़ेर सारे फल, वह दृश्य काफी समय तक मन में अटका रहता था। क्योंकि उस समय तक मेरे लिए यह दृश्य सामान्य नहीं था।

अपने घर के बारे में बता दूं। शायद 20’X10’ का एक कमरा और एक छोटी सी रसोई थी, किराया था 16 रुपया प्रतिमाह। इस घर में माता-पिता और हम चार लोग, दो बहन, दो भाई रहते थे। बिजली सभी घरों में थी, लेकिन हमने नहीं ली थी। एक लालटेन थी हमारे घर में, जो या तो रसोई में इस्तेमाल होती थी या कमरे में, कमरे के थोड़े से हिस्से में ही लालटेन से रोशनी हो पाती थी। इस लालटेन की रोशनी में ही मैंने कक्षा 1 से 12वीं तक की पढ़ाई की थी।  

मेरे पिता जब घर में होते थे, तब शाम के बाद एक ही पहचान होती थी कि घर के उस कोने से उनकी सुलगती बीड़ी चमकती रहती थी। घर पर रहते हुए उनकी कोशिश रहती थी कि मैं उनके साथ ही खाना खाऊं। उनके दांत निकल चुके थे, रोटी को कुचलकर खाते थे। होता यह था कि सब्जी में कुचली हुई रोटी का कुछ भाग रह जाता था, मुझे खाने में थोड़ा खराब लगता था। ऐसे ही एक बार हम खा रहे थे, वो बोले कि अचार दे दो। अचार का मर्तबान खिड़की के ऊपर बने एक आले में रखा था, मैं खिड़की पर चढ़ा और वहीं चढ़ा रह गया, वो समझ गए, बोले तुमको मेरे साथ नहीं खाना चाहते तो नहीं खाओ, मुझे अचार तो दे दो। मुझे बड़ा खराब लगा कि मैं उनके प्रेम को पचा नहीं पा रहा था।

मकान मालकिन थीं प्रेम, एक विधवा महिला, उनकी छत पर जाकर सड़क का दृश्य दिखाई देता था। जब कोई ज़ुलूस निकलता या होली के दिन हुड़दंगियों की टोलियों का नज़ारा भी हम वहाँ से देखते थे। एक बार का दृश्य आज तक नहीं भूल पाया हूँ, वहाँ कुछ गैंग भी स्थानीय रूप से चलते थे, एक बार दो गैंग्स के बीच भिडंत हो गई, मुख्य सड़क पर चल रही इस भिड़ंत का नज़ारा भी हमने छत से देखा, लोग कोका कोला की बोतलों को हिलाकर इस प्रकार फेंकते थे कि विपक्षी के सिर में टकराकर वह फट जाए, उस दिन उन लोगों को लहूलुहान देखकर लगा कि उनमें से कुछ तो निपट ही जाएंगे, लेकिन वो बाद में फिर घूमते-फिरते नज़र आए, लगा कि यही तो इनके दीर्घ-जीवन का राज़ है।

दो-तीन गलियों का मोहल्ला था हमारा, मैंने कुछ ही घरों के बारे में बताया यहाँ, एक घर का ज़िक्र और कर दूं, जैसे मेरी मां मुहल्ले की बुआ थीं, वैसे ही पिछ्ली गली के आखिरी सिरे पर जो बुज़ुर्ग महिला रहती थीं वे मोटी बुआ कहलाती थीं। वे हमारी दूर की रिश्तेदार थीं। उनके एक भतीजे मुंबई में इतिहास पर आधारित फिल्में बनाते थे। पृथ्वीराज चौहान, हमीर हठ आदि, कुछ फिल्में चलीं बाद में कुछ नहीं चलीं उनकी हालत खराब थी, तब बनाई फिल्म- जय संतोषी मां, और वे फिर से मालामाल हो गए। एक बार उनकी ही किसी फिल्म की शूटिंग के लिए कलाकार आए हुए थे, तब अपने बचपन के दिनों में ही मैंने भगवान दादा से हाथ मिलाया था।  

हमारे सामने वाले मुल्तानी बाबाजी, गर्मियों में बाहर गली में ही चारपाई बिछाकर सो जाते थे, हम ऊपर छत पर सोते थे, जब तक कि सुबह के समय वानर सेना वहाँ न आ जाए।

