Categories
Uncategorized

21. रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे

जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और चयन परीक्षा एवं साक्षात्कार के लिए मुझे बुलावा भी आ गया।

इस बीच मेरे दूसरे पुत्र का जन्म जयपुर में हो चुका था। और आगे की यात्रा पर जाने वाले हम चार लोग थे।

मुझे जाना था बिहार के संथाल परगना क्षेत्र में, जो अब झारखंड में आता है। टाटानगर से लगभग 40 कि.मी. दूर है यह इलाका। जाने से पहले ही मैंने अखबार में यह खबर पढ़ी कि वहाँ गैर आदिवासी लोगों को 10 इंच छोटा करने (गर्दन काटने) की घटनाएं हो रही थीं। परम आदरणीय शिबू सोरेन जी का इलाका है वह।

खैर मैं वहाँ पहली बार जा रहा था और इत्तफाक से मुझे कोई सही मार्गदर्शन करने वाला भी नहीं मिला, बल्कि एक सज्जन ने अधूरे ज्ञान के आधार पर मुझे जो बताया वह मुझे बहुत महंगा पड़ सकता था। मैंने वहाँ जाने के लिए टाटानगर एक्सप्रेस पकड़ी, जो बताया गया था कि सुबह 6 बजे पहुंचेगी, लेकिन वह 9 बजे के बाद पहुंची। वहाँ से मुझे हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कार्यालय, मऊभंडार जाना था, जहाँ जाने के लिए केवल टेम्पो मिलते हैं, जो सवारियां ठूंसकर भरने पर चलते हैं, और 40 किलोमीटर का वह जंगली रास्ता भी माशाअल्ला था।

खैर रोते-धोते मैं 11 बजे के बाद वहाँ पहुंचा, जबकि उम्मीदवारों की लिखित परीक्षा वहाँ 10 बजे से प्रारंभ होकर पूरी हो चुकी थी और अब साक्षात्कार होना था। मैंने अपनी परिस्थितियां बताईं और मुझे अनुमति दे दी गई, जबकि अन्य लोगों का साक्षात्कार शुरु हो रहा था, मुझे टेस्ट देने के लिए बिठा दिया गया और अंत में मेरा साक्षात्कार हो गया। जैसा मैंने बताया था कि केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के प्रशिक्षण के उपरांत मुझे मिला मेडल मेरे काफी काम आया बाकी चयन परीक्षा का निष्पादन तो होगा ही।

बाद में जब मैं गेस्ट हाउस में रुका तो मुझे मालूम हुआ कि प्रत्याशियों में एक ऐसे सज्जन भी शामिल थे, जो केंद्रीय मंत्री रहीं श्रीमती राम दुलारी सिन्हा के पर्सनल स्टॉफ में शामिल रहे थे और वे यह मान रहे थे कि उनका चयन तो कोई रोक नहीं सकता। बाद में मुझे बताया गया कि वहाँ के उप महाप्रबंधक (का. एवं प्रशा.)- श्री राज सिंह निर्वाण ने वहाँ के वरि. प्रबंधक (राजभाषा)- डॉ. राम सेवक गुप्त से कहा था कि वह मिनिस्टर का आदमी है अतः उसका चयन कर लें वरना दिक्कत हो जाएगी। इस पर गुप्ता जी ने कहा था कि आप कर लीजिए, मैं तो उसी को चुनूंगा, जो मुझे ठीक लग रहा है। खैर निर्वाण जी भी गलत काम करना नहीं चाहते थे।

काफी समय बाद जब मैं वहाँ से आ रहा था, तब मुझे वहाँ के सतर्कता प्रभारी ने मुझे वे पत्र दिखाए, जो दो केंद्रीय मंत्रियों- श्री वसंत साठे और श्री एन.के.पी. साल्वे ने मेरी नियुक्ति के विरुद्ध लिखे थे। इन दोनो मंत्रियों ने श्रीमती सिन्हा के स्टाफ में रहे उस व्यक्ति की शिकायत को अग्रेषित किया था। उन सज्जन को भी एक पाइंट यह मिल गया था कि मैं देर से पहुंचा था। खैर इसका मेरे मैडल और निष्पादन का हवाला देते हुए, समुचित उत्तर दे दिया गया था।

हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की इस इकाई का नाम इंडियन कॉपर कॉम्प्लेक्स था, जो पहले अंग्रेजो द्वारा चलाई जाती थी और उस समय उसका नाम था- इंडियन कॉपर कार्पोरेशन। वहाँ की माइंस थीं मुसाबनी माइंस, जो देश की सबसे गहरी ऑपरेशनल खदानें थीं। किसी जमाने में, अंग्रेजों ने यहाँ से तांबे के अलावा बड़ी मात्रा में सोना, चांदी भी निकाले थे। खदानों के मामले में यह लागू होता है कि खदान जितनी गहरी होती जाएगी, खनन की लागत उतनी ही बढ़ती जाएगी। जबकि खदान में तांबे की मात्रा बहुत कम हो गई थी और खनन लागत बढ़ती जा रही थी। कई बार ऐसा लगता था कि स्टाफ को यदि घर बिठाकर पैसा दिया जाए तो घाटा कम होगा, खनन करने पर ज्यादा। खैर कई उपाय अपनाए जा रहे थे वहाँ पर खनन लागत को कम करने के लिए। वैसे अब स्थिति यह है कि, ये खदानें कई वर्ष पहले बंद की जा चुकी हैं।

अंग्रेजों के समय से ही वहाँ की टाउनशिप बनी थी, और उसे लोगों को बांटने की अंग्रेजों की नीति के अनुसार ही बसाया गया था। ऑफिस के कर्मचारियों को अलग बसाया गया था, उसका नाम था स्टाफ कालोनी, अंग्रेज काफी बड़ी संख्या में नेपालियों को भी मज़दूर के रूप में काम करने के लिए ले आए थे और उनके लिए नेपाली कालोनी बना दी थी, उनके बच्चों का अब कोई भविष्य नहीं था, वे पूरा दिन जुआ खेलते थे। अंग्रेजों ने कर्मचारियों को बांटकर रखा, उनको अच्छी सुविधाएं दीं लेकिन शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी।

हिंदुस्तान कॉपर में आने के बाद यहाँ शिक्षा की सुविधाएं विकसित करने का प्रयास किया गया। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कलकत्ता स्थित मुख्यालय में श्रेष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र कार्यरत थे, उनके एक आशावादी गीत के साथ यह ब्लॉग समाप्त करते हैं, वहाँ के बारे में बाकी बातें बाद में करेंगे-

 

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे

जाने किस मछली में बंधन की चाह हो।

 

सपनों की ओस गूंथती कुस की नोंक है,

हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है,

रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे,

इस अंधेर में कैसे प्रीत का निबाह हो।

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….

 

उनका मन आज हो गया पुरइन पात है,

भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है,

चंदा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे,

ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो।

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….

 

गूंजती गुफाओं में कल की सौगंध है,

हर चारे में कोई चुंबकीय गंध है,

कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे,

पग-पग पर लहरें जब बांध रही छांव हो।

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….

 

कुमकुम सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है,

बंसी की डोर बहुत कांप रही आज है,

यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे,

जाने किस नागिन में प्रीति का उछाह हो।

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे

जाने किस मछली में, बंधन की चाह हो॥  

 

                                    ( पुरइन पात- कमल का पत्ता)

  • डा. बुद्धिनाथ मिश्र

=============   

Categories
Uncategorized

20. बहुत दिया देने वाले ने तुझको, आंचल ही न समाए तो क्या कीजे!

जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब वहीं रहते थे। वो दिल्ली नहीं छोड़ पाईं। एक-दो बार हमारे साथ गईं भी, जहाँ भी हम थे, लेकिन वहाँ नहीं रुक पाईं।

एक और बात हम दिल्ली से जयपुर ट्रेन में बैठकर चले गए थे, एक दो अटैची साथ लेकर, कोई और लगेज नहीं था हमारे साथ। जो सामान हमारा छूटा, घरेलू सामान थोड़ा बहुत मां के पास रहा, बाकी 50-60 किलो तो रहा ही होगा, किताबों और पत्रिकाओं के रूप में। पत्रिकाओं में सबसे बड़ा भाग था सारिका के अंक, जिनमें बहुत से कथा- ऋषि विशेषांक भी थे, जिनमें दुनिया भर के श्रेष्ठ लेखकों की रचनाएं शामिल थीं।

पता नहीं क्यों मुझे एक पाकिस्तानी लेखक की रचना याद आ रही है, जो ऐसे ही एक अंक में छपी थी। कहानी संक्षेप में यहाँ दोहरा देता हूँ-

महानगर पालिका में बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है। काफी लंबी बहस के बाद फैसला हुआ कि इन लोगों को नगर की सीमा के बाहर बसा दिया जाए। ऐसा ही किया गया, पहले वहाँ एक पान वाले ने अपनी दुकान खोली, चाय वाला आया, फिर कुछ और दुकानें खुलीं।

दस साल बाद, महानगर पालिका में फिर से बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है!

खैर, ये तो मुझे याद आया और मैंने संक्षेप में कहानी शेयर कर ली। मैं बता यह रहा था कि हम अपना साहित्य भंडार वकील साहब के यहाँ छोड़ आए, जो मेरे बड़े भाई लगते थे। उन्होंने कुछ वर्षों तक इस अमानत की बंधी हुई पोटलियों को संभालकर रखा, बाद में चूहों में साहित्य पिपासा कुछ अधिक जाग गई तो उन्होंने यह सब लायब्रेरी में दे दिया।

दिल्ली के जो महत्वपूर्ण वृतांत छूट गए, उनमें एक यह भी है कि हमने बच्चों की एक पत्रिका ‘कलरव’ के कुछ अंक भी प्रकाशित किए थे। दिल्ली प्रेस में मेरे एक साथी थे- श्री रमेश राणा, जिनको मेरी साहित्यिक प्रतिभा में कुछ ज्यादा ही विश्वास था, उन्होंने यह प्रस्ताव रखा। इसमें संपादन की ज़िम्मेदारी मेरी थी, बाकी सब उनके जिम्मे था। मैं सामग्री का चयन करता था और ‘नन्हे नागरिक से’ शीर्षक से संपादकीय भी लिखता था। यह संपादकीय सबसे सुरक्षित था, क्योंकि नन्हे पाठकों से कोई शिकायत मिलने की गुंजाइश नहीं थी। श्री बालकवि वैरागी ने इस पत्रिका के लिए कई रचनाएं भेजीं और उपयोगी सुझाव भी दिए।

अब याद नहीं कि इस पत्रिका के कितने अंक छपे थे और इस प्रयास में कितना आर्थिक नुकसान हुआ ये तो भाई रमेश राणा ही जानते होंगे क्योंकि मेरा तो एक धेला भी खर्च नहीं हुआ था। बस एक अनुभव था-

किन राहों से दूर है मंज़िल, कौन सा रस्ता आसां है,

हम जब थककर रुक जाएंगे, औरों को समझाएंगे।

जयपुर के बाद हम बिहार के संथाल परगना इलाके में गए, जो अब झारखंड में आता है। कुछ प्रसंग तो ऐसे हैं, जो जैसे समय आता है, मुझे याद आते हैं और मैं शेयर करता जाता हूँ, लेकिन बिहार में कार्यग्रहण का किस्सा ऐसा है, जिसे सुनाने की मुझे भी बेचैनी रहती है, वो सब मैं अगले ब्लॉग में बताऊंगा।

फिलहाल मैं यह बता दूं कि ईश्वर की कृपा से मुझे कभी किसी नौकरी के लिए सिफारिश की ज़रूरत नहीं पड़ी और मैं जब इंटरव्यू देने जाता था तब मैं बता देता था कि मैं यहाँ ज्वाइन करने वाला हूँ। हाँ मैं मुकेश जी का गाया यह भजन भी अक्सर गाता था और गाते-गाते मेरी आंखों में आंसू निकल आते थे-

तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।

यही सुना है दीनबंधु तुम सबका दुःख हर लेते,

जो निराश हैं उनकी झोली, आशा से भर देते,

अगर सुदामा होता मैं तो दौड़ द्वारका आता,

पांव आंसुओं से धोकर मैं, मन की आग बुझाता,

तुम बनो नहीं अनजान सुनो भगवान, करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।

 

जो भी शरण तुम्हारी आता, उसको धीर बंधाते,

नहीं डूबने दाता, नैया पार लगाते,

तुम न सुनोगे तो किसको मैं, अपनी व्यथा सुनाऊं,

द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन, और कहाँ मैं जाऊं।

प्रभु कब से रहा पुकार, मैं तेरे द्वार करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।

सब कुछ देता है ऊपर वाला, लेकिन फिर-

बहुत दिया देने वाले ने तुझको,

आंचल ही न समाए तो क्या कीजे।

अब अगले ब्लॉग में, मेरा चयन हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड में और उसके विरोध में दो केंद्रीय मंत्रियों के पत्र!

=============   

Categories
Uncategorized

19. हम खें जुगनिया बनाय गए अपुन जोगी हो गए राजा

दिल्ली में सरकारी सेवा के दौरान ही मैंने स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की एक और परीक्षा दी, जो हिंदी अनुवादक के पद पर चयन के लिए थी। इस परीक्षा में मैं सफल हुआ और उसके आधार पर ही आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक पद के लिए मेरा चयन हुआ।

इस परीक्षा के प्रश्न-पत्र का एक प्रश्न मुझे आज तक याद है। प्रश्न शायद‌ था ‘लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र’।  इस प्रश्न के उत्तर में मैंने एच.जी.वेल्स के विज्ञान आधारित उपन्यास ‘द आइलैंड ऑफ डॉ. मोया’ का उदाहरण देते हुए इसकी व्याख्या की थी। मैंने लिखा था कि जैसे कि यह माना जाता है कि हमारे पूर्वज बंदर थे और विकसित होते-होते आज के मानव का परिष्कृत रूप सामने आया है।

उपर्युक्त उपन्यास का उदाहरण देते हुए मैंने लिखा था कि डॉ. मोया इसमें विभिन्न प्रजातियों के जानवरों को लाकर एक द्वीप पर रखते हैं और उनको इंसान की तरह व्यवहार करना सिखाते हैं। किस तरह उठना-बैठना है, किस तरह खाना-पीना है। इस प्रकार सभी जानवर इंसान जैसा व्यवहार करने लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती है, उनको अनुशासित रखना मुश्किल होता जाता है, जहाँ मौका मिलता है, कुत्ता जीभ निकालकर उसी तरह पानी पीने लगता है, जैसे पहले पीता था, हिंसक जानवरों की मूल प्रवृत्ति वापस लौटने लगती है और डॉ. मोया वहाँ से अपनी जान बचाकर भागते हैं।

उपर्युक्त उदाहरण देकर मैंने यह लिखा था कि यह माना जाता है कि हम पशु से विकसित होकर मनुष्य बने थे लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती जा रही है, हमारे अंदर की पाशविक प्रवृत्ति पुनः पनपने लगी है।

