68. पहुंचा कौन शिखर पर

एक विषय जिसके संबंध में बात करने का बहुत बार मन होता है, वह है टेलेंट की खोज से संबंधित प्रतियोगिताएं। अब वह गीत-संगीत हो, या नृत्य आदि हों सभी क्षेत्रों मे प्रतिभाओं की खोज के लिए प्रतियोगिताएं होती हैं। शुरू में इन प्रतियोगिताओं को जीतकर सामने आए प्रतियोगी तो सच में अपने क्षेत्रों में स्थापित हो गए लेकिन शायद बाद में इनको जीतने वाले उतना आगे, इस प्रतियोगिता में विजयी होने के बल पर न जा पाएं।

‘थ्री ईडियट्स’ के प्रतिभासंपन्न प्रोफेसर बताते थे न, कि दूसरा कौन आया, यह कोई याद नहीं रखता, इसी तरह शायद बाद में हुई प्रतियोगिताओं के विजेताओं को वह मुकाम हासिल नहीं हो पाता, जो शुरू में प्रतियोगिता जीतने वाले को मिलता है।

इसका उल्टा भी होता है, कॉमेडी शो का पुरस्कार जीतने वाले- कपिल शर्मा पहले व्यक्ति नहीं थे, लेकिन आज अपने शो के कारण, उनको जो मुकाम हासिल है, वो और किसी को नहीं है, इतना कि  इसके कारण वो अपने प्रिय मित्रों को अपमानित भी कर सकते हैं, जो वास्तव में उनको शोभा नहीं देता।

प्रतियोगिता के बल पर जहाँ अपनी प्रतिभा दिखाने और जनता में लोकप्रिय होने के अनेक अवसर आज खुले हैं, जिनसे लोग बाद में अपने ‘शो’ करके कमाई करते रह सकते हैं, वहीं एक शो ऐसा भी है, जिसमें प्रतिभा से ज्यादा तोता-रटंत और भाग्य की भूमिका होती है। सदी के महानायक- श्री अमिताभ बच्चन द्वारा संचालित यह ‘शो’-  ‘कौन बनेगा करोड़पति’, जिसमें जीत की रकम लगातार बढ़ती जा रही है, बेशक जितनी अधिक रकम आयोजक बांटेंगे, उसी अनुपात में उनकी कमाई की संभावना भी रहेगी, क्योंकि लोग अधिक देखेंगे तो विज्ञापन अधिक आएंगे  और ‘एसएमएस’ के माध्यम से भी कमाई अधिक होगी। इस ‘शो’ में पूरा-पूरा हाथ तोता रटंत का और उसके बाद किस्मत का होता है, मैं इसको प्रतिभा से जोड़कर नहीं देखता क्योंकि आपके सामने ऐसा प्रश्न आए, जिसका उत्तर आप जानते हों, जनता या आपके मित्र, आपको सही उत्तर बताएं, यह पूरी तरह किस्मत पर निर्भर है, क्योंकि ऐसा तो कोई व्यक्ति नहीं है, जिसे सभी संभावित प्रश्नों के सही उत्तर मालूम हों।

आज जबकि हर व्यक्ति भागकर कुतुब मीनार पर चढ़ जाना चाहता है, और उसको बताया जाता है कि आप ऐसा कर सकते हैं, तब ऐसे कार्यक्रमों का बढ़ते जाना स्वाभाविक है। एक दर्शक, श्रोता के रूप में अच्छे-अच्छे गायक-गायिकाओं को सुनने का मौका मिले, अन्य क्षेत्रों में कलाकारों का अच्छा प्रदर्शन देखने को मिले, यह अच्छी बात है।

मेरी चिंता उन लोगों के लिए है, जो बड़ी आस लेकर इस दौड़ में शामिल होते हैं, कुछ उनके अंदर होता है, उम्मीद भी होती है, लेकिन शिखर पर तो जगह बहुत सीमित होती है। एक प्रतियोगिता में, एक ही व्यक्ति प्रथम स्थान प्राप्त करता है, और माफ करें यह भी ज़रूरी नहीं है कि जो प्रथम स्थान प्राप्त करता अथवा करती है वह सर्वश्रेष्ठ हो, विशेष रूप से जबकि क्षेत्रीय आधार पर प्राप्त लोगों के वोट के कारण, इस बात की पूरी संभावना रहती है कि अच्छे कलाकार पहले ही बाहर निकल जाएं।

जब कोई प्रतियोगी बाहर निकलता है तब निर्णायकगण, जो कि बहुत से मामलों में मज़बूर भी होते हैं, वे अपनी     सहानुभूति भी दिखाते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ये प्रतियोगिताएं जो कलाकारों को आगे बढ़ाने के लिए होती हैं, कुछ मामलों में कलाकारों की आगे बढ़ने की संभावनाओं को समाप्त तो नहीं कर देतीं।

मैंने विशेष रूप से बच्चों के मामले में देखा है कि जहाँ उनके ऊपर दबाव होता है अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करने का, ऐसे में कोई बच्चा काफी आगे बढ़ने के बाद, जब अचानक बाहर हो जाता है, तब उसके बाल-मन पर कैसा गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, कोई नहीं देखता।

लेकिन भाई ‘लाइफ इज़ ए रेस, नोबॉडी नोज़ हू स्टूड सेकंड, वी ओनली नो हू वाज़ फर्स्ट’ । सो एंजॉय द गेम।

स्व. श्री मिलाप चंद राही के दो शेर, एक बार फिर याद आ रहा है-

खुदा करे कि तू बाम-ए-उरूज़ पर जाकर

किसी को देख सके, सीढ़ियां उतरते हुए।

रवां-दवां थी सियासत में रंग भरते हुए,

लरज़ गई है ज़ुबां, दिल की बात करते हुए।

 

नमस्कार।

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68. हाय रे हाय ओ दुनिया हम तेरी नज़र में आवारे

एक फिल्मी गाना याद आ रहा है, फिल्म थी- मैं नशे में हूँ, यह गीत राज कपूर पर फिल्माया गया है, शैलेंद्र जी ने लिखा है, शंकर जयकिशन का संगीत और आवाज़ है मेरे प्रिय गायक मुकेश जी की। बोल हैं-

हम हैं तो चांद और तारे

जहाँ के ये रंगी नज़ारे

हाय री हाय ओ दुनिया

हम तेरी नज़र में आवारे..

