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पेलोलिम- गोवा की एक खूबसूरत ‘बीच’!

गोवा में रहते हुए कई वर्ष बीत चले, जब लोग यहाँ बाहर से घूमने के लिए आते हैं, तब उनका लक्ष्य होता है कि सीमित समय में जितना हो सकता है, उतना गोवा देख लें| मुख्य आकर्षण तो यहाँ के समुद्र-तट, यहाँ की खूबसूरत ‘बीच’ ही हैं, कुछ पुराने चर्च, फोर्ट आदि हैं, जहां फिल्मों की शूटिंग भी होती रहती है|

जैसा मैंने पहले भी बताया है, मेरे घर के सामने ही ‘मीरामार बीच’ का इलाका है, बॉल्कनी से ही ‘बीच’ दिखाई देती है और वहाँ जाने के लिए बस सड़क पार करनी होती है, बाईं तरफ बढ़ जाओ तो ‘दोना पावला व्यू पाइंट’, जिसे ‘लवर्स पाइंट’ भी बोलते हैं और दाहिनी तरफ जाने पर ‘मीरामार बीच’| मेरी शाम की सैर ‘बीच’ के साथ-साथ ही होती है| बहुत अच्छा लगता है जब लोगों को अपनी फोटो में शाम के डूबते सूरज को ‘ट्रिक’ से अपनी मुट्ठी में कैद करने अथवा हथेली पर रखने का उपक्रम करते देखता हूँ, और फोन पर उत्साह से यह बताते हुए सुनता हूँ, ‘मैं अभी मीरामार बीच पर हूँ’|

खैर क्योंकि अब गोवा में ही हूँ, इसलिए कोई जल्दी नहीं रहती सभी जगहों को देखने का टार्गेट पूरा करने की| क्योंकि पणजी में ही हूँ, तो यहाँ का चर्च, बाज़ार, कला अकादमी आदि तो देखते ही रहते हैं| आधा गोवा तो हमने परिवार के साथ बाहर ‘डिनर’ करने के क्रम में देख लिया है| बच्चों को इस बात की जानकारी रहती है कि आजकल कहाँ अच्छा खाना और सर्विस मिलती है|

अब मैं आज के इस आलेख के मुख्य विषय पर आता हूँ| जैसे मीरामर, केलेंगुट, वाघा आदि बहुत सी बीच तो हम गाड़ी में घूमते हुए पहले ही देख आए हैं| पिछले माह हम उत्तरी गोवा में ‘आरंबोल’ बीच गए थे, जो बहुत खूबसूरत बीच मानी जाती है, वहाँ हमने दो दिन का प्रवास किया था और वह बहुत अच्छा अनुभव रहा था|

इस बार हमारा प्रोग्राम बना दक्षिणी गोवा में ‘पेलोलिम’ बीच जाने का, जिसके बारे में मेरे बेटे ने बताया कि यह गोवा की सबसे खूबसूरत ‘बीच’ है| मैं यह भी बता दूँ कि हम गोवा में पिछले 3-4 वर्ष से हैं लेकिन मेरे बेटे यहाँ आने से पहले ही गोवा को खंगाल चुके थे|

हाँ तो, ‘पेलोलिम’ बीच के बगल में ही रुकने के लिए ‘आर्ट रिज़ॉर्ट’ है जिसमें बहुत खूबसूरत तरीके से समुद्र के किनारे ही ‘कॉटेज’ बनाए गए हैं और पेंटिंग्स का डिस्प्ले आदि, सभी कुछ अत्यंत सुरुचिपूर्ण है|

इन स्थानों की प्राकृतिक सुंदरता तो देखने और अनुभव करने के लिए ही होती हैं, मैं इनका वर्णन क्या कर पाऊँगा, लोगों ने यहाँ समुद्र में बैठक करने का खूब आनंद लिया और बोटिंग के लिए आसपास के कुछ स्थलों को भी देखा, जिनमें ‘बटरफ्लाई बीच’, ‘हनीमून बीच’ आदि शामिल हैं| एक अनुभव जो अब तक नहीं हो पाया था, वह है बोटिंग के दौरान ‘डॉल्फ़िंस’ को देखने का, इससे पहले कई स्थानों पर हम गए थे, परंतु नहीं देख पाए थे, यहाँ उनको भी देख लिया, यद्यपि उनके शरीर का कुछ भाग ही पानी से बाहर निकलते हुए देखा, परंतु अनेक बार देखा| ऐसा लगता है कि ‘डॉल्फ़िंस’ के कुछ परिवार उस क्षेत्र में थे|



कुल मिलाकर ‘पेलोलिम’ बीच पर दो दिन का यह प्रवास बहुत अच्छा अनुभव रहा और गोवा ‘विजिट’ पर आने वाले साथी इसको भी अपने गंतव्य स्थलों में शामिल कर सकते हैं और चाहें तो कुछ दिन यहाँ बिता सकते हैं|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अणु-अणु का कंपन जान चली!