खैर, जो भी हो मैं परीक्षा में सफल हुआ और आकाशवाणी, जयपुर में मेरी हिंदी अनुवादक के पद पर नियुक्ति हुई। उद्योग मंत्रालय तथा संसदीय राजभाषा समिति में 6 वर्ष सेवा करने के बाद 30 सितंबर,1980 की रात में मैंने दिल्ली छोड़ी और 1 अक्तूबर को आकाशवाणी, जयपुर में कार्यग्रहण किया।

जयपुर के साहित्यिक मित्रों और वहाँ के परिदृश्य के संबंध में, मैं शुरू के ही एक ब्लॉग में लिख चुका हूँ, कुछ और बातें, जो पहले नहीं कह पाया था अब कहूंगा।

आकाशवाणी में मैं प्रशासन शाखा में था और मेरी मित्रता वहाँ कार्यक्रम विभाग के लोगों से अधिक थी।

प्रशासन शाखा में, मेरे सामने बैठते थे- श्री राम चंद्र बैरवा, जो हेड क्लर्क थे, कार्यक्रम विभाग के सभी लोगों की फाइलें, सर्विस-बुक आदि उनके पास ही आती थीं और वो पूरा समय इस बात को लेकर कुढ़ते रहते थे कि कार्यक्रम विभाग के लोगों को कितनी अधिक तनख्वाह मिलती है।

मेरे बगल में श्री राम प्रताप बैरवा थे, जो क्लर्क थे और बाहरी कलाकारों को अन्य केंद्रों पर प्रोग्राम आदि के अनुबंध  वही जारी करते थे अतः कलाकार उनके पास आते रहते थे। मुझे याद है कि उनके पास आने पर मैंने ज़नाब अहमद हुसैन, मुहम्मद हुसैन के साथ अनेक बार चाय पी है।

आकाशवाणी के बाहर ही एम. आई. रोड पर एक चाय की दुकान थी और अक्सर ऐसा होता था कि हेड क्लर्क महोदय किसी एक के साथ चाय पीकर वापस लौटते थे और किसी और के साथ वापस चले जाते थे।

आकाशवाणी में एक उद्घोषक थे, नाम याद नहीं आ रहा है, उन्होंने अपने कमरे में यह शेर लिखकर लगाया हुआ था-

हर दौर में हम हाफिज़-ए-किरदार रहेंगे

खुद्दार थे, खुद्दार हैं, खुद्दार रहेंगे।

वैसे पता नहीं वो खुद्दारी का मतलब क्या समझते थे, क्योंकि उनका सबसे झगड़ा रहता था।

एक और मित्र थे, कार्यक्रम विभाग में- श्री बैजनाथ गौतम, जो ईसुरी के प्रसिद्ध लोकगीत बड़े मन से गाते थे. जैसे-

हम खें जुगनिया बना गए, अपुन जोगी हो गए राजा।

दस दरवाज़ों का महल बना गए,

ताही में पिंजरा टंगा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।

पिंजरे में तोता और मैंना बिठा गए,

बोली अनेकों रटा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।

शायद ईसुरी के लोकगीत के आधार पर ही राज कपूर जी ने अपनी फिल्म में यह गीत रखा था-

रंगमहल के दस दरवाजे,

ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी,

सैंया निकस गए, मैं ना लड़ी थी।

तीन साल के जयपुर प्रवास में जहाँ मैंने हिंदी में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की, वहीं केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के तीन माह के प्रशिक्षण में प्रथम स्थान प्राप्त करके, डा. कर्ण सिंह जी के कर कमलों से सिल्वर मैडल भी प्राप्त किया। इस प्रशिक्षण के प्रतिभागियों में मैं बहुत जूनियर था तथा यह मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी और यह मैडल बाद में मेरे काफी काम आया।

जयपुर प्रवास के दौरान हम तीन मकानों में बहुत थोड़ी अवधि के लिए और एक मकान में लंबे समय रहे, जिसमें टीन की छत थी, लेकिन हमारे मकान मालिक का प्रेम ऐसा था कि हम उसे छोड़ ही नहीं पाते थे। इस मकान में जाने की कहानी भी विशेष थी, हम यह मकान देख चुके थे लेकिन टीन की छत होने के कारण जाना नहीं चाहते थे। हमने एक मकान पसंद करके, पहला मकान छोड़ दिया और हम अपना घर का सामान, जो कि उस समय एक ठेले पर ही आ गया था, साथ लेकर नए मकान की ओर चल दिए, जिसके बारे में एक दिन पहले ही बात हो चुकी थी। लेकिन उस लालची आदमी को हमारे बाद शायद किसी ने ज्यादा पैसे ऑफर कर दिए और उसने वह मकान उसको दे दिया।

अब हम, ठेले पर अपने सामान के साथ सड़क पर थे, तब हम अचानक टीन की छत वाले इस मकान पर गए और उन्होंने हमारा भरपूर स्वागत किया। मेरे मकान मालिक मुझे भाई साहब कहते थे और मेरी पत्नी को बेटी कहते थे। जयपुर प्रवास का अधिकतम समय हमने इसी घर में बिताया।

अब अंत में श्री बलबीर सिंह रंग जी के एक दो शेर याद आ रहे हैं –

आब-ओ-दाना रहे, रहे ना रहे

ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,

तेरी महफिल रहे सलामत यार,

आना-जाना रहे, रहे ना रहे।

हमने गुलशन की खैर मांगी है,

आशियाना रहे, रहे ना रहे।

फिलहाल इतना ही, नमस्कार।

=============

Categories
Uncategorized

18. भूख मिट नहीं सकती, पेट भर नहीं सकता ज़िंदगी के हाथों में, कौन सा निवाला है

दिल्ली से जाल समेटने से पहले, कुछ और बातें कर लें। वैसे तो रोज़गार की मज़बूरियां हैं वरना कौन दिल्ली की गलियां छोड़कर जाता है। वैसे भी यह तो अतीत की बात है, मैं इसे कैसे बदल सकता हूँ? अगर बदल सकता तो कुछ और बदलता, जो मैं पहले लिख चुका हूँ।

कुछ छिटपुट घटनाएं जो ऐसे में याद आती हैं, उनमें एक है वह कवि गोष्ठी, जिसमें स्व.भवानी प्रसाद मिश्र जी का कविता पाठ था, पहली बार उनको आमने-सामने सुनने का अवसर मिला, उनकी अनेक कविताएं और कविता के बारे में उनके विचार जानने का अवसर मिला। मुझे भी उनके सामने एक रचना के पाठ का अवसर मिला। मेरी कविता सुनकर भवानी दादा ने कहा- ‘आदमी समझदार लगते हो’, मेरे लिए उनके ये बोल ही बहुत बड़ा आशीर्वाद थे।

एक बुज़ुर्ग कवियित्री थीं- श्रीमती इंदुमती कौशिक, बहुत श्रेष्ठ रचनाकार थीं। मुझे लगता है, उनको वह मान-सम्मान नहीं मिल पाया, जिसकी वह पात्र थीं। पहली बार उनकी रचना- शहीद वंदना, लाल किले के कवि सम्मेलन में सुनी थी, जिसने मेरे मन पर अमिट छाप पड़ी थी। बाद में अनेक बार उनसे मिलने और उनकी रचनाएं सुनने का सौभग्य प्राप्त हुआ।

आम आदमी की स्थिति को व्याकरण के माध्यम से दर्शाने वाली उनकी एक रचना है-

ना तो संज्ञा हैं हम ना विशेषण

बस यही व्याकरण है हमारा।

 