ये आवारगी भी अज़ीब चीज है, कहीं इसको पवित्र रूप भी दिया जाता है। यायावर कहते हैं, परिव्राजक कहते हैं, और भी बहुत से नाम हैं। जब हम एक रूटीन से बंधे होते हैं, तब हम चाहें तब भी आवारगी नहीं कर सकते। आवारगी में मुख्य भाव यही है कि कोई उद्देश्य इसमें नहीं होता, वैसे नकारात्मक अर्थों में ऐसी भी आवारगी होती है, जिसमें उद्देश्य गलत होता है, लेकिन उसके लिए कुछ दूसरे शब्द भी हैं, इसलिए उसको हम अपनी इस चर्चा में नहीं लाएंगे।

भंवरा जो फूलों पर मंडराता रहता है, वह भी प्रकृति की सुंदरता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, परागण करके, फूलों की सुंदरता को फैलाने में सहायक होता है। मधुमक्खी की आवारगी तो जैसे हमारे मधु-उद्योग को ही चलाती है, लेकिन कहीं अगर उनके इस कार्य के दौरान, उनके हत्थे चढ़ गए तो खैर नहीं। इंसान तो खैर बहुत चालाक है, उनकी मेहनत से भी खूब वसूली करता है, और इस काम में बाबा रामदेव भी पीछे नहीं रहते।

खैर निरपेक्ष भाव से गीतों, गज़लों में आए ‘आवारगी’ के ज़िक्र पर चर्चा करते हैं, पवित्र आवारगी के बारे में-

जिस गीत का उल्लेख पहले किया, उसमें ही आगे पंक्तियां हैं-

जीवन के ये लंबे रस्ते, काटेंगे गाते-हंसते,

मिल जाएगी हमको मंज़िल, एक रोज़ तो चलते चलते,

अरमान जवां हैं हमारे, छूने को चले हैं सितारे,

हाय रे हाय ओ दुनिया—

एक जोश है अपने दिल में, घबराए नहीं मुश्किल में,

सीखा ही नहीं रुक जाना, बढ़ते ही चले महफिल में,

करते हैं गगन पे इशारे, बिजली पे कदम हैं हमारे,

हाय रे हाय ओ दुनिया—

राहों में कोई जो आए, वो धूल बने रह जाए,  

ये मौज़ हमारे दिल की, न जाने कहाँ ले जाए,

हम प्यार के राजदुलारे, और हुस्न के दिल से सहारे,

हाय रे हाय ओ दुनिया, हम तेरी नज़र में आवारे।

एक और गीत है, जो भगवान दादा पर फिल्माया गया है-

हाल-ए-दिल हमारा, जाने न बेवफा ये ज़माना-ज़माना

सुनो दुनिया वालों, आएगा लौटकर दिन सुहाना-सुहाना।

एक दिन दुनिया बदलकर, रास्ते पर आएगी,

आज ठुकराती है हमको, कल मगर शर्माएगी,

बात ये तुम जान लो, अरे जान लो भैया।

दाग हैं दिल पर हज़ारों, हम तो फिर भी शाद हैं,

आस के दीपक जलाए देख लो आबाद हैं,

तीर दुनिया के सहे और खुश रहे भैया।

और फिर आवारगी की पवित्रता का संकल्प-

झूठ की मंज़िल पे यारों, हम न हर्गिज़ जायेंगे

हम ज़मीं की खाक सही पर, आसमां पर छाएंगे।

क्यूं भला दबकर रहें, डरते नहीं भैया।

आवारगी को प्रोमोट करने का मेरा कोई इरादा नहीं है, मेरा यही मानना है कि जो कवि-कलाकार होते हैं, वे मन से आवारा होते हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो लीक पर चलने वाले नहीं होते, अज्ञेय जी ने कहा, वे राहों के अंवेशी होते हैं। इस पवित्र आवारगी को प्रणाम करते हुए बता दूं कि इस विषय पर आगे भी बात करूंगा।

आखिर में गुलाम अली जी की गाई गज़ल का एक शेर-

एक तू कि सदियों से मेरे हमराह भी, हमराज़ भी,

एक मैं कि तेरे नाम से ना-आशना आवारगी।

नमस्कार।

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67. इसलिए प्यार को धर्म बना इसलिए धर्म को प्यार बना

एक बाबा को सज़ा का ऐलान होने वाला है।

अच्छा नहीं लगता कि बाबाओं को इस हालत से गुज़रना पड़े। हमारे देश में परंपरा रही है, राजा-महाराजाओं के ज़माने से, महाराजा दशरथ हों या कोई अन्य प्राचीन सम्राट, वे सभी महात्माओं को आदर देते थे, उनसे मार्गदर्शन लेते थे। मैं समझता हूँ यह परंपरा आज के लोकतांत्रिक शासकों तक जारी रही है।