मैंने छायावाद युग के कीर्तिस्तंभ रहे महाकवियों पंत, प्रसाद और निराला जी की एक-एक रचना शेयर करते हुए उस युग की एक झलक दिखाने का प्रयास किया था| बाद में मुझे खयाल आया कि महादेवी जी को शामिल किए बिना तो छायावाद युग की एक झलक देना भी संभव नहीं है| फिर जैसे मैंने निराला जी की उदारता और फक्कड़पन का उल्लेख किया था, उनको इस फक्कड़पन के बावजूद संभाले रखने में भी महादेवी जी का बहुत बड़ा हाथ है| उनके बीच जैसा स्नेह था, वैसा आज के कवियों के बीच कम ही देखने को मिलता है|
महादेवी जी की आज की इस रचना में उन्होंने जीवन के सभी पक्षों के आस्वादन के अनुभव का बहुत सुंदर वर्णन किया है –



अलि, मैं कण-कण को जान चली
सबका क्रन्दन पहचान चली|

जो दृग में हीरक-जल भरते
जो चितवन इन्द्रधनुष करते,
टूटे सपनों के मनकों से
जो सूखे अधरों पर झरते|


जिस मुक्ताहल में मेघ भरे
जो तारों के तृण में उतरे,
मैं नभ के रज के रस-विष के
आँसू के सब रंग जान चली।

जिसका मीठा-तीखा दंशन,
अंगों मे भरता सुख-सिहरन,
जो पग में चुभकर, कर देता
जर्जर मानस, चिर आहत मन;


जो मृदु फूलों के स्पंदन से
जो पैना एकाकीपन से,
मैं उपवन निर्जन पथ के हर
कंटक का मृदु मत जान चली।

गति का दे चिर वरदान चली।
जो जल में विद्युत-प्यास भरा
जो आतप में जल-जल निखरा,
जो झरते फूलो पर देता
निज चंदन-सी ममता बिखरा;


जो आँसू में धुल-धुल उजला;
जो निष्ठुर चरणों का कुचला,
मैं मरु उर्वर में कसक भरे
अणु-अणु का कंपन जान चली,
प्रति पग को कर लयवान चली।

नभ मेरा सपना स्वर्ण रजत
जग संगी अपना चिर विस्मित
यह शूल-फूल कर चिर नूतन
पथ, मेरी साधों से निर्मित,


इन आँखों के रस से गीली
रज भी है दिल से गर्वीली
मैं सुख से चंचल दुख-बोझिल
क्षण-क्षण का जीवन जान चली!
मिटने को कर निर्माण चली!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जब हम दोनो ज़ुदा हुए


आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|


आज फिर से अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

हम दोनो जब ज़ुदा हुए
खामोशी और आंसुओं के बीच,
टूटे हुए दिल के साथ,
बरसों तक दूर रहने के लिए,
तुम्हारे गाल पीले और ठंडे हो गए थे,
तुम्हारा चुंबन भी बहुत ठंडा हो गया था,
बेशक वह घड़ी जाहिर कर रही थी
इसके लिए अफसोस।


सुबह की ओस
मेरी भौंह पर जम गई-
मुझे लगा जैसे उस भवितव्य की चेतावनी दे रही हो
जो मुझे अब महसूस हो रहा है।
तुम्हारी कसमें सभी टूट चुकी हैं,
और प्रकाश की तरह तुम्हारी ख्याति है,
मैं सुनता हूँ लोगों को तुम्हारा नाम पुकारते,
और उसकी शर्म में डूब जाता हूँ।


