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अपनी रात की छत पर, कितना तन्हा होगा चांद!

प्रसिद्ध लेखक, उपन्यासकार, पटकथा लेखक और गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल मैं आज शेयर कर रहा हूँ| उनके उपन्यास – आधा गाँव, दिल एक सादा कागज, टोपी शुक्ला, मैं एक फेरीवाला आदि बहुत प्रसिद्ध हुए थे और बड़ी भावुकता और राजनीति पर पैनी दृष्टि के साथ उन्होंने ये उपन्यास लिखे हैं| उनको पद्मश्री, पद्मभूषण आदि प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था| उनके लिखे कई गीत भी काफी लोकप्रिय हुए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब की ये खूबसूरत ग़ज़ल, जिसे जगजीत सिंह जी ने भी गाया है-

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद,
अपनी रात की छत पर, कितना तन्हा होगा चांद|

जिन आँखों में काजल बनकर, तैरी काली रात,
उन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद|

रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर,
आँगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चांद|

चांद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते,
मेरे बिन किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद|



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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मोहब्बत रास्ता ही रास्ता है!

आज मैं प्रसिद्ध उर्दू शायर जनाब असद भोपाली जी की एक खूबसूरत सी ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस छोटी सी ग़ज़ल में कुछ असरदार शेरों के माध्यम से शायर ने मुहब्बत के जज़्बे और हौसले को अभिव्यक्त किया है|

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत ग़ज़ल-

न साथी है न मंज़िल का पता है,
मोहब्बत रास्ता ही रास्ता है|

वफ़ा के नाम पर बर्बाद होकर,
वफ़ा के नाम से दिल काँपता है|

मैं अब तेरे सिवा किसको पुकारूँ,
मुक़द्दर सो गया ग़म जागता है|

वो सब कुछ जानकर अनजान क्यूँ हैं,
सुना है दिल को दिल पहचानता है|


ये आँसू ढूँढता है तेरा दामन,
मुसाफ़िर अपनी मंज़िल जानता है|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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बेहतरीन कलाकार- पंकज त्रिपाठी

भारतीय फिल्म और सीरियलों की दुनिया में अनेक बेहतरीन कलाकार रहे हैं और आज मैं इस समय के एक अत्यंत प्रतिभाशाली कलाकार- श्री पंकज त्रिपाठी के बारे में बात करना चाहता हूँ|

अभी पिछले एक सप्ताह में ही मैंने उनकी दो टेलीफ़िल्म, वेब सीरीज़ – देखीं- ‘कागज’, जो कल ही मैंने देखी और उससे पहले वेब सीरीज़- ‘क्रिमिनल जस्टिस- बिहाइन्ड क्लोज्ड डोर्स’| इस वेब सीरीज़ में पंकज जी ने एक वकील की भूमिका निभाई, ऐसा वकील जो रहन-सहन और मन से एकदम देहाती है, जब थाने से उसका कोई जानने वाला उसे केस के बारे में बताता है, तब वह चला जाता है, और बड़ी सादगी से, बिना किसी चालाकी के वकील की भूमिका निभाता है और इत्तेफाक से, बहुत बड़े वकील के मुक़ाबले जीत भी जाता है|


‘कागज’ फिल्म में पंकज जी ने एक ऐसे सीधे-साधे देहाती व्यक्ति की भूमिका निभाई है, जिसको उसके संबंधी जमीन हड़पने के लिए सरकारी अभिलेखों में मृत घोषित करा देते हैं| इन परिस्थितियों में वह सीधा-सादा व्यक्ति कैसे स्वयं को जीवित घोषित कराने के लिए संघर्ष करता है, उसको पंकज जी ने बहुत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है| एक बात और, इस फिल्म में पंकज जी वेश-भूषा और दिखाई देने में, बिलकुल ‘तीसरी कसम’ के राज कपूर लगते हैं|