एक विचार रहा है कि तामसिक वातावरण में, ऐश्वर्य और भोग-विलास के बीच रहते हुए व्यक्ति के विचार भ्रष्ट हो सकते हैं, इसलिए शासक महत्वपूर्ण और जनहित के मुद्दों पर अपने गुरू की सलाह लेते थे, जो इस राजसी वातावरण से दूर, नगर के किनारे एक कुटिया अथवा सादगीपूर्ण आश्रम में रहता था।

लेकिन आज जिस तरह के गुरुओं के कारनामे सामने आ रहे हैं, मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि वे स्वयं पुराने राजाओं से कहीं ज्यादा शान-औ-शौकत भरे, तामसिक माहौल में रहते है। संभव है कि इनकी शुरुआत यदि पवित्र भी रही हो, यह शान-औ-शौकत और निरंकुशता ही उनको बिगाड़ देती हो।

जहाँ तक आज की और सामान्य लोगों की बात है, मैं नहीं समझ पाता कि लोगों को गुरू बनाने की आवश्यकता क्यों होती है! ऐसा भी माना जाता है कि वह गुरू अपने चेलों को गुरुमंत्र देता है, जिससे उनका कल्याण सुनिश्चित होता है। और उस गुरुमंत्र के बदले, ये चेले अपने गुरू के आदेश पर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। मेरा इसमें कतई विश्वास नहीं है और मैं यह मानता हूँ कि यह खतरनाक है।

आजकल टीवी पर ढेर सारे गुरू प्रवचन देते हुए मिल जाते हैं। मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि मुझे अक्सर उनके प्रवचन सुनकर बहुत अच्छा लगता है। जैसे जब मुरारी बापू रामकथा करते हैं तब उसको सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं। ऐसे कई लोग हैं जिनको सुनना बहुत अच्छा लगता है।

जब आसाराम बापू प्रवचन देते थे तब वे भी बातें तो अच्छी करते थे परंतु उनका व्यक्तित्व और बॉडी लैंग्वेज मुझे कभी प्रभावित नहीं करते थे। विशेष रूप से जब वे सीटी बजाने लगते थे। आजकल तो सभी बाबा लोगों ने शायद बाबा रामदेव की प्रेरणा से, अपने साथ व्यवसाय भी काफी हद तक जोड़ लिया है।

जो बाबा अभी गिरफ्त में आए हैं, ये फिल्मों में रॉबिनहुड बनने के अलावा, किस तरह अपने भक्तों को प्रभावित करते थे, मुझे पता नहीं।

मैं परम प्रिय शिष्यों से यही अनुरोध करता हूँ कि जिस तरह आप आजकल अपने बच्चों को पढ़ाने वाले गुरुओं को परखते हैं, उसी तरह इन गुरुओं को भी परखें। इनके पास इतनी धन-संपत्ति जमा न होने दें कि उसके कारण ही इनका दिमाग खराब हो जाए।

सरकार चलाने वालों से भी अनुरोध करूंगा कि एक  व्यक्ति के रूप में आप इन गुरुओं पर श्रद्धा रख सकते हैं, इनको पैसों का दान भी दे सकते हैं, लेकिन अपनी जेब से, सरकारी पैसा आपके पिताजी का नहीं है!

जो श्रद्धा के केंद्र हैं, उनके प्रति नफरत विकसित हो, यह अच्छा नहीं लगता, इसलिए हे प्यारे शिष्यों, और जो शिष्य अंध भक्ति की ओर बढ़ रहे हैं, उनके आसपास के समझदार लोगों से भी अनुरोध है कि उन्हें समझाएं कि अंधभक्त न बनें। जो अच्छी बातें हैं, उनको ही स्वीकार करें।

एक और बात, जब ऐसी कोई घटना होती है, तब राजनैतिक रूप से सक्रिय स्वयंसेवक ऐसा वातावरण बनाने लगते हैं, कि हमारी मनचाही सरकार होती तो पता नहीं क्या होता, सारे दोष वर्तमान सरकार में ही हैं, ऐसे लोगों को बात करने के लिए कुछ लाशें भी मिल जाएं तो क्या बात है!

मुझे श्री रमानाथ अवस्थी के गीत की पंक्तियां याद आ रही हैं, सभी के लिए-

जो मुझ में है, वो तुझ में है

जो तुझ में है वो सब में है।

इसलिए प्यार को धर्म बना,

इसलिए धर्म को प्यार बना।    

नमस्कार।

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66. न था रक़ीब तो आखिर वो नाम किसका था।

आज कुछ गज़लें, कवितायें जो याद आ रही हैं, उनके बहाने बात करूंगा।

एक मेरे दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की शनिवारी सभा के साथी थे- राना सहरी,  जो उस समय लिखना शुरू कर रहे थे, बाद में उनकी लिखी कुछ गज़लें जगजीत सिंह जी ने भी गाईं, उनमें से ही एक को याद कर रहा हूँ। यह गज़ल शहर की बेदिली के बारे में है, जहाँ कभी लगता है कि अगर दोस्त नहीं है तो कम से कम कोई प्रतिस्पर्द्धा करने वाला ही हो। कोई तो हो, जो हमारे यहाँ होने को मान्यता, अर्थ देता हो। बहुत अच्छी गज़ल है, शेयर कर रहा हूँ-

कोई दोस्त है न रकीब है,
तेरा शहर कितना अजीब है।

वो जो इश्क था वह जूनून था,
ये जो हिज्र है ये नसीब है।

यहाँ किसका चेहरा पढ़ करूं,
यहाँ कौन इतना करीब है।

मैं किसे कहूं मेरे साथ चल,
यहाँ सब के सर पे सलीब है।

 