सिर्फ विन्यास की क्या समीक्षा

व्यक्ति हैं, पाठ्यक्रम तो नहीं हैं।

आपकी मान्यताओं से हटकर

कुछ अलग आचरण है हमारा।

एक और बहुत  श्रेष्ठ रचना है उनकी-

टांग दूं अरगनी पर, अनधुली उदासी मैं,

आज अपने आंगन में, धूप है, उजाला है,

एक साथ ओढ़ूंगी, सात रंग सूरज के,

तार-तार पैराहन, ओस में उबाला है।

इसी रचना में आगे पंक्तियां हैं-

भूख मिट नहीं सकती, पेट भर नहीं सकता

ज़िंदगी के हाथों में, कौन सा निवाला है।

एक और रचना की पंक्ति है-

हमने जिस कोमल कोने में अपना कक्ष चिना,

उसने अपनी ईंट-ईंट को, सौ-सौ बार गिना।

अंत में उनका प्रतिनिधि गीत शहीद वंदना, जो उनकी पहचान रहा है और मुझे अत्यंत प्रिय है-

जो अंधेरों में जलते रहे उम्र भर,

आपको दे गए भोर की नवकिरण,

आइए इस महापर्व पर हम करें

उन शहीदों की ज़िंदा लगन को नमन।

 

वो जिए इस तरह, वो मरे इस तरह,

ज़िंदगी-मौत दोनों सुहागिन हुईं,

ज़िंदगी को उढ़ाई धवल चूनरी,

मौत को दे गए रक्त-रंजित कफन।

 

हड्डियां पत्थरों की जगह चिन गईं,

तब कहीं ये इमारत बनी देश की,

आपके हाथ में सौंपकर चल दिए

ये सजग राजपथ, ये सजीला सदन।

 

अब यहाँ स्वार्थ हैं और टकराव हैं,

सिर्फ भटकाव हैं और बिखराव हैं,

आज के दौर में बोलिए तो ज़रा

कौन है जो करे आग का आचमन।  

 

आइए मिलके सोचें ज़रा आज हम

हमको क्या-क्या मिला, हमने क्या खो दिया,

वक्त की हाट में वरना बिक जाएंगे,

रत्नगर्भा धरा के सजीले रतन॥

दिल्ली में पहले प्रवास का यह अंतिम विवरण, स्व. इंदुमती कौशिक जी की स्मृतियों को समर्पित है।

जैसा मैंने पहले बताया उद्योग मंत्रालय के बाद मैं 3 साल तक संसदीय राजभाषा समिति में, तीन मूर्ति मार्ग पर कार्यरत रहा। इस बीच श्री संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई, तब मैं भी श्रीमती गांधी के आवास पर देखने चला गया था, वहाँ श्री मनोज कुमार आए थे और मुझे लगभग धकेलते हुए निकल गए थे। बहुत हैंडसम हुआ करते थे उस समय, आज उनकी हालत देखकर समय की शक्ति का एहसास होता है।

इस बीच मेरे निजी जीवन में ऐसा हुआ कि मेरा विवाह हुआ और एक बच्चा, मेरा बड़ा बेटा भी दिल्ली में जन्म ले चुका था। हमने 16 रु. महीने वाला पुराना घर छोड़ दिया था, लालटेन का साथ भी काफी पहले छूट चुका था। अब तो हम जयपुर जाने की तैयारी में थे।

बातें तो चलती ही रहेंगी, अभी इतना ही।                   

——————

Categories
Uncategorized

17. लेखनी मिली थी गीतव्रता, प्रार्थना पत्र लिखते बीती

ऐसा लगता है कि कवियों, साहित्यकारों की बात अगर करते रहेंगे तो दिल्ली छोड़कर आगे ही नहीं बढ़ पाएंगे। लेकिन कुछ लोगों की बात तो करनी ही होगी।

आज पहले एक गोष्ठी की बात कर लेते हैं, जो दिल्ली में हिंदी साहित्य सम्मेलन कार्यालय में हुई थी। हिंदी साहित्य सम्मेलन का यह कार्यालय उस समय था, कनॉट प्लेस में उस जगह, जहाँ अभी पालिका बाज़ार है। उस जगह पहले इंडियन कॉफी हाउस हुआ करता था, काफी विस्तृत क्षेत्र में फैला, गोल आकार का था और हमेशा भरा रहता था, शोर वहाँ इतना होता था कि लगता था छत उड़ जाएगी, जो कि कबेलू की बनी थी, दूर से देखें तो बहुत बड़ी झोपड़ी जैसा लगता था यह कॉफी हाउस, जिसमें किसी समय लोहिया जी तथा अन्य बड़े नेता भी आते थे।

कॉफी हाउस के पीछे लंबी सी एक मंज़िला इमारत थी, जिसमें एक कमरे में हिंदी साहित्य सम्मेलन का कार्यालय भी था, कभी गोपाल प्रसाद व्यास जी इसके कर्ता-धर्ता हुआ करते थे। वहाँ नियमित रूप से साहित्यिक बैठकें हुआ करती थीं। इनमें से एक विशेष बैठक की ही मैं बात कर रहा हूँ, इस बैठक की विशेषता थी कि इसमें अज्ञेय जी शामिल थे। जैसा कि सामान्यतः होता है, बैठक में उपस्थित कवियों/साहित्यकारों में शिक्षकों, प्रोफेसरों की भरमार थी।

इस बैठक में अपने विचार व्यक्त करते हुए अज्ञेय जी ने कहा कि अध्यापक वर्ग के लोग क्योंकि कविता और साहित्य से संबंधित रहते हैं, इनसे जुड़े हुए सिद्धांतों को पढ़ाते, दोहराते हैं अतः यह तो होता है कि इनमें से अधिकाधिक लोग साहित्य में हाथ आज़माते हैं, लेकिन उन्होंने अपना विचार व्यक्त किया कि इनके माध्यम से मौलिक सृजन की संभावना काफी कम रहती है।

अब यह तो बहुत बड़े संकट की बात थी अज्ञेय जी के लिए कि प्रोफेसरों की मंडली में बैठकर उन्होंने कह दिया कि आप लोगों के मौलिक लेखक होने की संभावना बहुत कम है। अब कौन है जो लिखता है और मान लेगा कि मेरा लेखन मौलिक नहीं है। खास तौर पर ऐसे माहौल में जहाँ आप मान रहे हों कि नारे लगाना भी मौलिक लेखन है। इसके बाद जो हुआ होगा इसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं।

अज्ञेय जी का योगदान भारतीय साहित्यिक परिदृश्य में अप्रतिम है, उनका उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ और नई कविता के क्षेत्र में, प्रतिनिधि कवियों के तीन संकलन ही अपने आप में उनकी बहुत बड़ी देन हैं। यहाँ उनकी केवल एक पंक्ति दे रहा हूँ-

पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ।
उसी के लिए स्वर-तार चुनता हूँ।

अब मैं, काव्य मंचों के एक ऐसे कवि का उल्लेख करना चाहूंगा जिन्होंने मुझे अत्यंत प्रभावित एवं प्रेरित किया है। ये हैं मेरठ के गीतकार श्री भारत भूषण जी, इस नाम के एक नई कविता के कवि भी रहे हैं, इसलिए मैंने मेरठ का ज़िक्र किया। भारत भूषण जी की कुछ पंक्तियों का उल्लेख यहाँ अवश्य करना चाहूंगा।

चक्की पर गेंहू लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखड़ा

क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई।

गीतों की जन्म- कुंडली में संभावित थी यह अनहोनी,

मोमिया मूर्ति को पैदल ही मरुथल की दोपहरी ढोनी,

खंडित भी जाना पड़ा वहाँ ज़िंदगी जहाँ भी बुला गई।।  

 

लेखनी मिली थी गीतव्रता, प्रार्थना पत्र लिखती बीती,

जर्जर उदासियों के कपड़े, थक गई हंसी सीती-सीती

हर भोर किरण पल भर बहला, काले कंबल में सुला गई॥   

 