वे मेरे सामने तुम्हारा नाम लेते हैं,
जिसकी गूंज मुझे झकझोर जाती है,
मुझे कंपकंपी सी आ जाती है-
तुम इतनी प्यारी क्यों थीं?
वे नहीं जानते हमारे संबंध के बारे में,
तुमको इतनी अच्छी तरह कौन जानता था-
मैं बहुत लंबे समय तक तुम्हारे लिए पछताता रहूंगा,
इतनी गहराई से कि मैं कह नहीं सकता।


हम गुप्त रूप से मिले-
और खामोशी में हम दुखी होते हैं,
कि तुम्हारा दिल भूल जाए,
तुम्हारी आत्मा धोखा न दे दे,
अगर मैं तुम्हें फिर से मिलूं
बहुत बरसों। के बाद,
तो किस तरह मैं तुम्हारा स्वागत करूंगा?-
खामोशी और आंसुओं के साथ।


– लॉर्ड बॉयरन

और अब मूल अंग्रेजी कविता-

When We Two Parted

When we two parted
In silence and tears,
Half broken-hearted,
To sever for years,
Pale grew thy cheek and cold,
Colder thy kiss;
Truly that hour foretold
Sorrow to this.


The dew of the morning
Sank chill on my brow—
It felt like the warning
Of what I feel now.
Thy vows are all broken,
And light is thy fame:
I hear thy name spoken,
And share in its shame.


They name thee before me,
A knell to mine ear;
A shudder comes o’er me—
Why wert thou so dear?
They know not I knew thee,
Who knew thee too well:—
Long, long shall I rue thee
Too deeply to tell.


In secret we met—
In silence I grieve
That thy heart could forget,
Thy spirit deceive.
If I should meet thee
After long years,
How should I greet thee?—
With silence and tears.


– Lord Byron


नमस्कार।
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गीत ऋषि- देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’

आज के समय में काव्य-लेखन को साधना का नाम देने का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता| आज अधिकांश लोग लिखना शुरू करते हैं तो उनके सामने एक लक्ष्य होता है, वह मंच हो या किसी अन्य प्रकार से प्रकाशन-प्रसारण आदि के माध्यम से कमाई और ख्याति अर्जित करना|

इन परिस्थितियों में स्वर्गीय देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ जी जैसे लोग आज की दुनिया में लगभग नहीं के बराबर हैं| मेरे साहित्यिक मित्र श्री योगेंद्र दत्त शर्मा के, फेसबुक में लिखे गए आलेख के माध्यम से ज्ञात हुआ कि श्री देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ जी नहीं रहे, जीवन है तो मृत्यु भी इससे जुड़ी एक सच्चाई है, परंतु यह समाचार सुनकर कुछ पुरानी यादें उमड़ आईं, इस बहाने से आज मैं कविता और विशेष रूप से नवगीत को समर्पित इस महान व्यक्तित्व का स्मरण करना चाहूँगा, जिन्होंने आज भी काव्य-लेखन को एक साधना का रूप दिया हुआ था|

एक बात और बताना चाहूँगा, मेरा विवाह भी इंद्र जी ने अपनी रिश्तेदारी में करा दिया था और इस प्रकार हम रिश्तेदार भी थे, परंतु इंद्र जी का रिश्तों की औपचारिकता में बिल्कुल विश्वास नहीं था, वे बोलते थे- ‘रिश्ता तोड़कर रिश्ता जोड़िए’|

मैं यहाँ संदर्भ के लिए बताना चाहूँगा कि मेरे बचपन से लेकर कुछ प्रारंभिक नौकरियां करने तक का समय, दिल्ली-शाहदरा में बीता जहां ‘इंद्र’ जी श्याम लाल कालेज में पढ़ाते थे| वहीं कवि गोष्ठियों में उनसे मिलने का सिलसिला प्रारंभ हुआ, मेरे वरिष्ठ कवि मित्र- श्री धनंजय सिंह के माध्यम से ही मेरा अधिकांश कवियों से मिलना हुआ और इंद्र जी से मुलाक़ात भी उनके माध्यम से ही हुई|


एकांत साधना क्या होती है, इसका उदाहरण मुझे इंद्र जी के जीवन में ही देखने को मिला| मैं भी उस समय थोड़ा बहुत गीत आदि लिख लेता था, और उसके लिए मुझे इंद्र जी जैसे अत्यंत वरिष्ठ कवि से जो प्रशंसा मिलती थी, उसको सुनकर मैं वास्तव में शर्मिंदा महसूस करता था| मैं काफी कम बोलता हूँ, इस पर इंद्र जी कहते थे ‘क्या तुमने कसम खाई है कि, जब बोलोगे गीत ही बोलोगे’!