कविता, गज़ल को समझाने के लिए नहीं, उसके अर्थ विस्तार के साथ, स्वयं को जोड़ने के लिए कहना चाहूंगा कि शहर इतना बेदर्द है और यहाँ लोग अपने ही कामों में इतने डूबे हुए हैं कि उनको किसी की तरफ देखने, उसके साथ दो कदम चलने की फुर्सत नहीं है।

अब दाग देहलवी की गज़ल के कुछ शेर शेयर करूंगा, जिनको गुलाम अली साहब ने गाया है।

कुछ समझाने की बात नहीं है, यहाँ शिकायत कुछ अलग तरह की है। पहली गज़ल में जहाँ शिकायत यह थी कि कोई ध्यान नहीं देता, वहीं यहाँ शिकायत यह है कि कौन है जो ज़नाब की प्रेमिका के माध्यम से सलाम भेज रहा है-

 

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था।

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था।

वफ़ा करेंगे ,निबाहेंगे, बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था।

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मुक़ाम किस का था।

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था।

हर इक से कहते हैं क्या ‘दाग़’ बेवफ़ा निकला
ये पूछे इन से कोई वो ग़ुलाम किस का था।

और अंत में अपने एक अधूरे गीत को शेयर कर रहा हूँ, अधिकांश समय मैंने महानगर दिल्ली में बिताया है, कविता के मंचों पर भी कभी-कभार जाता था और अक्सर ऐसे मंचों पर जाने वालों से मित्रता थी, सो कुछ भाव इस पृष्ठभूमि से जुड़े हुए इस गीत में आ गए, जो मैंने कभी, कहीं पढ़ा भी नहीं है-

महानगर धुआंधार है

बंधु आज गीत कहाँ गाओगे!

ये जो अनिवार, नित्य ऐंठन है-

शब्दों में व्यक्त कहाँ होती है,

शब्द जो बिखेरे भावुकता में,

हैं कुछ तो, मानस के मोती हैं।

मौसम अपना वैरागी पिता-

उसको किस राग से रिझाओगे।

बंधु आज गीत कहाँ गाओगे॥

 

 

नमस्कार।

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65. चंदू के चाचा, चांद पर

आज भारत के एक महान कैरेक्टर के बारे में बात कर रहा हूँ, जिन्हें अपनी तारीफ एकदम पसंद नहीं है, लेकिन उनमें गुण इतने हैं कि मेरा मन हो रहा है कि आज उनके बारे में बात कर ही लें।

आपने यह दृष्टांत तो सुना ही होगा- ‘चंदू के चाचा ने, चंदू की चाची को, चांदनी चौक में, चांदी की चम्मच से, चटनी चटाई।‘ दरअसल मैं इन्हीं सज्जन के बारे में बात कर रहा हूँ, जो नहीं चाहते कि उनकी उपलब्धियों को, उनके अपने नाम से जोड़कर जाना जाए। वैसे भी जनता में उनकी नेगेटिव उपलब्धियों की चर्चा ज्यादा होती है। उनको अपने उड़न खटोले पर उड़कर कभी दिल्ली, कभी पटना और कभी रांची की अदालतों में हाजिरी लगानी होती है।

ये मैंने कुछ शहरों का ज़िक्र ऐसे ही कर दिया, इसके कारण अगर आप इस वृतांत को किसी व्यक्ति विशेष से जोड़ लेते हैं, तो ये आपकी श्रद्धा है, मैं ऐसा कुछ नहीं कह रहा हूँ।

यहाँ, यह भी बता दूं कि नाम होने पर लोग जमकर बदनामी देते हैं, और यह बदनामी केवल इनको ही नहीं, इनकी पत्नी, बेटा, बेटी, दामाद- सभी को प्रसाद के रूप में मिली है। इसलिए चाचाजी चाहते हैं कि उनकी सकारात्मक उपलब्धियों का ज़िक्र करने के लिए, उनको उनके अपने भतीजे चंदू के नाम से जोड़कर प्रचारित किया जाए, क्योंकि उस गरीब के साथ कोई नकारात्मक तमगा नहीं जुड़ पाया है।

अब यह भी बता दूं कि चाची को ‘चांदी की चम्मच’ संबंधी वृतांत पर शुरू में गंभीर आपत्ति थी, वे बोलीं कि ‘चम्मच का तो ज़िक्र कर दिया जी, लेकिन कटोरी तो सोने की थी, उसका नाम नहीं लिया, और हम तो रबड़ी खा रहे थे जी, ई ससुरी चटनी कहाँ से आ गई!’ इस पर चाचा ने उनको झिड़क दिया- ‘कुछ पोएटिक फ्रीडम भी होता है जी, और फिर हम क्या-क्या खाते हैं, सब कुछ जनता को बताएंगे, तब क्या होगा जी!’

अब आपके दिमाग में कोई कैरेक्टर आ रहा है तो मैं कुछ नहीं कर सकता, मैं तो चमत्कारी ‘चंदू के चाचा’ का ज़िक्र कर रहा हूँ, जिनके चमत्कार की जानकारी हाल ही में अमेरिकी मीडिया को मिली, हिंदुस्तान में तो बहुत से लोग, बहुत पहले से जानते हैं।

असल में हाल ही में ‘नील आर्मस्ट्रॉन्ग’ द्वारा अपने मोबाइल में लिए गए कुछ चित्रों को खंगाला गया, जो उन्होंने तब लिया था जब वो चांद पर गए थे।

अब इस रहस्य पर से पर्दा उठाने से पहले आपको बता दें कि चंदू के चाचा के पास बहुत से उड़न खटोले हैं। जैसे जब वे अदालत में हाजिरी के लिए जाते हैं, तब भी वे खटोले पर ही जाते हैं और अपने गंतव्य स्थान से कुछ दूरी पर अपना खटोला, किसी पेड़ पर टांग देते हैं, या कहिए कि ‘पार्क’ कर देते हैं।