एक रोज़ सामने वाले बाबाजी गली में सोये थे, तभी गली के एक शराबी कैरेक्टर वहाँ आए, सब जगह ऐसे लोग होते हैं जिनका पीना जग-जाहिर होता है। उन्होंने बाबाजी को नमस्ते किया, बाबाजी ने उनके नमस्ते का जवाब दिया, वो बाबाजी के पास बैठ गए और तेज़ आवाज़ में मोहल्ले के कुछ लोगों की बुराई करने लगे, वो ऐसा है, उसने ऐसा किया। बाबाजी उनको समझाते रहे कि ऐसी बातें मुझसे मत करो, वो बोले क्यों नहीं करूं, मैं आपको जानता हूँ, आप मुझे जानते हैं, मैंने आपको नमस्ते किया आपने जवाब दिया, मैं तो बोलूंगा और वो  बोलते चले गए, मैं जानता हूँ कि मेरे बोलने की भी सीमाएं होनी चाहिएं। इसलिए आज की बात यहीं समाप्त करुंगा, बातें तो बहुत करनी हैं आगे भी।

नमस्कार।

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इब्तदा कुछ इस तरह

 

किसी ने फिर न सुना, दर्द के फसाने को

मेरे न होने से राहत हुई ज़माने को। 

खैर दर्द का फसाना सुनाने का मेरा कोई इरादा नहीं है। ज़िंदगी के साथ, इस राह में मिले कुछ विशेष पात्रों, विशेष परिस्थितियों के साथ हुए ऐसे अंतर्संवाद, जिनमें मुझे ऐसा लगता है कि अन्य लोगों की रुचि हो सकती है, उनको ही यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा।

अब तक जो कुछ कहा, उसको ऐसा समझ लीजिए कि जैसे मदारी गली में आकर, डुगडुगी या बांसुरी बजाकर लोगों को आकर्षित करने का प्रयास करता है, वैसा ही है। आजकल जिसे ‘कर्टेन रेज़र’ भी कहा जाता है, हालांकि वे मेरी इस कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मैं चाहूँगा कि मेरे मित्र उनको भी अवश्य पढ़ लें। वे ऐसे प्रसंग थे, जो लाइन तोड़कर पहले ही उपस्थित हो गए। अब जिन प्रसंगों को शेयर करने जा रहा हूँ, उनमें बड़ी दुविधा है कि क्या कहूं और क्या न कहूं।  

कोई कथा या धार्मिक आयोजन होता है तो प्रारंभ में देवता स्थापित किए जाते हैं। एक होते हैं, स्थान देवता- यह बताने का मेरा कर्तव्य है कि मैं कहाँ स्थापित या विस्थापित था उस समय, जब ये घटनाएं हुईं।

संक्षेप में बता दूं कि मेरा जन्म दरियागंज में हुआ था, वर्ष 1950 में, दरियागंज थाने के सामने, कोई कटरा है, वहाँ। मैं शायद 5 वर्ष का था जब यहाँ से हम शाहदरा चले गए थे। दरियागंज की कोई याद बताने लायक नहीं है।

एक याद है कि नेहरू जी सामने से निकले, खुली जीप में हाथ हिलाते हुए, नहीं मालूम कि अवसर कौन सा था। एक छवि मन में है कि पुतला साइकिल चला रहा था, जो बिजली की सजावट में, बाद में बहुत समय बाद देखा, पहली बार बचपन में जो देखा शायद वह प्रदर्शनी मैदान में रहा होगा।

शाहदरा में जहाँ हम जाकर बसे, वह स्थान है भोलानाथ नगर, सनातन धर्म पाठशाला और गौशाला के पीछे, एक मुख्यमार्ग जो राधू सिनेमा से बाबूराम आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय तक जाता है, उसी की बगल में था हमारा घर, संते की डेयरी के पीछे। उस डेयरी में उस समय 15-20 भैंसे और कुछ गाय भी थीं। इस समय उसके स्थान पर मदर डेयरी है, जिसमें लोहे की एक भैंस है, जो शायद उन सभी भैंसों से ज्यादा दूध देती है।