एक और गीत की कुछ पंक्तियां, किस प्रकार इंसान अपने बुरे समय के लिए अपने पूर्व कर्मों को दोष देता है और कवि की निगाह में सबसे बड़े पाप क्या हैं-

तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा

धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी।

 

मैंने शायद गत जन्मों में, अधबने नीड़ तोड़े होंगे,

चातक का स्वर सुनने वाले, बादल वापस मोड़े होंगे,

ऐसा अपराध किया होगा, जिसकी कुछ क्षमा नहीं होती,

तितली के पर नोचे होंगे, हिरणों के दृग  फोड़े होंगे,

मुझको आजन्म भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी।

कविकर्म के संबंध में भी एक मार्मिक गीत है उनका-

आधी उमर करके धुआं

ये तो कहो, किसके हुए,

परिवार के या प्यार के,

या गीत के, या देश के ।

अब अगर कवियों, साहित्यकारों की बात ही करता रहूंगा तो कहानी आगे नहीं बढ़ पाएगी। बस एक ब्लॉग और उसके बाद कहानी को आगे बढ़ाऊंगा।

नमस्कार

——————

Categories
Uncategorized

16. घर, शहर, दीवार, सन्नाटा- सबने हमें बांटा

जिस प्रकार लगभग सभी के जीवन में भौतिक और आत्मिक स्तर पर घटनाएं होती हैं, जिनको शेयर करना समीचीन होता है। मैं प्रयास करूंगा कि जहाँ तक मेरी क्षमता है, मैं रुचिकर ढंग से इन  घटनाओं को आपके सपने रखूं। इस क्रम में अनेक नगर, व्यक्ति और उल्लेखनीय घटनाएं शामिल होंगी, लेकिन मेरा ऐसा इरादा एकदम नहीं है कि मैं इसे निजी जीवन की कहानी बनाऊं।

दिल्ली, शाहदरा जो कि लंबे समय तक मेरी कर्मभूमि और अनुभूतिस्थल थे छूटने वाले हैं, इससे पहले मैं एक-दो ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख ज़रूर करना चाहूंगा जिनसे मैं बड़ी हद तक प्रभावित हुआ हूँ।

एक हैं- श्री रमेश रंजक, नवगीत के एक ऐसे हस्ताक्षर जो सृजन के मामले में बहुत प्रभावी, ईमानदार और वज़नदार थे। उनका रहन-सहन तो शायद आदर्श नहीं कहा जाएगा, लेकिन कविता के प्रति उनकी ईमानदारी बेजोड़ थी। यह भी सही है कि अच्छी कविता यदि वे अपने दुश्मन से भी सुनें तो उसकी तारीफ किए बिना नहीं रह सकते थे।

‘गीत विहग उतरा’ और ‘हरापन नहीं टूटेगा’ उनके प्रारंभ के संकलन थे, जिनसे उनकी अमिट छप बन गई थी। बाद में तो उनके अनेक संकलन आए। कविता के प्रति उनकी ईमानदारी इन पंक्तियों में झलकती है-

वक्त तलाशी लेगा, वो भी चढ़े बुढ़ापे में

संभलकर चल।

वो जो आएंगे, छानेंगे कपड़े बदल-बदल

संभलकर चल।

मुझे याद है, मैं घर में बच्चों को उनके गीत सुनाकर बहलाता रहता था, खैर उसमें कांटेंट की नहीं, गायन की भूमिका होती थे, लेकिन मैं गाता था क्योंकि वे गीत मुझे बहुत प्रिय थे।

जैसे-

घर, शहर, दीवार, सन्नाटा

सबने हमें बांटा। 

सख्त हाथों पर धरी आरी,

एक आदमखोर तैयारी,

गर्दन हिली चांटा।

सबने हमें बांटा।।

एक और गीत की कुछ पंक्तियां-

दोपहर में हड्डियों को शाम याद आए

और डूबे दिन हज़ारों काम याद आए।

 

काम भी ऐसे कि जिनकी आंख में पानी

और जिनके बीच मछली सी परेशानी

क्या बताएं, किस तरह से

राम याद आए।

 

घुल गई है खून में जाने कहाँ स्याही,

कर्ज़ पर चढ़ती हुई मायूस कोताही,

तीस दिन के एक मुट्ठी

दाम याद आए।  

श्रीकृष्ण तिवारी जी के एक गीत की कुछ पंक्तियां हैं-

धूप में जब भी जले हैं पांव

घर की याद आई।

रेत में जब भी थमी है नाव,

घर की याद आई।

इस गीत की संवेदना सभी की समझ में आती है, घर से दूर रहकर घर की जो कमी खटकती है।

अब इसी गीत को पढ़कर, रंजक जी ने एक गीत लिखा-

धूप में जब भी जले हैं पांव

सीना तन गया है,

और आदमकद हमारा

ज़िस्म लोहा बन गया है।

हम पसीने में नहाकर हो गए ताज़े,

खोलने को बघनखों के बंद दरवाजे,

आदमी की आबरू की ओर से सम्मन गया है।

अब यदि दोनों गीतों को साथ रखकर देखें तो तिवारी जी का गीत अधिक सहज है। लेकिन दोनों स्वतंत्र गीत हैं और यह कह सकते हैं कि रंजक जी का यह गीत ज्यादा जुझारू है।

खैर मेरा उद्देश्य गीतों पर बहस करना नहीं है। मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि रंजक जी के गीतों से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ।

एक बार कवि गोष्ठी में उन्होंने मेरा एक गीत सुना और कहा कि ये मुझे लिखकर दे दो, मैं इसे प्रकाशित कराऊंगा। वो गीत पहले ही छप चुका था अतः मैंने उन्हें दूसरा गीत लिखकर दिया और उन्होंने उसे श्री नचिकेता जी द्वारा संपादित अंतराल-4 में छपवाया, जो प्रतिनिधि नवगीतों का संकलन था। ये वास्तव में रंजक जी का बड़प्पन ही था।

अपना वह नवगीत मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ, इसमें शाम के चित्र हैं-

जला हुआ लाल कोयला

राख हुआ सूर्य दिन ढले।

 

होली सी खेल गया दिन

रीते घट लौटने लगे,

दिन भर के चाव लिए मन

चाहें कुछ बोल रस पगे,

महानगर में उंडेल दूध,

गांवों को दूधिए चले।

राख हुआ सूर्य दिन ढले।।

 

ला न सके स्लेट-पेंसिलें

तुतले आकलन के लिए,

सपनीले खिलौने नहीं

प्रियभाषी सुमन के लिए,

कुछ पैसे जेब में बजे

लाखों के आंकड़े चले।

राख हुआ सूर्य दिन ढले।।

मैं अपने जीवन के रोचक और रोमांचक संस्मरण आपसे शेयर करूंगा, अभी एक-दो ऐसे कवियों,व्यक्तित्वों के बारे में बात कर लूं, जिनसे मैं दिल्ली में बहुत प्रभावित हुआ, क्योंकि दिल्ली छूटने के बाद यह बात नहीं हो पाएगी।

——————

Categories
Uncategorized

15. नक्काशी करते हैं नंगे जज़्बातों पर

 

                दिल्ली में उन दिनों तीन-चार ही ठिकाने होते थे मेरे, जिनमें से बेशक उद्योग भवन स्थित मेरा दफ्तर एक है, उसके अलावा शाम के समय दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी या फिर कनॉट प्लेस, जहाँ अनेक साहित्यिक मित्रों से मुलाक़ात होती थी। इसके अलावा जब बुलावा आ जाए तब आकाशवाणी में युववाणी केंद्र, जिसका कार्य उस समय देखती थीं- श्रीमती कमला शास्त्री, युववाणी में अनेक बार मैंने कवि गोष्ठियों या कविताओं की रिकॉर्डिंग के लिए भाग लिया तथा गीतों भरी कहानी, अपनी पसंद के गीतों आदि की भी प्रस्तुति की।