अब आपको ज्यादा अंधेरे में नहीं रखूंगा, इतना बता दूं कि चंदू के चाचा ने अपने खटोलों पर कितनी दूर की यात्राएं की हैं, इसका अंदाज आप नहीं लगा पाएंगे। जब कभी उनका मन होता है, थकान ज्यादा हो जाती है और यहाँ पर चमचे चैन नहीं लेने देते, तब वे अपने खटोले पर लेटते हैं और किसी अन्य ग्रह पर जाकर अपनी नींद पूरी कर लेते हैं। वैसे उनको वहाँ जाने के लिए खटोले की ज़रूरत नहीं होती, नींद लेने के लिए उसको साथ ले जाना पड़ता है।

ऐसा ही एक बार हुआ, उनका मन हुआ और वे अपने खटोले पर उड़कर चांद पर पहुंच गए, वहाँ एक-दो दिन सोते रहे, अचानक उनके मोबाइल पर रिमाइंडर की घंटी बजी, रांची के कोर्ट में उनकी तारीख थी, टाइम एकदम नहीं बचा था, वे तुरंत वहाँ से कूदे और सीधे कोर्ट में लैंड किए। जल्दी में वे खटोला साथ ले जाना भूल गए और पहली बार कचहरी तक बनियान में पहुंचे, फिर वहीं उनके किसी चेले ने उनको अपना कुर्ता पहनने के लिए दिया।

अब इत्तफाक़ की बात है कि जब चंदू के चाचा, चांद पर अपना खटोला छोड़कर आ गए थे, उसी समय नील आर्मस्ट्रॉन्ग वहाँ पहुंचा, जिसके बारे में न जाने क्या-क्या कहानी बनाई गईं कि इंसान पहली बार चांद पर पहुंचा है।

खैर नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने जो तस्वीरें वहाँ खींची, उनमें चंदू के चाचा के खटोले की तस्वीर भी थी। धरती पर वापस पहुंचने पर जब उन्होंने वह तस्वीर दिखाई तब उनके एक अधिकारी ने चंदू के चाचा का खटोला पहचान लिया और उनसे कहा कि इस फोटो को नष्ट कर दें, वरना ये दावा झूठ साबित हो जाएगा कि वे चांद पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति हैं।

किस्सा इतना ही है कि खटोले के चित्र नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने अपने पर्सनल कंप्यूटर में सेव कर लिए थे, जो हाल ही में अमेरिकी पत्रकारों के हाथ लग गए और अब फिर से यह बात वहाँ दबाने की कोशिश की जा रही है कि चांद पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति असल में चंदू के चाचा थे।

इस प्रसंग के सभी पात्र काल्पनिक हैं, कृपया इन्हें किसी जीवित व्यक्ति से जोड़ने की हिमाकत न करें।

नमस्कार।

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64. आनंदोत्सव

पिछले तीन दिनों में मैंने श्री श्री रविशंकर जी द्वारा संचालित आनंदोत्सव में भाग लिया। ऐसे शिविर उनकी संस्था- ‘आर्ट ऑफ लिविंग’  द्वारा आयोजित किए जाते रहते हैं, लेकिन जैसा मुझे बताया गया, 30 वर्षों के इन शिविरों के इतिहास में यह तीसरी बार था कि श्री श्री ने सीधे इनमें भागीदारी की और पूरे देश में लाइव इंटरनेट के माध्यम से लगभग 70,000 लोगों को संबोधित किया, उनको सुदर्शन-क्रिया कराई और उनके प्रश्नों के उत्तर दिए।

मैंने इस प्रकार के किसी शिविर में पहली बार भाग लिया और मुझे बहुत अच्छा लगा।

श्री श्री रविशंकर जी ने जो पांच मूलभूत सिद्धांत प्रतिभगियों को जीवन में अपनाने के लिए कहा, वे वैसे तो हम सभी जानते हैं, लेकिन जीवन में अपना नहीं पाते। हम दूसरों को उपदेश देने के लिए तो इनको याद कर लेते हैं, लेकिन खुद नहीं अपनाते। लीजिए मैं भी इनमें से कुछ को दोहराकर, जितना मुझे याद है, अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर लेता हूँ।

पहला सिद्धांत है कि हम दूसरे लोगों को, जैसे वे हैं, उसी रूप में स्वीकार करें। ऐसा नहीं कि हम कहें कि अगर ये ऐसा करे तो ठीक होगा और वैसा करे तो गलत है। हर व्यक्ति का स्वभाव अलग है और वह वैसा ही करेगा, जैसा उसको ठीक लगता है, न कि जैसा आपको ठीक लगता है। जितना आप लोगों को जैसे वे हैं, उसी रूप में सहजता से स्वीकार करने लगेंगे, उतना अधिक आप तनावमुक्त रह सकेंगे।

दूसरी बात है कि, यह सोचने में समय बर्बाद न करें कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं। आप जो भी करें, वे अपनी तरह ही सोचेंगे। आप सोचकर उनकी सोच के बारे में न तो जान पाएंगे और न उसको बदल पाएंगे। आप बिना कारण के तनाव के शिकार ही हो सकते हैं।

एक सिद्धांत यह भी है कि वर्तमान में रहें, अतीत की कड़वी बातें विशेष रूप से एकदम भूल जाएं। अच्छी बातें स्मृति में रहें तो अच्छी बात है।