आज के लिए ये दो भूमिकाएँ अचानक याद आयीं, वैसे तो उनकी हर भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही है, मिर्जापुर सीरीज़ के भाग 1 और 2 में भी, एक गैंगस्टर- अखंडानन्द त्रिपाठी बनाम ‘कालीन भैया’ के रूप में उनकी भूमिका के लिए उन्हें बहुत पसंद किया गया| उनकी इस भूमिका को देखकर फिल्मों के विख्यात खलनायक अजीत की याद आती है, जो सामने वाला जब चिल्लाकर उनको धमकी देता है, तब बड़े सहज भाव से बोलते है, ‘जरा अपने पीछे तो देख लो’, जहां उनके गुंडे उसको घेरे खड़े होते हैं| मतलब खलनायक या गैंगस्टर होने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि आप चिल्लाकर बोलें|


पंकज जी की यादगार भूमिकाएँ अनेक हैं, यहाँ बस कुछ का ही उल्लेख कर रहा हूँ, जैसे- ओंकारा, गैङ्ग्स ऑफ वासेपुर, गुंजन सक्सेना, लूडो, बरेली की बर्फी, स्त्री, न्यूटन, सुपर 30, मसान आदि-आदि|


मैं यही शुभकामना करता हूँ कि पंकज जी इसी प्रकार बेहतरीन भूमिकाएँ निभाते रहें और सफलता की नई ऊंचाइयों को छुएँ|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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यह अँधेरे की पिटारी, रास्ता यह साँप-सा!

हिन्दी साहित्य में मेरी विशेष रुचि है और मैं अक्सर इसी विषय में लिखता हूँ और कविताएं आदि शेयर करता हूँ| लेकिन मेरी एक कमजोरी है, मुझे गीत-कविताओं से ज्यादा लगाव है और मैं उनको ज्यादा शेयर करता हूँ|

लीजिए मैं आज स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जो कविता के प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक थे और ‘दिनमान’ नामक समाचार पत्रिका में कार्य कराते थे| पहले अज्ञेय जी और बाद में रघुवीर सहाय जी द्वारा संपादित यह पत्रिका, भारतवर्ष में इस प्रकार की पहली ‘समाचार पत्रिका’ थी|


लीजिए आज मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता, जो जीवन के दौरान की जाने वाली भौतिक और आंतरिक यात्राओं के संघर्ष को अभिव्यक्ति देती है-

यह सिमटती साँझ,
यह वीरान जंगल का सिरा,
यह बिखरती रात, यह चारों तरफ सहमी धरा;
उस पहाड़ी पर पहुँचकर रोशनी पथरा गयी,
आख़िरी आवाज़ पंखों की किसी के आ गयी,
रुक गयी अब तो अचानक लहर की अँगड़ाइयाँ,
ताल के खामोश जल पर सो गई परछाइयाँ।


दूर पेड़ों की कतारें एक ही में मिल गयीं,
एक धब्बा रह गया, जैसे ज़मीनें हिल गयीं,
आसमाँ तक टूटकर जैसे धरा पर गिर गया,
बस धुँए के बादलों से सामने पथ घिर गया,
यह अँधेरे की पिटारी, रास्ता यह साँप-सा,
खोलनेवाला अनाड़ी मन रहा है काँप-सा।


लड़खड़ाने लग गया मैं, डगमगाने लग गया,
देहरी का दीप तेरा याद आने लग गया;
थाम ले कोई किरन की बाँह मुझको थाम ले,
नाम ले कोई कहीं से रोशनी का नाम ले,
कोई कह दे, “दूर देखो टिमटिमाया दीप एक,
ओ अँधेरे के मुसाफिर उसके आगे घुटने टेक!”


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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सौ बातों की एक बात है !