आकाशवाणी की एक घटना मुझे याद आ रही है। श्रीमती कमला शास्त्री को बच्चन जी का इंटरव्यू लेना था। बच्चन जी से तात्पर्य है- श्रेष्ठ कवि श्री हरिवंश राय बच्चन जी। इस साक्षात्कार के लिए श्रीमती कमला शास्त्री के अनुरोध पर मेरे कवि मित्र डा. सुखबीर सिंह जी तथा मैं बच्चन जी को उनके निवास से अपने साथ लाने के लिए गए। डा. सुखबीर सिंह  दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे तथा दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी में शनिवार की साहित्यिक सभा में नियमित रूप से आते थे। बच्चन जी उस समय दिल्ली में श्रीमती गांधी के घर की बगल में रहते थे। हम बच्चन जी को सादर अपने साथ लेकर आए तथा उनके साक्षात्कार के दौरान भी हम स्टूडियो में मौज़ूद थे।

श्रीमती कमला शास्त्री ने बच्चन जी से अनेक प्रश्न पूछे तथा उन्होंने उनके बड़े माकूल उत्तर दिए। एक प्रश्न मुझे अभी तक याद है। श्रीमती शास्त्री ने उनसे पूछा कि आपकी कविताओं के लोकप्रिय होने का कारण क्या यह है कि आपकी भाषा बहुत सरल है? इस पर बच्चन जी ने बड़ा सारगर्भित उत्तर दिया। बच्चन जी ने कहा कि भाषा सरल होना कोई आसान काम नहीं है। अगर आपके व्यक्तित्व में जटिलता है तो आपकी भाषा सरल हो ही नहीं सकती। हमारी भाषा सरल हो इसके हमको निष्कपट होना होगा, हमको बच्चा होना होगा, तभी हमारा मन निर्मल होगा और हमारी भाषा सरल होगी। इसीलिए कहते हैं- ‘लैंग्वेज इज़ द मैन’।

एक ठिकाना और था उन दिनों मेरा। कवि श्री धनंजय सिंह का घर। अपने घर जाने से भी ज्यादा आज़ादी के साथ, उनके घर किसी भी समय जा सकते थे। उनके माध्यम से ही बहुत से कवियों को निकट से जानना अधिक आसान हुआ। ऐसे ही एक कवि थे- श्री कुबेर दत्त, जो उन दिनों संघर्ष कर रहे थे। बाद में वे दूरदर्शन में नियुक्त हुए।  एक बार श्री कुबेर दत्त ने एक प्रमुख दैनिक समाचार पत्र में, मेरे सहित कुछ युवा लोगों के विचारों को शामिल करते हुए एक परिचर्चा प्रकाशित की ‘ज़िंदगी है क़ैद पिंजरों में’। श्री कुबेर दत्त उन दिनों बहुत अच्छे गीत लिखा करते थे। उनका एक गीत जो मुझे बहुत प्रिय है, उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-

ऐसी है अगवानी चितकबरे मौसम की

सुबह शाम करते हैं, झूठ को हजम,

सही गलत रिश्तों में, बंधे हुए हम।

 

नक्काशी करते हैं, नंगे जज़्बातों पर

लिखते हैं गीत हम नकली बारातों पर,

बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े में,

करते हैं विज्ञापित कदम दर कदम।

सही गलत रिश्तों में, बंधे हुए हम।।

 

पत्रों पर आंक रहे, अनजाने पते नाम,

जेबों में हाथ दिये, ढूंढ रहे काम धाम,

सांसों पर व्यापारी आंतों का कब्ज़ा,

पेट पकड़ छिकने का तारीखी क्रम।

सही गलत रिश्तों में, बंधे हुए हम।।

संघर्ष के दिनों में कुबेर दत्त मेरे हीरो हुआ करते थे। संघर्ष के दिनों में उनके एक और मित्र होते थे- सोमेश्वर। जो शायद कमलेश्वर को अपना आदर्श मानते थे। उनकी एक लंबी कहानी छपी थी सारिका में, जिसका नाम भी काफी लंबा था- ‘चीजें कितनी तेज़ी से बदल जाती हैं’। खैर मैं बता रहा था संघर्ष के दिनों की बात। श्री सोमेश्वर ने बताया कि कुबेर दत्त के साथ बीड़ी पीने के लिए वे कई किलोमीटर साइकिल चलाकर जाते थे। ये भी कि पहले आधी बीड़ी पीकर फेंकते जाते थे, फिर जब खत्म हो जाती थीं तब उनके टुकड़े ढूंढकर पीते थे।

खैर श्री कुबेर दत्त दूरदर्शन में नियुक्त हो गए, ऐसा स्थान जिसके लिए वे सर्वथा उपयुक्त थे, वहाँ वे निदेशक स्तर तक पहुंचे और कुछ बहुत अच्छे कार्यक्रम उन्होंने तैयार किए। लेकिन दूरदर्शन में जाने के बाद कुबेर जी का गीत लिखना छूट गया बल्कि वे कहने लगे कि गीत तो पलायन है।

हाँ दूरदर्शन में जाने के कुछ समय बाद ही उन्होंने एक गीत लिखा था-

उस पुराने चाव का, प्रीति के बहलाव का

दफ्तरों की फाइलें, अनुवाद कर पाती नहीं।  

कुछ और कवि मित्र हैं दिल्ली के, जिनका ज़िक्र आगे करेंगे।

अंत में अपनी कुछ पंक्तियां, जो दिल्ली में यमुना पार निवास के दर्द को भी दर्शाती हैं-

हर एक मुक़ाम पर

ठहरा, झुका, सलाम किया,

वो अपना घर था, जिसे रास्ते में छोड़ दिया।

उधर हैं पार नदी के बहार-ओ-गुल कितने,

इधर हूँ मैं कि ये जीवन

नदी के पार जिया।

————— 

Categories
Uncategorized

14. एक बूढ़ा आदमी है देश में या यूं कहें इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है।

जीवन में कोई कालखंड ऐसा होता है, कि उसमें से किस घटना को पहले संजो लें, समझ में नहीं आता है। अब उस समय को याद कर लेते हैं जब सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार और नाइंसाफी के विरुद्ध जयप्रकाश नारायण जी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन चलाया हुआ था। इस आंदोलन ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। सभी विपक्षी पार्टियां जेपी के पीछे लामबंद हो गई थीं। जयप्रकाश जी के कुछ भाषण सुनने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। वे इस प्रकार संबोधित करते थे, जैसे घर का कोई बुज़ुर्ग परिवार को समझाता है। जेपी जनता से यही बोलते थे कि कहीं भी कुछ गलत होता देखते हो तो उसका विरोध करो, और कुछ न कर पाओ तो टोको ज़रूर।

उस समय श्रीमती इंदिरा गांधी की लोकप्रियता उतार पर थी और वो किसी भी तरह सत्ता पर कब्ज़ा बनाए रखना चाहती थीं। पार्टी के बड़े से बड़े नेता को एक ही तरह की बातें कहने का अधिकार था- ‘इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा’।

स्थितियां हाथ से निकलते हुए देखकर श्रीमती इंदिरा गांधी ने जून, 1975 में देश में आपातकाल लगा दिया था, प्रमुख विपक्षी नेताओं को जेल में बंद कर दिया था और सामान्य नागरिक अधिकारों को नियंत्रित कर दिया था।