यह भी कि स्वयं को  दूसरों के विचार एवं व्यवहार के सामने फुटबॉल न बनाएं। किसी ने अगर गलत बात की है या कही है, तो उसको चाहें तो बता दें कि वह आपको गलत लगा, लेकिन उसको अपने दिमाग में न रखें। उसको सही मत मानिए लेकिन माफ कर दीजिए, अपने मन को कड़वी बातों का मर्तबान मत बनाइए, उनका अचार डालकर सदा अपने पास मत रखिए (ये शब्द मेरे हैं, मूल विचार वही है)।

सदा वर्तमान में रहिए, अतीत को संदर्भ के लिए और भविष्य को यदा-कदा चुनौतियों के लिए झांककर देख लीजिए, लेकिन सदा रहिए वर्तमान में, जिस प्रकार बच्चे के आंसू भी नहीं सूखे होते और वह खिलखिलाकर हंसने लगता है, वैसा स्वभाव बनाइए।

जहाँ तक सिद्धांतों की बात है, कुछ बातें जिस रूप में मुझे याद रहीं, मैंने बताईं। निःसंदेह मेरी इन विचारों में पूरी आस्था है और अपनी तरफ से मैं ऐसा करने का प्रयास करता ही हूँ, लेकिन समय-समय पर इन बातों को याद कर लेना अच्छी बात है।

जहाँ तक शिविर की अन्य गतिविधियों की बात है, इनका मुख्य उद्देश्य सांस पर नियंत्रण करके, अपने शरीर की अवस्थाओं पर नियंत्रण करना, उनको पुष्ट बनाना होता है। एक उदाहरण इसका काफी पहले किसी ने दिया था,कि जब आप लंबा चलकर आते हैं या कई थकान वाला काम करते हैं, तो आपकी सांस फूल जाती है। जिस प्रकार आपके शरीर की अव्यवस्था से सांस अव्यवस्थित हो जाती है, यदि आप सांस को व्यवस्थित कर लें तो शरीर की स्थिति भी व्यवस्थित हो जाएगी।

शिविर में यह बताया जाता है कि हम अपने फेफड़ों का कुशलतापूर्वक प्रयोग नहीं करते और बहुत कम इस्तेमाल करते हैं। अधिक प्रभावी तरीके से श्वसन के तरीके इन शिविरों में सिखाए जाते हैं, जो काफी उपयोगी हैं। मुझे यह भी मालूम हुआ कि सभी शहरों में इनके बहुत से केंद्र नियमित रूप से चलते हैं। मैं समझता हूँ कि जहाँ तक ये लोगों के शरीर एवं मन से स्वस्थ बने रहने में सहायक हों, बहुत अच्छी बात है।

मुझे किसी लेखक का लिखा एक अनुभव याद आ रहा है, किसी अन्य देश के बारे में उन्होंने लिखा था कि वे किसी पार्क में एक बेंच पर बैठे थे। तभी वहाँ एक युवती आई और वह अचानक नाचने लगी, कुछ देर नाची और फिर वापस चली गई। यह सहज प्रसन्नता, आंतरिक खुशी, वे बता रहे थे कि उस देश में शायद लोग सहज रूप से प्रसन्न हैं।

जैसा इस शिविर में बताया गया, बच्चे सहज रूप से प्रसन्न रहते हैं, चलते-चलते उछलने लगते हैं, लहराकर चलने लगते हैं, ऐसा अगर बड़े लोग सहज रूप से कर पाएं तो कितनी अच्छी बात है।

एक दो बातें जो मुझे वहाँ बहुत अच्छी लगीं, शुरू में ही उन्होंने कराया कि आप कुछ लोगों के पास जाएं, उनको अपना नाम बताएं और कहें कि मैं आपका/आपकी हूँ (आय बिलोंग टू यू), इतना सहज लोगों को स्वीकारना बहुत अच्छी बात है।

एक और गतिविधि जो मुझे शायद सबसे अच्छी लगी, उन्होंने पूरे बड़े हॉल में लोगों से कहा कि आप आंखें बंद करके नाचिये,वहाँ मधुर संगीत बज रहा था और कहा गया कि मान लीजिए कि यहाँ आपके अलावा कोई नहीं है। यह अनुभव वास्तव में विलक्षण था। शायद हमारे मन के मुक्त अवस्था में आने के बीच में, बहुत बड़ी बाधा यही होती है कि लोग देख रहे हैं। इस बाधा पर अगर हम विजय पा लें, तो बहुत बड़ी बात होगी।

मुझे लगा कि आज इन अनुभवों को बांटना चाहिए, तो लीजिए मैंने मुक्त मन से यह काम कर लिया।

नमस्कार।

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63. आस्था के नगीने फक़त कांच हैं

आज सोशल मीडिया के बारे में बात कर लेता हूँ, ये ब्लॉग लिखने का मेरा उद्देश्य यही है कि मैं विभिन्न विषयों पर अपने विचारों को संकलित कर लूं और उसके बाद यदि कभी ऐसा मन बने तो इनमें से कुछ ब्लॉग्स को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया जा सकता है। इनमें यदा-कदा अपनी कविताएं भी डाल दी हैं, जिन्हें मैंने कभी संभालकर नहीं रखा, इस बहाने वे भी आगे उपयोग हेतु उपलब्ध हो जाएंगी।

फिलहाल मैं इन ब्लॉग्स को फेसबुक और ट्विटर पर डाल रहा हूँ, संकलन की दृष्टि से, और कुछ अधिक उम्मीद इन माध्यमों से नहीं है, क्योंकि अगर एक फोटो वहाँ डाल दें अथवा चार पंक्तियों की टिप्पणी कर दें तो उसको लाइक करने वाले अथवा उस पर कमेंट करने वाले अधिक हो जाते हैं, किसी ब्लॉग के मुकाबले। इन प्लेटफॉर्म्स से इतर ब्लॉग्स को फॉलो करने वाले ज्यादा हो जाते हैं।