खैर दिल्ली मैंने बहुत पहले 1980 में छोड़ दी थी, अतः लंबे समय से मैं इंद्र जी से संपर्क में नहीं था| इतना अवश्य कहना चाहता हूँ कि इंद्र जी की धर्मपत्नी का बहुत पहले स्वर्गवास हो चुका था और उनके बेटे भी उनके पास नहीं रहते थे, एक पुत्री थी जो उस समय जवान होने को थी लेकिन मानसिक रूप से अविकसित थी, बच्चों जैसी हरकतें करती थी, बाद में क्या स्थिति हुई पता नहीं, उस बच्ची के कारण वे कहीं जा भी नहीं पाते थे, ऐसे में वह क्या लगन थी जो उनसे निरंतर गीत लिखवाती जाती थी!


दिल्ली छोड़ने के बाद की एक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा, मैं उस समय हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की खेतड़ी इकाई में काम करता था| मैंने चाहा कि इंद्र जी जैसे श्रेष्ठ रचनाकारों को भी कविता के मंच पर आना चाहिए| मैंने उनसे निवेदन किया तो उनकी शर्त वही थी, जिसे मैं जानता था, उन्होंने कहा कि मैं कोई मानदेय नहीं लूँगा| वे मानते थे कि कविता तो उनकी मानस-पुत्री है और बेटी की कमाई नहीं खानी चाहिए| खैर वे आयोजन में आए और हमने उनका सम्मान करने का सौभाग्य प्राप्त किया| यह संभवतः 1987 की बात है|


इंद्र जी के अनेक काव्य संकलन प्रकाशित हुए हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने नवगीत, ग़ज़ल और दोहे- सभी क्षेत्रों में अपना उत्कृष्ट योगदान किया है|


बातें तो बहुत सारी हो सकती हैं, उस एकांत साधना करने वाले नवगीत विधा के शिखर पुरुष के संबंध में, परंतु मैं यहाँ उनका एक गीत शेयर करके उनको अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहूँगा-


फूलों के बिस्तर पर
नींद क्यों नहीं आती,
चलो, कहीं सूली पर, सेज हम बिछाएँ ।

दूर-दूर तक कोई
नदी नहीं दिखती है ।
हिरणों की आँखों में
रेत प्यास लिखती है ।
घाटी में हँसते हैं,
बुत ही बुत पत्थर के,
चलो, कहीं सूने में, ख़ुद से बतियाएँ ।


आग हुई धुआँ-धुआँ
अँधियारा गहराया ।
पेड़ों पर पसर गया
गाढ़ा काला साया ।
आगे है मोड़ों पर
बियाबान सन्नाटा
चलो, कहीं पिछली पगडण्डी गुहराएँ ।


तुम से जो मुमकिन था
अभिनय वह ख़ूब किया ।
वह देखो सूर्यध्वज
जुगनू ने थाम लिया ।
मंच पर उभरने को
एक भीड़ आतुर है,
चलो, कहीं पर्दे के पीछे छिप जाएँ ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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Faith, Belief and Motivation!

We humans are one of the millions of species that exist in the universe. We keep thinking about our life, aims and how to achieve our goals, how to succeed in life. Do we ever think whether other living beings also have some goals, dreams or aspirations in life and whether they are on the right path to achieve them!



Among the many things, items and devices man has created or invented, I think robots fit in the space, that we human beings occupy amongst the creations of God. Though I have not come across any complete Robot yet, only seen them in movies etc. In some stories we witnessed that the robot didn’t perform as per its programming. I wonder God almighty might also be thinking after seeing our performance that this person is not performing as per the original programming!


Anyway, it is a fact that we are the special creatures in the universe, God almighty loves us and created us to do some special things in the world and make our planet a better place to live, while achieving our personal goals also.


Every individual has his own individual goals and also a role in making this world worth living in some way or the other. We all work for each other in some way or the other and in this way achieve the goals set for ourselves and help the society to perform better.


In any case everybody first thinks about his or her own well being and that of the individual family. Human life is such a complicated thing that nobody else can guide us in every field. There is no set formula that everybody can follow in his or her life to achieve success.