पूरे देश में उस समय एक ही नारा गूंज रहा था-

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

मैं उन दिनों सारिका पत्रिका नियमित रूप से पढ़ता था, वैसे तो यह कहानियों की पत्रिका थी और बहुत श्रेष्ठ पत्रिका थी। जेपी आंदोलन का प्रभाव सारिका में, कमलेश्वर जी द्वारा लिखित संपादकीय लेखों में भी देखा जा सकता था। सारिका में उन दिनों दुष्यंत कुमार जी की आंदोलनधर्मी गज़लें भी नियमित रूप से छपती थीं। इन्हीं में से एक थी-

आज गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है,

एक शायर ये तमाशा देखकर हैरान है।

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,

मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।

एक बूढ़ा आदमी है देश में या यूं कहें,

इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है।

उनकी एक और प्रसिद्ध गज़ल के कुछ शेर हैं-

कहाँ तो तय था चरांगा, हरेक घर के लिए

कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है,

चलें यहाँ से कहीं और उम्र भर के लिए।

बाद में दुश्यंत जी की ये गज़लें, ‘साये में धूप’ नाम से संकलन के रूप में प्रकाशित हुईं।

प्रगतिशील लेखक सम्मेलन की अनेक बैठकों में मैंने भाग लिया था, सामान्यतः ये बैठकें दिल्ली विश्वविद्यालय में कहीं होती थीं और इनमें काफी बहादुरी भरी बातें होती थीं। आपातकाल में ऐसी ही बैठक दिल्ली में मंडी हाउस के पास स्थित कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय में हुई और मैंने देखा कि इस बैठक में सभी बहादुरों ने किसी न किसी बहाने से आपातकाल का समर्थन किया।

इस बैठक के अनुभव से प्रभावित होकर मैंने ये कविता लिखी थी-

सन्नाटा शहर में

 

बेहद ठंडा है शहरी मरुथल

लो अब हम इसको गरमाएंगे,

तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा

भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

दड़बे में कुछ सुधार होना है,

हमको ही सूत्रधार होना है,

ये जो हम बुनकर फैलाते हैं,

अपनी सरकार का बिछौना है।

चिंतन सन्नाटा गहराता है,

शब्द वमन से उसको ढाएंगे।

तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा

भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

परख राजपुत्रों की थाती है,

कविता उस से छनकर आती है,

ऊंची हैं अब जो भी आवाज़ें,

सारी की सारी बाराती हैं,

अपनी प्रतिभा के चकमक टुकड़े

नगर कोतवाल को दिखाएंगे।

तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा

भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 खैर वो अंधकार की घोर निशा भी समाप्त हुई और समय इतना बदला कि भ्रष्टाचार विरोध के उस आंदोलन से निकले लालू प्रसाद यादव, आज भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी मिसाल बन चुके हैं।

आज के लिए इतना ही, आगे भी तो बात करनी है।

——————-

Categories
Uncategorized

13. मंज़िल न दे, चराग न दे, हौसला तो दे

एक नाइंसाफी तो लंबे समय से चलती चली आई है कि इतिहास को राजाओं के शासन काल से बांट दिया गया, बल्कि इतिहास का मतलब सिर्फ इतना हो गया कि किस राजा ने किस समय तक शासन किया, कहाँ जीत-हार हासिल की, कौन से अच्छे-बुरे काम किए।

मैंने भी यहाँ अपनी नौकरियों की अवधि के हिसाब से, काल विभाजन का प्रयास शुरू में किया, लेकिन यह सिर्फ समय के हिसाब से घटनाओं को याद करने के लिए है, बेशक कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं तो सीधे तौर पर नौकरी से भी जुड़ी हैं। लेकिन यह तो ऐसी घटनाओं का इतिहास है, जो बड़े पैमाने पर भीतर घटित होती हैं। दिल्ली में रहते हुए तो अधिकांश महत्वपूर्ण घटनाएं, दफ्तर के दायरे से बाहर ही घटित हुई हैं।

दिल्ली में मेरे लिए दफ्तर के अलावा, तीन महत्वपूर्ण घटना-स्थल रहे दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी, आकाशवाणी और काव्य गोष्ठियां/ कवि सम्मेलन। एक विशेष उपलब्धि मेरे जीवन में यह रही कि जिन विशिष्ट कवियों को मैंने लाल किले से कविता-पाठ करते हुए सुना, दिल से उनकी सराहना की, बाद में उनमें से अनेक को हिंदुस्तान कॉपर तथा एनटीपीसी में कार्यरत रहते हुए अपने आयोजनों में आमंत्रित करने तथा उनसे अंतरंग बातचीत करने का अवसर भी प्राप्त हुआ।

खैर अब ऐसा करता हूँ कि नौकरी बदल लेता हूँ। दिल्ली प्रेस में मैंने 3 वर्ष तक नौकरी की, इस बीच मैंने स्टाफ सेलेक्शन की प्रतियोगी परीक्षा में भाग लिया, केंद्रीय नौकरियों में अवर श्रेणी क्लर्क के पद हेतु और इसमें मुझे सफलता भी प्राप्त हो गई। अब मैं अकबर इलाहाबादी साहब की इस सीख का पालन कर सकता था-

खा डबल रोटी, किलर्की कर, खुशी से फूल जा

और वास्तव में ऐसा हुआ कि मैं जो कि एक दुबला-पतला इंसान था, धीरे-धीरे फूलता चला गया।

खैर उद्योग भवन के एलिवेटिड ग्राउंड फ्लोर में, स्थापना-3 अनुभाग में मैं स्थापित हो गया। हमारे कमरे के ऊपर ही पहले मंत्री श्री टी.ए.पाई का कमरा था,जो बेसमेंट से ही लिफ्ट द्वारा अपने फ्लोर पर चले जाते थे। बाद में सरकार बदलने पर श्री जॉर्ज फर्नांडीज़ आए, जो अक्सर लुंगी पहने हुए, सीढ़ियों से ऊपर जाते हुए दिख जाते थे।

अब कुछ दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की शनिवारी सभा की बात कर लेते हैं। वहाँ जाना प्रारंभ करते समय मेरी उम्र करीब 25 साल थी। एक युवा शायर वहाँ आते थे जो शायद 18-19 वर्ष के थे, कुंवर महिंदर सिंह बेदी सहर के शिष्य थे, नाम था- राना सहरी। उनकी शायरी चमत्कृत करने वाली थी, हम सब लोग उनकी जमकर तारीफ करते थे। बाद में उनसे कभी मुलाक़ात नहीं हो पाई। जगजीत सिंह ने भी उनकी कुछ गज़लें गाई हैं। जैसे-

मंज़िल न दे चराग न दे, हौसला तो दे

तिनके का ही सही, तू मगर आसरा तो दे।

मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो ज़ुरूर,

लेकिन खमोश क्यों है तू,

कोई फैसला तो दे।

उनकी एक और प्रसिद्ध गज़ल के कुछ शेर इस तरह हैं –

कोई दोस्त है न रक़ीब है,

तेरा शहर कितना अज़ीब है।

मैं किसे कहूँ मेरे साथ चल,

यहाँ सबके सर पे सलीब है।

वो जो इश्क था वो ज़ुनून था,

ये जो हिज़्र है ये नसीब है।

दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की शनिवारी सभा के ही एक कवि थे- शैलेंद्र श्रीवास्तव, रेलवे में नौकरी करते थे। उनकी शादी हुई गाज़ियाबाद में, बारात में हमारे साथ चलने वालों में श्री विष्णु प्रभाकर भी शामिल थे। हमारे लिए उनकी उपस्थिति किसी मंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण थी।

दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी के अनुभव तो बहुत अधिक हैं, आगे भी इस बारे में बात होती रहेगी, अंत में एक कवि श्री गोविंद नीराजन के गीत की कुछ पंक्तियां यहाँ प्रस्तुत करना चाहूंगा –

अंधियारे सपनों के संग जिए।

 

मन को रास नहीं आई छाया,

अंगारों से रैन छुवाई है,

हम खुद से सौ योजन दूर हुए,

अपनों बारंबार बधाई है।

शहनाई को तरूण हृदय के

क्रंदन बांट दिए,

बंदनवार शिशिर घर बांध दिए।

अंधियारे सपनों के संग जिए।।

 

परी कथा की राजकुमारी सा

कैदी सीमाओं का मेरा मन,

गीत-अगीत सभी पर पहरे हैं,

तट लहरों का सीधा आमंत्रण,

धुंधलाए जलयान

मुंदी पलकों में ढांप लिए

नाम हथेली पर लिख मिटा दिए।

अंधियारे सपनों के संग जिए।।

बातें तो बहुत हैं, टाइम भी बहुत है, फिर बात करेंगे। अभी के लिए नमस्कार्।

—————–

Categories
Uncategorized

12. सफर दरवेश है ऐ ज़िंदगी….