पिताश्री सेल्स रिप्रेज़ेंटेटिव का काम करते थे, जब तक दरियागंज में थे, तब तक अच्छा काम चल रहा था, शाहदरा जाने के बाद, जिस कंपनी में वो काम करते थे वह छोड़ दी और उसके बाद, जब तक मैंने उन्हें देखा, वे नौकरियां बदलते रहे। अक्सर वो बाहर रहते थे। जब जाते थे तब किसी और फर्म का प्रतिनिधित्व कर रहे होते थे और लौटते थे किसी और फर्म के प्रतिनिधि के रूप में। एक लाल रंग का अंगोछा हमेशा उनके पास रहता था। जब वो लौटकर आते थे, उनके अंगोछे में से दो चीज़ों की मिली-जुली गंध आती थी, एक तो कलाकंद जो वो हमेशा लेकर आते थे और एक भांग, जो वो हमेशा खाते थे।

जिन फर्मों के लिए वो काम करते थे उनके ऑफिस सामान्यतः चांदनी चौक, दिल्ली में या उसके आस-पास होते थे। मुझे याद है कि एक बार उनके साथ चांदनी-चौक गया, मिठाई की दुकान पर वे मुझे क्या-क्या खिलाने की कोशिश करते रहे। धंधे की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। उस समय शाहदरा से पुरानी दिल्ली का रेल या बस का किराया बहुत अधिक नहीं रहा होगा, लेकिन एक-दो बार मैंने यह भी देखा कि भांग की एक गोली निगलकर वो पैदल ही दिल्ली के लिए निकल लिए। मैंने काफी समय बाद कोशिश की पैदल शाहदरा से चांदनी चौक आने की, 6 किलोमीटर से ज्यादा ही पड़ता है, आसान नहीं है।

मैं आंतरिक रूप से जैसा बना, उसमें शायद सबसे अधिक मेरे पिता के संघर्ष का ही हाथ है, आगे भी उसके बारे में बात करूंगा, फिलहाल कुछ और बात कर लेते हैं।

कक्षा 1 से 5 तक की पढ़ाई मैंने सनातन धर्म पाठशाला में की, जिसे गौशाला वाला स्कूल कहते थे, क्योंकि स्कूल के बगल में ही गौशाला थी और अहाते में ही एक मंदिर भी था। उसके बाद कक्षा 6 से 12 तक की पढ़ाई बाबूराम स्कूल में की, जिसके पूरे नाम में उस समय ‘आदर्श’ भी शामिल था और जब तक मैंने वहाँ पढ़ाई की शामिल रहा। बाद में मालूम हुआ कि किसी नकल-वीर ने, नकल से रोकने पर, एक शिक्षक की हत्या कर दी और स्कूल ‘आदर्श’ का अतिरिक्त बोझ ढ़ोने के लायक नहीं रह गया। बहुत अच्छे अंग्रेजी शिक्षक थे वो, हरीश चंद्र गोस्वामी, आज भी उनकी छवि याद है।

बाबूराम स्कूल, कक्षा 6 से 12 की पढ़ाई की अवधि, इसमें तो ऐसी कुछ बातें अवश्य होंगी जो सुधीजनों के साथ शेयर की जा सकें। ये बातें अगले ब्लॉग में करेंगे। 

बीमार बाग जैसी, है ये हमारी दुनिया,

इस प्राणवान तरु की, मृतप्राय हम टहनियां,

एक कांपती उदासी, हर शाख पर लदी है।

                                                    ये बीसवीं सदी है।                                      (डा. कुंवर बेचैन)

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चल अकेला

हज़ारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते,

यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते

है कौन सा वो इंसान यहाँ पर जिसने दुख ना झेला।

चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला ।

मुकेश जी के गाये इस गीत ने जीवन में बहुत बार हिम्मत दी है। वैसे कुछ मामलों में इंसान को बड़ी जल्दी सबक मिलता है।

यह मेरा तीसरा ब्लॉग है। जब शुरू किया तब उत्साह का स्तर कुछ और ही था। बहुत जल्दी ये समझ में आया कि बाबा तुलसीदास जी ने ऐसे ही स्वांतः सुखाय की बात नहीं की थी। सचमुच हमारे सुख या संतोष को दूसरों की मुखर स्वीकृति पर निर्भर नहीं होना चाहिए। बहरहाल सबक तो ज़िंदगी में मिलते ही रहते हैं और मिलने भी चाहिएं।