लीजिए आज फिर से मैं कभी काव्य-मंचों के अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने बड़ी भावुकता के साथ यह चित्रण किया है, कि किस प्रकार हमको जीवन के सभी रंगों, सभी प्रकार की परिस्थितियों, कभी साथ और कभी अकेलेपन का सामना करना पड़ता है|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-



सौ बातों की एक बात है ।

रोज़ सवेरे रवि आता है।
दुनिया को दिन दे जाता है,
लेकिन जब तम इसे निगलता,
होती जग में किसे विकलता|
सुख के साथी तो अनगिन हैं,
लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं|

सौ बातो की एक बात है |


अनगिन फूल नित्य खिलते हैं,
हम इनसे हँस-हँस मिलते हैं|
लेकिन जब ये मुरझाते हैं,
तब हम इन तक कब जाते हैं|
जब तक हममे साँस रहेगी,
तब तक दुनिया पास रहेगी|

सौ बातों की एक बात है |


सुन्दरता पर सब मरते हैं,
किन्तु असुंदर से डरते हैं|
जग इन दोनों का उत्तर है,
जीवन इस सबके ऊपर है|
सबके जीवन में क्रंदन है,
लेकिन अपना-अपना मन है|

सौ बातों की एक बात है ।



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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फ़ाइल के कोरे पन्ने भरते-भरते!


कविताओं के बारे में, एक बात कहना चाहूँगा, मैं यहाँ जो कविताएं शेयर करता हूँ, अधिकतर वे हमारे जमाने के कवियों की होती हैं, जो कवि सम्मेलनों में अपनी गीत-कविताओं के माध्यम से धूम मचाते थे| अब तो कवि सम्मेलनों का वैसा वातावरण नहीं रहा और मैं भी गोवा में हूँ, जहां ऐसी गतिविधियां देख-सुन पाना और भी मुश्किल है|

हाँ तो आज फिर से मैं कभी काव्य-मंचों के लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय बालस्वरूप राही जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने जीवन की, विशेष रूप से नौकरी-पेशा लोगों के जीवन की विसंगतियों का चित्रण किया गया है|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय डॉ बालस्वरूप राही जी का यह गीत-


जो काम किया, वह काम नहीं आएगा,
इतिहास हमारा नाम नहीं दोहराएगा|
जब से सुरों को बेच ख़रीदी सुविधा,
तब से ही मन में बनी हुई है दुविधा|
हम भी कुछ अनगढा तराश सकते थे,
दो-चार साल अगर समझौता न करते ।


पहले तो हम को लगा कि हम भी कुछ हैं,
अस्तित्व नहीं है मिथ्या, हम सचमुच हैं|
पर अकस्मात ही टूट गया वह संभ्रम,
ज्यों बस आ जाने पर भीड़ों का संयम|
हम उन काग़जी गुलाबों से शाश्वत हैं,
जो खिलते कभी नहीं हैं, कभी न झरते ।


हम हो न सके जो हमें होना था,
रह गए संजोते वही कि जो खोना था|
यह निरुद्देश्य, यह निरानन्द जीवन-क्रम,
यह स्वादहीन दिनचर्या, विफल परिश्रम|
पिस गए सभी मंसूबे इस जीवन के,
दफ़्तर की सीढ़ी चढ़ते और उतरते ।


चेहरे का सारा तेज निचुड़ जाता है,
फ़ाइल के कोरे पन्ने भरते-भरते|
हर शाम सोचते नियम तोड़ देंगे हम,
यह काम आज के बाद छोड़ देंगे हम|
लेकिन वह जाने कैसी है मजबूरी,
जो कर देती है आना यहाँ ज़रूरी|

खाली दिमाग़ में भर जाता है कूड़ा,
हम नहीं भूख से, खालीपन से डरते ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|


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किसान आंदोलन और कम्युनिस्टों के मंसूबे!

किसान नेताओं के साथ सरकार की वार्ता के एक और दौर में सफलता नहीं मिल पाई, कम्युनिस्ट लोग और हताश कांग्रेसी प्रसन्न होंगे कि उनके मंसूबे अभी तक कामयाब हो रहे हैं| मैं विशेष रूप से इस सच्चाई का उल्लेख करना चाहूँगा कि इस आंदोलन के नेतृत्व में 40 किसान संघों के नेता हैं, जिनमें से कोई अपने को दूसरे किसी दूसरे से कम नहीं समझता| किसी आंदोलन के संबंध में वार्ता का नतीजा तब निकलना संभव होता है, जब उसका एक नेता हो और उसके साथ मुद्दों पर चर्चा करके समझौता किया जा सके| भीड़ को कोई बात समझाई जा सकती है क्या?