दिल्ली में रहते हुए मैंने पीताम्बर बुक डिपो और दिल्ली प्रेस में दो प्राइवेट नौकरी की थीं और उसके बाद 6 वर्ष  तक उद्योग मंत्रालय में कार्य किया, जिसमें से मैं 3 वर्ष तक संसदीय राजभाषा समिति में डेपुटेशन पर भी रहा।

खैर फिलहाल तो दिल्ली प्रेस की ही बात चल रही है। कुछ साहित्यिक गतिविधियां समानांतर चलती रहीं, जैसे दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी, जो कि पुरानी दिल्ली स्टेशन के सामने है वहाँ शनिवारी सभा होती थी ‘लिटरेचर स्टडी ग्रुप’, जिसमें साहित्यिक अभिरुचि वाले लोग एकत्रित होते थे और नए रचनाकार अपनी रचनाओं का पाठ करते थे। साहित्य सृजन में प्रोत्साहन की दृष्टि से यह शनिवारी सभा बहुत महत्वपूर्ण थी। बहुत से साहित्यकार किसी ज़माने में इसमें शामिल होते रहे हैं। अब पता नहीं यह सभा होती है या नहीं।

सोमवार को सोशल स्टडी ग्रुप की बैठक होती थी, जिसमें से बहुत से नेता उभरकर आए हैं। मैं सोमवार की सभा में कभी-कभी और शनिवारी सभा में अधिकतर जाता था।

इसके अलावा, नियमित रेल यात्रा में, जैसे भजन मंडली वाले अपने साथी खोज लेते हैं, ताश खेलने वाले भी अपनी मंडली बना लेते हैं, ऐसे ही कुछ कवि लोग थे, जो शाम को नई दिल्ली से शाहदरा लौटते थे। मैंने खुद को उनके नियमित श्रोताओं में शामिल कर लिया था।

वो अपनी कविताएं भी लिखते थे, जो ठीक-ठाक थीं, लेकिन कुछ बड़े कवि- शायरों की कविताएं भी पढ़ते थे, मगन होकर गाते थे। इनमें से एक-दो मुझे आज तक याद हैं-

ज़रूर एक नींद मेरे साथ ए मेहमान-ए-गम ले ले,

सफर दरवेश है, ऐ ज़िंदगी थोड़ा तो दम ले ले।

मैं अपनी ज़िंदगानी बेचता हूँ, उनके बदले में,

खुदा चाहे खुदा ले ले, सनम चाहे सनम ले ले।

ज़माने में सभी को मुझसे दावा-ए-मुहब्बत है,

कोई ऐसा नहीं मिलता जो मुझसे मेरे गम ले ले।

ये मेरी ज़िंदगी की आखिरी तहरीर है क़ैफी,

फिर इसके बाद शायद मौत, हाथों से कलम ले ले।

अब आखिरी शेर से ये मालूम होता है कि ये क़ैफी साहब की रचना है।

एक और रचना जिसका पाठ वो सज्जन करते थे, वह है-

बुझी हुई शमा का धुआं हूँ और अपने मरक़ज़ पे जा रहा हूँ,

इस दिल की दुनिया तो मिट चुकी है

अब अपनी हस्ती मिटा रहा हूँ।

उधर वो घर से निकल चुके हैं

इधर मेरा दम निकल रहा है,

अज़ब तमाशा है ज़िंदगी का

वो आ रहे हैं, मैं जा रहा हूँ।   

इसके रचनाकर कौन हैं, मुझे मालूम नहीं है।

एक सज्जन थे राधेश्याम शर्मा जी, जो लायब्रेरी की शनिवारी सभा में आते थे और कभी-कभी ट्रेन में भी टकरा जाते थे, उनको ऑडिएंस की काफी तलाश रहती थी और ट्रेन में तो वह मिल ही जाती है। सो ट्रेन में टकराते ही वो बोलते थे, शर्माजी आप कविता सुनाइए। मैं उनसे कहता, ठीक है आप कविता सुनाना चाहते हैं, सुना दीजिए। और वे शुरु हो जाते। उनकी एक प्रिय कविता थी-

तुम्ही ने ज़िंदगी मुझको,

कि अपनी ज़िंदगी कहकर

नशीली आंख का देकर नशा-

मदहोश कर डाला,

मगर कुछ होश बाकी है,

मेरा भी फैसला सुन लो,

सच्चाई है कि मेरी ज़िंदगी की

ज़िंदगी तुम हो।

वो झूम झूमकर इसे गाते थे और काफी तालियां बजवा लेते थे।

दिल्ली प्रेस में काफी बड़े हॉल में हम लोग बैठते थे, एक सेल्समैन वहाँ थे, उन्होंने मेरा नाम रख दिया था- मास्टरजी!, वहाँ सब लोग मुझे इस नाम से ही बुलाते थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि मेरी आवाज़ पूरे हॉल में उस तरह पहुंचती है, जैसे क्लासरूम में शिक्षक की आवाज़ पहुंचती है।

खैर दिल्ली प्रेस में सेवा के दौरान ही एशिया 72 प्रदर्शनी लगी थी, मैं उसे देखने गया लेकिन लेट हो गया और तब मैंने बगल में स्थित पुराना किला देखा, जिसके बाहर डीडीए ने फुलवारी बनाकर सजावट की हुई थी। उसको देखने के बाद ही ये गीत लिखा था-

खंडहर गीत

तुम उजाडों से न ऊब जाओ कहीं

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

ये तिमिर से घिरी राजसी सीढ़ियां,

इनसे चढ़ती उतरती रही पीढ़ियां,

युग बदलते रहे,तंत्र गलते गए,

टूटती ही रहीं वंशगत रूढ़ियां।

था कभी जो महल, बन वही अब गया,

बेघरों के लिए है, बसेरा प्रिये।

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए। 

 

कल कहानी बना आज मेरे लिए

उस कहानी के संकेत मिलते यहाँ,

भूल जाते हैं जब अपना इतिहास हम

ठोकरें फिर पुरानी हैं पाते वहाँ,

अपने जीवन की उपलब्धियों की ध्वजा

मैं फिराता रहा हर डगर इसलिए।

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

 

आज की सप्तरंगी छटाएं सभी

एक दिन खंडहर ही कही जाएंगी,

देखकर नवसृजन की विपुल चंद्रिका

अपनी बदसूरती पर ये शरमाएंगी,

स्नेह की नित्य संजीवनी यदि न हो,

ज़िंदगी भी तो एक खंडहर है प्रिये,

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

आज की कथा यहीं विराम लेती है।

 ——————