सोचा था कि जीवन के प्रारंभ से अनुभव यात्रा को साझा करूंगा, फिलहाल बीच के एक पड़ाव की बात कर रहा हूँ।  मैंने 30 सितंबर,1980 की रात में दिल्ली छोड़ी क्योंकि 1अक्तूबर,1980 को मुझे आकाशवाणी, जयपुर में कार्यग्रहण करना था, हिंदी अनुवादक के रूप में।

इत्तफाक से 2 अक्तूबर,1980 को ही वहाँ, राम निवास बाग में, प्रगतिशील लेखक सम्मेलन था, शायद प्रेमचंद की स्मृतियों को समर्पित था यह सम्मेलंन्। यह आयोजन काफी चर्चित हुआ था क्योंकि महादेवी जी इस आयोजन की मुख्य अतिथि थीं और अपने संबोधन में उनका कहना था कि हम जंगली जानवरों के लिए अभयारण्य बना रहे हैं, परंतु मनुष्यों के लिए भय का परिवेश बन रहा है।

महादेवी जी के वक्तव्य पर वहाँ मौज़ूद राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री- जगन्नाथ पहाड़िया नाराज़ हो गए, वो बोले कि ‘महादेवी जी की कवितायें तो कभी भी मेरी समझ में नही आईं, मैं यहाँ साहित्यकारों के लिए कुछ अनुदान की घोषणा करने आया था, अब नहीं करूंगा। सत्ता के नशे में चूर पहाड़िया ये समझ ही नहीं पाए कि महादेवी होने का मतलब क्या है! बाद में काफी दिनों तक इस पर बहस चली और बाद में जगन्नाथ पहाड़िया को माफी मांगनी पड़ी थी।

खैर मुझे यह आयोजन किसी और कारण से भी याद है। इस तरह की संस्थाओं पर, विशेष रूप से जिनके साथ ‘प्रगतिशील’ शब्द जुड़ा हो, उन पर सभी जगह कम्युनिस्टों का कब्ज़ा रहा है। उनके लिए किसी का कवि या कहानीकार होना उतना आवश्यक नहीं है, जितना कम्युनिस्ट होना। वैसे मुझे सामान्यतः इस पर कोई खास आपत्ति नही रही है। वहाँ जाने से पहले मैं काफी समय से कवितायें, गीत आदि लिख रहा था और विनम्रतापूर्वक बताना चाहूंगा कि अनेक श्रेष्ठ साहित्यकारों से मुझे प्रशंसा भी प्राप्त हो चुकी थी।

जयपुर जाते ही क्योंकि इस आयोजन में जाने का अवसर मिल गया तो मुझे लगा कि यह अच्छा अवसर है कि यहाँ कविता पाठ करके, स्थानीय साहित्यकारों के साथ परिचय प्राप्त कर लिया जाए। रात में जब कवि गोष्ठी हुई तो मैंने भी अपनी एक ऐसी रचना का पाठ कर दिया, जिसके लिए मैं दिल्ली में भरपूर प्रशंसा प्राप्त कर चुका था। यह घटना भुलाना काफी समय तक मेरे लिए बहुत कठिन रहा। कोई रचना पाठ करता है तब रचना बहुत अच्छी न हो तब भी प्रोत्साहन के लिए ताली बजा देते हैं। लेकिन वहाँ मुझे लगा कि किसी ने मेरी कविता जैसे सुनी ही नहीं थी। ऐसा सन्नाटा मैंने वहाँ देखा। शायद उन महान आयोजकों को इस बात का अफसोस था कि एक अनजान व्यक्ति ने कविता-पाठ कर कैसे दिया।  

खैर वहाँ एक-दो रचनाकारों को सुन, जिनसे बाद में घनिष्ठ परिचय बना, उनमें से एक हैं कृष्ण कल्पित, जो अभी शायद आकाशवाणी महानिदेशालय में कार्यरत हैं। उनके एक प्रसिद्ध गीत की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-