विशेष रूप से कम्युनिस्टों को ऐसा वातावरण बने रहने से बहुत सुख मिलता है| साम्यवाद का जो दर्शन है वो एक ऐतिहासिक सच्चाई है| कोई समय था जब रूस में या चीन में इस दर्शन की सार्थकता थी| लेकिन आज लगभग पूरा विश्व इस पार्टी को नकार चुका है (मैं दर्शन की बात नहीं करूंगा, उसकी ऐतिहासिक प्रासंगिकता हो सकती है)|


अपने देश में देखें तो पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक कम्युनिस्ट शासन रहा| बंगाल जो कभी औद्योगिक दृष्टि से अत्यंत संपन्न प्रदेशों में गिना जाता था, वहाँ इन लोगों ने कोई उद्योग नहीं पनपने दिया और आज बंगाल गरीबी का एक बहुत बड़ा शो-रूम बन गया है|


कम्युनिस्ट दर्शन देखा जाए तो अधूरा दर्शन है| जो व्यवस्था चल रही है उसको छिन्न-भिन्न कर दोगे| खास तौर पर भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में तो आंदोलनों, हड़तालों के अधिकार का दुरुपयोग करते हुए आप ये काम कर ही सकते हैं| और अगर आप किसी तरह सफल हो जाते हैं और आपकी व्यवस्था लागू हो जाती है, तब क्या होता है?


मैंने कहीं पढ़ा था कि ख्रुश्चेव के बाद के एक नेता, अपने भाषण में उनकी आलोचना कर रहे थे, भीड़ में से एक व्यक्ति ने पूछा जब वे गलत काम कर रहे थे, तब आप कहाँ थे? उन नेताजी ने पूछा ये प्रश्न किसने पूछा है, हाथ उठाएँ?कोई जवाब नहीं आया| वो नेता बोले मैं उस समय वहीं था, जहां इस समय आप हैं! यह भी कहा जाता है कि किसी बड़े नेता के भाषण के बाद जो पहले ताली बजाना बंद कर देता उसको विद्रोही मान लिया जाता है| और ‘थियानमान चौक’ का नरसंहार तो आपको याद ही होगा, इससे आप समझ सकते हैं कि कम्युनिस्ट विरोध को किस तरह बर्दाश्त करते हैं!


लेकिन जब से मोदी सरकार आई है तब से कम्युनिस्ट विशेष रूप से सक्रिय हैं| लोगों से आपको वोट तो मिलते नहीं हैं, कोई सकारात्मक काम आप नहीं कर सकते, लेकिन लोगों को भड़का तो सकते हैं, भ्रमित तो कर सकते हैं| इतने बड़े देश में आपको विशेष रूप से पंजाब और थोड़े बहुत अन्य एक-दो राज्यों के कुछ किसान मिल गए, बाकी आपके कार्यकर्ता! रास्ते रोकने के लिए तो इतना बहुत है!


मुझे लगता है कि उच्चतम न्यायालय को ऐसे मामलों में रुचि लेकर निर्देश देने चाहिएं, क्योंकि सरकार की आगे बढ़ने की सीमाएं हैं| देशहित में यह ज़रूरी है कि कम्युनिस्टों के ऐसे मंसूबों को नाकाम किया जाए जिसमें वे संसद में पारित किसी कानून के विरोध में जनजीवन को अस्त-व्यस्त करके सरकार को ब्लैक-मेल करना चाहते हैं| अगर किसी कानून का विरोध करना है तो जनसामान्य को बाधा पहुंचाए बिना आप यह काम करें और कानून को न्यायालय में चुनौती दें, लेकिन उसमें भी तो इन कम्युनिस्टों की आस्था नहीं है|


आज ऐसे ही किसान आंदोलन के बहाने कम्युनिस्टों की अव्यावहारिक और विध्वंसक भूमिका के बारे में बात करने का मन हुआ, तो ये बातें कह दीं|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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इंसान कहाँ तक पहुँचे!

हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी को ‘गीतों का राजकुंवर’ भी कहा जाता है और हमारी फिल्मों को भी उन्होंने अनेक यादगार गीत दिए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ उनका यह गीत-

हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे ।
होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे ।

इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे ।

वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी, न बिरहमन, न वो शेख,
वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुँचे ।

एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबाँ,
कल को शायद मेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचे ।


चाँद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख,
देखना ये है कि इंसान कहाँ तक पहुँचे ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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भाजपा की वेक्सीन!

भारतवर्ष के आबादी की दृष्टि से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री रहे श्रीमान अखिलेश यादव ने आज एक बयान दे डाला| अपने इस बयान के माध्यम से श्रीमान यादव जी ने यह बता दिया की खानदानी विरासत के दम पर भले ही श्रीमान जी इतने बड़े राज्य के मुख्य मंत्री तक रह चुके हों, परंतु वे भीतर से कितने बौने हैं, यह उनके इस बयान से ज़ाहिर होता है|

वैसे आज का दिन एक ऐतिहासिक दिन है, जबकि देश में बनी दो-दो कोरोना वेक्सीन्स को आपातकालीन उपयोग की अनुमति मिल गई है, और आशा की जाती है की यह कोरोना को देश से समाप्त करने की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित होगी|


परंतु अखिलेश बबुआ ने कहा है कि ये ‘बीजेपी’ की वेक्सीन है और वो इसको नहीं लगवाएंगे| मुझे लगता है कि किसी राजनेता द्वारा इससे घटिया बयान नहीं दिया जा सकता!


बीजेपी पार्टी से आपकी राजनैतिक लड़ाई है, वह आप लड़ते रहिए परंतु यह वेक्सीन देश के वैज्ञानिकों ने अथक परिश्रम से तैयार की हैं| सरकार की इसमें अगर कोई भूमिका है तो वह फंड उपलब्ध कराने और वैज्ञानिकों की टीम को प्रोत्साहित करने तक ही सीमित हो सकती है| इस प्रकार अखिलेश बाबू ने अपने इस द्वेष और मूर्खता से भरे बयान के द्वारा हमारे वैज्ञानिकों का अपमान किया है, जिसके लिए उनकी घोर निंदा की जानी चाहिए|


वैसे भी मोदी जी के सत्तारूढ़ होने के बाद बेचारे विरोधी नेताओं के पास कोई काम नहीं रहा गया है, वे किसानों को भ्रमित कर रहे हैं और जहां भी संभव हो दुष्प्रचार कर रहे हैं| उसी कानून की प्रतियाँ फाड़ रहे हैं, जिसे वो पहले ‘नोटिफ़ाई’ कर चुके हैं| आशा है कभी तो ऊपर वाला उनकी सुनेगा!


परंतु अखिलेश जी, परिस्थिति कैसी भी हो, इतना नीचे उतरना तो ठीक नहीं है| यह लोगों की जान बचाने का मामला है और इस मामले में ओछी राजनीति ठीक नहीं है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तुम्हारा मन नहीं छूते!

आज एक बार फिर से मैंने अपने एक प्रिय कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर करना चाहा और किया भी, लेकिन मालूम हुआ की मैं कुछ महीने पहले ही उसे शेयर कर चुका था|


लीजिए अब प्रस्तुत कर रहा हूँ उनका यह गीत-

नीम तरू से फूल झरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है|

रीझ, सुरभित हरित -वसना
घाटियों पर
व्यँग्य से हँसते हुए
परिपाटियों पर
इँद्रधनु सजते- सँवरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है|


गहन काली रात
बरखा की झड़ी में
याद डूबी ,नींद से
रूठी घड़ी में
दूर वँशी -स्वर उभरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है|


वॄक्ष, पर्वत, नदी,
बादल, चाँद-तारे
दीप, जुगनू , देव–दुर्लभ
अश्रु खारे
गीत कितने रूप धरते हैँ
तुम्हारा मन नहीँ छूते
बड़ा आश्चर्य है|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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