कुल मिलाकर सोशल मीडिया के ये प्लेटफॉर्म आधुनिक मुहल्ले बन गए हैं। यहाँ निष्पक्ष विचार के लिए अधिक स्थान नहीं है, यहाँ आप अपने जीवन की गतिविधियां मित्रों के साथ शेयर करें, वह तो उद्देश्य है ही, और उसका उपयोग भी काफी होता है, इसके अलावा आप किसी राजनैतिक पार्टी के घोर समर्थक अथवा घोर शत्रु हो सकते हैं और विरोधी पक्ष को जमकर अनसेंसर्ड गालियां दे सकते हैं, बल्कि कभी-कभी तो कंपिटीशन भी चलता है इस बात का की इन पवित्र गालियों से संबंधित आपका ज्ञान कितना गहन है और कितना गाली साहित्य आपको कंठस्थ है।

कुछ लोग यहाँ परोपकार की पवित्र भावना से काम करते हैं, और वे आपको इस बात का अवसर भी प्रदान करते हैं कि आप किसी एक चित्र को लाइक करके, उस पर कोई धार्मिक शब्द अथवा जय हिंद लिखकर, अपने जीवन को धन्य कर लें। बताइये अगर ये परोपकारी जीव न होते, तो आपका जीवन धन्य कैसे हो पाता। इतना हीं नहीं, यहाँ आपको तुरंत प्रमाण पत्र भी मिल जाता है, अगर आपने तुरंत लाइककिया अथवा वांछित शब्द लिखे तो आप धार्मिक, अथवा देशभक्त, जिस क्षेत्र का भी वे सर्टिफिकेशन कर रहे हैं, और अगर आपने ऐसा नहीं किया तो आप घोर अधार्मिक और देशद्रोही, पाकिस्तानी आदि-आदि हो सकते हैं। अब आप समझ सकते हैं, कि आपकी खैर किसमें है।

अब ऐसा करने वालों में से कुछ लोग तो ऐसे घिसे हुए हो सकते हैं कि उन पर कुछ कहने का असर नहीं होगा। मैं उन भोले-भाले लोगों से कहना चाहूंगा, जो इस तरह की बातों के प्रभाव में आ जाते हैं कि अभी आपने लाइककिया, अथवा जय होलिखा अथवा इसको शेयर किया तो दो-तीन दिन के अंदर आपको शुभ समाचार मिलेगा। मैं निवेदन करना चाहूंगा कि इस तरह के भुलावे में न आएं। आस्था हर किसी का वैयक्तिक विषय है, आप घर में पूजा करें, मंदिर में जाएं, किसी मंदिर अथवा आश्रम में ही बस जाएं। सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म्स पर इस तरह की गतिविधियों में आतंकित होकर भाग न लें, कि अगर मैंने ऐसा न किया तो कुछ बुरा हो जाएगा। न लालच में आएं और न लालच में आएं।

हमारे शहीदों के प्रति हम सबके मन में आदर है, लेकिन किसी शहीद की फोटो लगाकर जब कोई ऐसी घोषणा करता कि जिसने देखते ही ऐसा न किया तो वह ऐसाहोगा। असल में वे उस समय एक शहीद के चित्र का दुरुपयोग करके अपने मन की कुत्सित भावना का प्रदर्शन करते हैं। सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर कोई किसी से धर्म अथवा देशभक्ति की शिक्षा लेने के लिए नहीं आता।

सोशल मीडिया के बारे में, आज यही टिप्पणी करनी थी, बाद में फिर किसी पक्ष पर बात करेंगे।

आज अपना एक गीत, आज की ज़िंदगी के संबंध में-

ज़िंदगी आज की एक अंधा कुआं

जिसमें छाया नहीं, जिसमें पानी नहीं

प्यास के इस सफर के मुसाफिर हैं सब,

कोई राजा नहीं, कोई रानी नहीं।

अब न रिश्तों मे पहली सी वो आंच है,

आस्था के नगीने फक़त कांच हैं,

अब लखन भी नहीं राम के साथ हैं,

श्याम की कोई मीरा दिवानी नहीं।

हमने बरसों तलाशा घनी छांव को,

हम बहुत दूर तक यूं ही भटका किए,

अब कोई आस की डोर बाकी नहीं

अब किसी की कोई मेहरबानी नहीं।

कृष्ण गुलशन में क्या सोचकर आए थे,

न हवा में गमक, न फिजां में महक,

हर तरफ नागफनियों का मेला यहाँ,

कोई सूरजमुखी, रातरानी नहीं।

                                             (श्रीकृष्ण शर्मा)

नमस्कार।

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62. वह जो नाव डूबनी है मैं उसी को खे रहा हूँ

जिस प्रकार मौसम पर बात करना बहुत आसान सा काम होता है, टाइम पास वाला काम, अगर आप इसको भी काम कहना चाहें, उसी प्रकार अपने मुहल्ले के बारे में बात करना भी एक अच्छा टाइम-पास होता था, विशेष रूप से महिलाओं के लिए। ये उस समय की बात है, जब मुहल्ले हुआ करते थे, जीवंत मुहल्ले, जिनमें लोगों को एक-दूसरे की ज़रूरत भी काफी होती थी और एक-दूसरे से समस्या भी काफी होती थी।