राजा-रानी प्रजा मंतरी, बेटा इकलौता

मां से कथा सुनी थी, जिसका अंत नहीं होता।

बिना कहे महलों में कैसे आई पुरवाई,

राजा ने दस-बीस जनों को फांसी लगवाई।

राम-राम रटता रहता था, राजा का तोता।

मां से कथा सुनी थी जिसका अंत नहीं होता॥

आकाशवाणी, जयपुर में 3 साल रहा, बहुत अच्छे कलाकारों और कवियों से वहाँ मुलाकात हुई। एक थे लाज़वाब तबला वादक ज़नाब दायम अली क़ादरी, बहुत घनिष्ठ संबंध हो गए थे हमारे। मेरे बच्चे का जन्मदिन आया तो वो स्वयं घर पर आए और घंटों तक गज़लें प्रस्तुत कीं। आकाशवाणी में वे तबला वादक थे, परंतु वे गायन के कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे।ए  वो बोलते भी थे कि सरकार को हाथ बेचे हैं , गला नहीं। इसके बाद जब तक हम वहाँ रहे, ऐसे अवसरों पर वे आकर कर्यक्रम करते रहे। एक बार हमारे मकान मालिक के बच्चे का जन्मदिन था, उनसे कहा तो बोले, शर्माजी आप तो हमारे घर के आदमी हैं, अगर हम हर किसी के यहाँ ऐसे ही गायेंगे,तो क्या ये ठीक होगा?

वहाँ रहते हुए आकाशवाणी की कई कवि गोष्ठियों में भाग लिया। स्वाधीनता दिवस के अवसर पर रिकॉर्ड की जा रही एक कवि गोष्ठी याद आ रही है, उसमें केंद्र निदेशक श्री गिरीश चंद्र चतुर्वेदी भी स्टूडियो में बैठे थे। राजस्थान के एक प्रसिद्ध गीतकार का नंबर आया तो वे बोले, यह गीत मैंने अपने जन्मदिन पर लिखा था, प्रस्तुत कर रहा हूँ-

काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी,

देखी हमने अपनी सालगिरह देखी।

इस पर केंद्र निदेशक तुरंत उछल पड़े, नहीं ये गीत नहीं चलेगा, कोई और पढ़िए। वास्तव में वह गीत स्वतंत्रता दिवस से ही जोड़कर देखा जाता।

एक और गीत की पंक्तियां आज ताक याद हैं-

फ्यूज़ बल्बों के अद्भुद समारोह में

रोशनी को शहर से निकाला गया।

आकाशवाणी में मेरी भूमिका हिंदी अनुवादक की थी, इस प्रकार मैं प्रशासन विंग में था, लेकिन मेरी मित्रता वहाँ प्रोग्राम विंग के क्रिएटिव लोगों के साथ अधिक थी। एक पूरा आलेख आकाशवाणी के कार्यकाल पर लिखा जा सकता है, लेकिन फिलहाल इतना ही।

अंत में जयपुर के एक और अनन्य शायर मित्र को याद करूंगा- श्री मिलाप चंद राही। बहुत अच्छे इंसान और बहुत प्यारे शायर थे। जयपुर में रहते हुए ही एक दिन यह खबर आई कि दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनकी इन पंक्तियों के साथ उनको याद कर रहा हूँ-

रवां-दवां थी, सियासत में रंग भरते हुए,

लरज़ गई है ज़ुबां, दिल की बात करते हुए।

ये वाकया है तेरे शहर से गुज़रते हुए,

हरे हुए हैं कई ज़ख्म दिल के भरते हुए।

मुझे पता है किसे इंतज़ार कहते हैं,

कि मैंने देखा है लम्हात को ठहरते हुए।

खुदा करे कि तू बाम-ए-उरूज़ पर जाकर

किसी को देख सके सीढ़ियां उतरते हुए॥

नजर-नवाज़ वो अठखेलियां कहाँ राही,

चले है बाद-ए-सबा अब तो गुल कतरते हुए।

 

 

आज के लिए इतना ही, फिर बात शुरू करेंगे, दिल्ली के दिनों से।

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एक पुराना दुख

इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां । (दुश्यंत कुमार)

लेकिन ये ब्लॉग लिखने का उद्देश्य तो खिड़कियों को खोलने का प्रयास करना ही है।

एक पुराना अनुभव साझा कर रहा हूँ, उससे पहले ये पंक्तियां याद आ रही हैं-

एक पुराने दुख ने पूछा क्या तुम अभी वहीं रहते हो

उत्तर दिया चले मत आना, मैंने वो घर बदल लिया है। (शिशुपाल सिन्ह ‘निर्धन’)