The only thing is that we learn from the examples of other people. Like some scientist who failed 100 times, he said now I know that these 100 ways are not to be used for achieving this goal. A political leader who lost elections at every level, finally became the President of America.
So, the basic thing is that we must keep trying, keep our hopes alive, be prepared to accept challenges, study our own conditions and requirements and make own progression plan.

While doing all that we can learn from the lives of other people, not necessarily from the rich and powerful people, but also from other ordinary people, from their success and failures.


Yes, in this process, the motivational and self-help books might prove helpful to some extent, since these normally are based on real life examples and personal experiences of many people. The vital part of it, that I too believe is that faith makes the biggest contribution in our success. If we ourselves accept defeat, then nobody can make us succeed and like we have read so many times, ‘One becomes the way he or she believes’. Our belief and faith make the biggest contribution in our success. What else do we have to supplement our efforts in achieving our goals.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Is life as simple and promising as our motivational and self-help books think? #FacileOptimism


Thanks for reading.

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थक गये हिरन चलते–चलते

आज एक बार फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि रहे स्वर्गीय किशन सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| किशन जी को अनेक बार सुनने और अनेक बार उनसे मिलने का अवसर मिला, ये मेरा सौभाग्य था, अत्यंत सरल, सौम्य और शालीन व्यक्ति थे|
 आज की रचना, में किशन सरोज जी ने जीवन की मृगतृष्णा को बहुत सुंदर  अभिव्यक्ति दी है- 

सैलानी नदिया के संग–संग
हार गये वन चलते–चलते|

फिर आईं पातियां गुलाबों की
फिर नींदें हो गईं पराई,
भूल सही, पर कब तक कौन करे
अपनी ही देह से लड़ाई|
साधा जब जूही ने पुष्प-बान
थम गया पवन चलते–चलते|

राजपुरुष हो या हो वैरागी
सबके मन कोई कस्तूरी,
मदिरालय हो अथवा हो काशी
हर तीरथ-यात्रा मजबूरी|
अपने ही पाँव, गंध अपनी ही,
थक गये हिरन चलते–चलते|
 
आज के लिए इतना ही
नमस्कार

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राजे ने अपनी रखवाली की!

छायावाद युग के स्तंभ रहे महाकवियों की एक रचनाएं शेयर करने के क्रम में मैं आज स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| निराला जी अपने युग से बहुत आगे के कवि थे और उनकी रचना ‘राम की शक्तिपूजा’ एक कालजयी रचना है| निराला जी को उनकी उदारता और फक्कड़पन के लिए विशेष रूप से जाना जाता है|


आज की इस रचना में उन्होंने सामंतशाही के वातावरण का वर्णन बहुत सुंदर तरीके से किया है –



राजे ने अपनी रखवाली की;
किला बनाकर रहा;
बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं ।
चापलूस कितने सामंत आए ।
मतलब की लकड़ी पकड़े हुए ।
कितने ब्राह्मण आए
पोथियों में जनता को बाँधे हुए ।


कवियों ने उसकी बहादुरी के गीत गाए,
लेखकों ने लेख लिखे,
ऐतिहासिकों ने इतिहास के पन्ने भरे,
नाट्य-कलाकारों ने कितने नाटक रचे
रंगमंच पर खेले ।
जनता पर जादू चला राजे के समाज का ।


लोक-नारियों के लिए रानियाँ आदर्श हुईं ।
धर्म का बढ़ावा रहा धोखे से भरा हुआ ।
लोहा बजा धर्म पर, सभ्यता के नाम पर ।
ख़ून की नदी बही ।


आँख-कान मूंदकर जनता ने डुबकियाँ लीं ।
आँख खुली– राजे ने अपनी रखवाली की ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बीती विभावरी जाग री!

दो दिन पहले ही मैंने छायावाद युग के एक स्तंभ रहे स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक रचना शेयर की थी| आज इसी युग के एक और महाकवि जयशंकर प्रसाद जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी को उनके महाकाव्य- ‘कामायनी’ के लिए विशेष रूप से जाना जाता है|


आज की इस रचना में सुबह होने का वर्णन उन्होंने किस तरीके से किया है, इसका आनंद लीजिए-



बीती विभावरी जाग री!

अंबर पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा नागरी!

खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर ला‌ई-
मधु मुकुल नवल रस गागरी|

अधरों में राग अमंद पिए,
अलकों में मलयज बंद किए,
तू अब तक सो‌ई है आली,
आँखों में भरे विहाग री!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे!

आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि श्री राजेश जोशी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, रचना अपनी बात स्वयं कहती है, इसलिए मैं अलग से कुछ नहीं कहूँगा, कुल मिलाकर यह विपरीत स्थितियों का सामना स्वाभिमान और खुद्दारी के साथ करने का संदेश देने वाली रचना है|


लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री राजेश जोशी जी की यह रचना –

जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएँगे

कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे,
जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे|

बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो
उनकी कमीज से ज्‍यादा सफ़ेद,
कमीज पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जाएँगे

धकेल दिये जाएंगे कला की दुनिया से बाहर,
जो चारण नहीं होंगे
जो गुण नहीं गाएंगे, मारे जाएँगे|


धर्म की ध्‍वजा उठाने जो नहीं जाएँगे जुलूस में,
गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफिर करार दिये जाएँगे|

सबसे बड़ा अपराध है इस समय, निहत्थे और निरपराधी होना,
जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया!

आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट|

वसीम बरेलवी साहब की एक गज़ल याद आ रही है, बस उसके शेर एक-एक करके शेयर कर लेता हूँ। बड़ी सादगी के साथ बड़ी सुंदर बातें की हैं, वसीम साहब ने इस गज़ल में। पहला शेर तो वैसा ही है, जैसा हम कहते हैं, कोई बहुत सुंदर हो तो उसको देखकर-

आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया।


ये बात तो उनकी हुई, कि उन्होंने अपनी झलक से जैसे मंत्रमुग्ध कर दिया हो, अब आपके पास क्या है मियां? आपकी बातें, आपके जज़्बात, आपका अंदाज-ए-बयां। उसके दम पर ही आपको तो अपनी छाप छोड़नी होगी न! आपने अपनी सारी प्रतिभा, सारी ईमानदारी, सब कुछ लगा दिया उसको प्रभावित करने में, लेकिन आखिर में हुआ तो बस इतना-

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया।


अब ये सब कैसे समझाया जाए कि जहाँ पर तबीयत जम जाए, ऐसा लगता है कि वो तो बस सामने ही रहे और हम उसको देखते रहें, लेकिन ऐसे में अचानक ऐसा होता है, और हम फिर से देखते ही रह जाते हैं-


वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया।


होता यह भी है आज के समय में कि जब आप अपनी खूबियों से, जो आपके अंदर हैं, उनसे लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, वहीं आज का समय ऐसा है, ऐसे लोग आज उभरकर सामने आते हैं कि उनके भीतर भले ही कुछ न हो, वे स्वयं को शाहरुख खान की तरह, मतलब कि जहाँ जैसी जरूरत है, जैसी डिमांड है, उस रूप में प्रस्तुत कर देंगे। गज़लों में अक्सर आशिक़-माशूक़ के रूप में बातें रखी जाती हैं, लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में वह कोई भी हो सकता है, आपका बॉस भी हो सकता है! जिसे आप अपनी भीतरी खूबसूरती से, अपनी प्रतिभा से, अपनी सच्चाई से प्रभावित करना चाहते हैं, और दूसरे लोग उसको अपने प्रेज़ेंटेशन से प्रभावित कर लेते हैं, और ऐसा बार-बार होता है, क्योंकि आपको तो अपनी सच्चाई पर ही भरोसा है-

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया।


अब आखिर में अचानक, मुझे डॉ. धर्मवीर भारती की लिखी एक कहानी याद आ रही है- ‘गुलकी बन्नो’, वैसे मुझको इसका ताना-बाना कुछ याद नहीं है, बस इतना है कि एक कन्या, जो बहू बनकर आई थी मुहल्ले के एक गरीब परिवार में, उस पर इतनी मुसीबतें आती हैं, इतनी बार वह टूटती है, मुसीबतें झेलती है, कुछ बार बहुत दिन तक नहीं दिखती, लेखक सोचता है कि मर-खप गई है, फिर अचानक दिखाई दे जाती है, शरीर कंकाल हो चुका है, लेकिन वही मुस्कान, दांत निपोरती हुई पहले की तरह्।

सच्चे लोगों की परीक्षा ज़िंदगी कुछ ज्यादा ही लेती है, और आखिरी शेर इस गज़ल का प्रस्तुत है-

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया।


आज वसीम बरेलवी साहब की इस गज़ल के बहाने आपसे कुछ बातें हो गईं।

नमस्कार।

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