अब वह घटना-

कभी-कभी इंसान को यह सनक लगती है कि मैं खिड़कियां खोलूंगा। ऐसा मेरे साथ हुआ था 90 के दशक में, यह मन में बहुत बार आया कि अखबार में नियमित कॉलम लिखकर स्थितियों पर अपनी भड़ास निकाली जाए, प्रतिक्रिया के रास्ते अपनी भूमिका का निर्वाह किया जाए। लेकिन इसके लिए पत्रकारिता की पृष्ठभूमि और उससे भी अधिक किसी अखबार के दफ्तर में प्रभावी संपर्क की ज़रूरत है। प्रभावी इसलिए कि पत्रकार दोस्त तो कुछ थे, लेकिन वे ऐसा निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थे।

मैंने विचार मंथन करके 3 महत्वपूर्ण विषयों पर लेख लिखे और अपने इन लेखों पर मैं स्वयं काफी मुग्ध या संतुष्ट तो था ही। इन लेखों के बारे में यहाँ संक्षेप में बता दूं। पहला लेख था-


  • भारतीय रेल

इस लेख में  मैंने अपने उस समय के अनुभवों के आधार पर ट्रेन के कंडक्टरों और कुलियों की अनैतिक  गतिविधियों के बारे में विस्तार से लिखा था । एक गतिविधि, शायद वो अब भी होती हो, यह थी कि जनरल बोगी पर कुली पूरी तरह कब्ज़ा कर लेते हैं, उस पर मिलिट्री या कुछ और लिखकर और फिर पैसे लेकर, सिविलियन को मिलिट्री मैन बनाते हैं। इसमें एक दृश्य मैंने लिखा था कि यार्ड से गाड़ी आती है, तब जनरल बोगी में सभी जगह कुली नीचे की दोनों बर्थ पर पर रखकर खड़े हो जाते हैं, और सीट एलॉटमेंट की इस महान प्रक्रिया को अंजाम देते हैं। यह देखकर बरबस यह गाना याद आ जाता है-

‘कितने बाज़ू, कितने सर, सुन ले दुश्मन ध्यान से ….’

इस लेख की अंतिम लाइन थी- कहते हैं कि इस देश को भगवान ही चला रहा है, तो फिर रेल कौन चला रहा है?

दूसरा लेख भारतीय प्रशासनिक तंत्र के बारे में था, इसमें मैंने इस पर बल दिया था कि हमारा लोकतांत्रिक प्रशासन तंत्र भारत के जन साधारण की सेवा के लिए है, लेकिन सच्चाई यह है कि आम नागरिक इन विशाल सरकारी  भवनों के पास जाने में भी डरता है, थाने की तो बात ही क्या! जबकि अपराधी, स्मगलर आदि उच्च पदों पर बैठे हुए अधिकारियों और जन-प्रतिनिधियों से इस तरह परिचित होते हैं कि वे उनको रिसीव करने सचिवालय के गेट पर आ जाते हैं या किसी को भेज देते हैं।

शायद अब थोड़ा बहुत फर्क पड़ा हो, लेकिन बहुत कुछ बदलना ज़रूरी है।

तीसरा लेख था सतर्कता का तर्क, इस लेख में मैंने अपने अनुभव के आधार पर यह लिखा था कि सरकारी कार्यालयों में जो विजिलेंस विभाग कार्य करते हैं, उनसे गलत काम करने वाले अधिकारी नहीं डरते क्योंकि वो तो अतिरिक्त रूप से सतर्क रहते हैं, ईमानदारी से काम करने वाले लोग ज्यादा डरते हैं। क्योंकि एक मामले में मैंने देखा कि फर्नीचर की खरीद में कहीं कारीगर ने कहीं भी, ज्यादा रंदा चला दिया तो वह किसी अधिकारी की किस्मत छील गया।

इतना सब आपने पढ़ लिया है, मैं आपके धैर्य की प्रशंसा करता हूँ।

आप सोच रहे होंगे कि मैंने 90 के दशक में कुछ लिखा, तो आज आपको क्यों बता रहा हूँ?

असल मेरे एक नज़दीकी मित्र सुशील कुमार सिंह, जो मेरे लिए शीलू हैं, वरिष्ठ पत्रकार हैं, उस समय वो जनसत्ता में थे, उनके माध्यम से मैंने ये तीनों लेख, जनसत्ता में उस सज्जन को भिजवाए जो लेखों का प्रकाशन देखते थे, काफी नाम था उनका, पहले दिनमान में भी रह चुके थे- जवाहर लाल कौल, वैसे मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से आज तक नहीं मिला हूँ। सुशील ने बताया कि लेख उन्होने रख लिए हैं और कहा है कि और भी लेख भिजवाएं।

मैं उस समय एनटीपीसी विंध्याचल, मध्य प्रदेश में तैनात था, दिल्ली कम ही आना होता था, अगली बार दिल्ली आने पर पता किया तो कौल जी ने कहलवाया कि वो लेख तो खो गए हैं, और भिजवा दें। इस पर मुझे कुछ संदेह हुआ।

मैंने उसके बाद दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी में जनसत्ता के पुराने अंक खंगाले तो मुझे ‘भारतीय रेल’ लेख तो श्रीमान जवाहर लाल कौल जी के नाम से छपा हुआ मिल गया, स्वाभाविक है कि बाकी दो लेखों के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा।

शायद इसे ही कहते हैं- लाखों में बिकने लगे, दो कौड़ी के लोग! यह बात बहुत समय से दिमाग में अटकी थी सो आज कह दी, कहीं तक तो पहुंचेगी।

अंत में मेरे प्रिय गायक मुकेश जी के गीत की पंक्तियां याद आ रही हैं-

आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम

आजकल वो इस तरफ देखता है कम।

किसको भेजे वो यहाँ खाक छानने

इस तमाम भीड़ का हाल जानने,

आदमी हैं अनगिनत, देवता हैं कम॥  

अपनी जीवन यात्रा पर क्रमवार आपको ले चलूंगा, मुझे पूरी उम्मीद है, आपको आनंद आएगा।

 

श्रीकृष्ण शर्मा

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आसमान धुनिए के छप्पर सा

किसी गुमनाम से एक शहर में पैदा हुए थे हम  
नहीं है याद पर कोई अशुभ सा ही महीना था,
रजाई की जगह ओढ़ी पुआलों की भभक हमने
विरासत में  मिला हमको, हमारा ही पसीना था।
यह पंक्तियां हैं विख्यात कवि स्व. रामावतार त्यागी की।

यह भी एक तरीका है अपने बारे में बात करने का, लेकिन आज लगता है कि नाम वाले शहर में पैदा हुए लोग शायद ज्यादा अकेलापन महसूस करते हैं। शायद इसीलिए आजकल फेसबुक, ट्विटर आदि ज्यादा लोकप्रिय बल्कि लोगों के लिए अनिवार्य से हो गए हैं।
कभी मैंने भी कुछ ऐसा लिखा था –
लिए चौथ का अपशकुनी चंदा रात
जाने हम पर कितने और ज़ुल्म ढ़ाएगी,
कहने को इतना है, हर गूंगी मूरत पर
चुप रहकर सुनें अगर, उम्र बीत जाएगी।
बस ऐसा हुआ, कि पिछले दिनों फेसबुक पर मेरे एक कवि मित्र ने, मेरे एक पुराने गीत के माध्यम से मुझे याद किया।
अचानक खयाल आया कि अपनी कहानी के बहाने, अपने समय की बात की जाए।
वैसे मैं काफी आलसी इंसान हूँ, मैं इस काम को आगे बढ़ाता जाऊं, यह मेरे मित्रों की रुचि और प्रतिक्रिया पर निर्भर होगा, मैं कोशिश करूंगा कि अपनी इस यात्रा में, अपनी कुछ रचनाओं को भी साझा करता चलूं। इस बहाने कुछ कविताएं भी डिजिटल प्रारूप में सुरक्षित हो जाएंगी।
एक रचना आज यहाँ साझा कर रहा हूँ, जिसको ब्लॉग का शीर्षक बनाया गया है।

गीत
यहाँ वहाँ चिपक गए बादल के टुकड़े
धुनिए के छप्पर सा आसमान हो गया।
मुक्त नभ में, मुक्त खग ने प्रेम गीत बांचे
थक गए निहारते नयन,
चिड़ियाघर में मोर नहीं नाचे,
छंदों में अनुशासित
मुक्त-गान खो गया॥
क्षितिजों पर लाली,
सिर पर काला आसमान
चिकनी-चुपड़ी, गतिमय
कारों की आन-बान,
पांवों पर चलने के
छींट-छींट विधि-विधान,
उमड-घुमड़ मेघ
सिर्फ कीच भर बिलो गया।
धुनिए के छप्पर सा आसमान हो गया॥