कुल मिलाकर ये कि जब तक एक-दूसरे से अक्सर बात न करें और यदा-कदा लड़ाई भी न करें, तब तक ये लगता ही नहीं था कि हम मुहल्ले में रह रहे हैं। वह अपनी अच्छाइयों और कमियों के साथ, सामाजिकता का ऐसा माहौल था, जिसमें बहुत हद तक हम एक-दूसरे के पूरक होते थे, सहायक भी होते थे और ऐसा नहीं होता था, जैसा आजकल होने का डर रहता है।

एनटीपीसी में अपनी सेवा के दौरान मेरा एक लगभग नियमित सा काम था कर्मचारियों तथा बच्चों के बीच विभिन्न प्रतियोगिताएं कराना। एक बार शायद बाल भवन के लिए किसी विषय पर बच्चों की प्रतियोगिता कराई थी, उसमें अपने निबंध में एक बच्चे ने चार-पांच बार ‘आत्महत्या’ का ज़िक्र किया। निबंध का विषय ऐसा नहीं था, हम ऐसा विषय रखते भी नहीं थे, फिर क्यों उसने चार-पांच बार ‘आत्महत्या’ का ज़िक्र किया, समझ में नहीं आया। मैंने अपने मानव संसाधन विभाग के साथी, जिनको मैंने कॉपी जांचने का काम सौंपा था और वास्तव में जिन्होंने इस तथ्य से मुझे परिचित कराया था, उनसे कहा कि उस बच्चे के माता-पिता को इस बारे में बताकर सचेत करें कि कहीं उस बच्चे के मन में इस प्रकार की घोर निराशापूर्ण सोच तो नहीं पनप रही है!  

आज का जीवन इतना जटिल और एकाकी हो गया है, न तो वे मुहल्ले हैं, जो अगर आज के लिहाज से सोचें तो हमारी निजता के क्षेत्र में जबरन घुस जाते हैं और न वे संयुक्त परिवार है जिसमें किसी का एकाकी होना संभव ही नहीं था।

सेवा के दौरान ही ऐसे कई मामले सामने आए जिसमें किसी स्कूली छात्र अथवा छात्रा ने आत्महत्या कर ली और इसका किसी परीक्षा परिणाम से भी संबंध नहीं था। परिवार और समाज, इस मामले में स्कूल के साथियों की भीड़ के बीच कोई अपनी एकाकी सोच में इतना दूर निकल जाए, यह बड़ी हैरत की और दर्दनाक बात है। काश ऐसी किसी घटना के घटित होने से पहले इस समस्या की भनक आसपास के लोगों को लगी होती, तो शायद ऐसी घटनाओं को टाला जा सकता था।

अब मैं भी अपने निबंध को आत्महत्याओं पर केंद्रित नहीं करूंगा। मैंने छात्रों के इन मामलों का ज़िक्र इसलिए किया कि इनमें अंत तक कारणों का पता नहीं चल पाया। मैं इतना ही कहना चाह रहा हूँ कि अनावश्यक दखल तो हमारी ज़िंदगी में दूसरों का नहीं होना चाहिए, परंतु इस प्रकार का दखल तो होना ही चाहिए, जिसे परवाह कहते हैं, जिससे ऐसा न हो कि बगल के फ्लैट से जब बदबू आए, तभी उसको खोला जाए और मालूम हो कि हमारे पड़ौसी कब के स्वर्ग सिधार चुके हैं, और यह कब हुआ इसकी जानकारी भी हमको नहीं हो पाई।  

मैंने जब मुहल्ले की बात शुरू की, उस समय मैं असल में आज के नए मुहल्ले, सोशल मीडिया की बात करने वाला था, लेकिन फिर मुझे एक छात्र का लिखा निबंध और कुछ ऐसी घटनाएं याद आ गईं। सोशल मीडिया वाली बात फिर कभी कर लेंगे।

आज हम यह भी देखते हैं कि बहुत से बुज़ुर्ग, आलीशान बंगलों में या फ्लैट्स में अकेले रहते हैं,  पड़ौसी तो अपने जीवन में मस्त रहते हैं, अक्सर आजकल आपस में ठीक से परिचय भी नहीं हो पाता। ऐसे में जो दुष्ट प्रकृति के लोग हैं, लुटेरे हैं- उनकी निगाह इन एकाकी लोगों पर जमी रहती है, खास तौर पर अगर उनके यहाँ काम करने वालों के माध्यम से उनकी अच्छी माली हालत का पता चल जाए तब! ऐसे में एक जीवंत समाज के रूप में क्या हम अपने उन एकाकी पड़ौसियों की सुरक्षा की तरफ थोड़ा ध्यान नहीं दे सकते?

एक जीवंत समाज के रूप में शायद समय अब समय आ गया है कि हमें अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति सचेत हो जाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि ऐसी घटनाएं आगे न हो पाएं।

आज श्री रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ-

मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।

कोई मुझे सुनाओ
फिर से वही कहानी,
कैसे हुई थी मीरा
घनश्याम की दीवानी।
मीरा के गीत को भी
कोई विष रहा सताता।

कभी दुनिया के दिखावे
कभी खुद में डूबता हूँ,
कुछ देर ख़ुश हुआ तो
बड़ी देर ऊबता हूँ।

मेरा दिल ही मेरा दुश्मन
कैसे दोस्ती निभाता!

मेरे पास वह नहीं है
जो होना चाहिए था,
मैं मुस्कराया तब भी
जब रोना चाहिए था।
मुझे सबने शक से देखा
मैं किसको क्या बताता?

वह जो नाव डूबनी है
मैं उसी को खे रहा हूँ,
तुम्हें डूबने से पहले
एक भेद दे रहा हूँ।
मेरे पास कुछ नहीं है
जो तुमसे मैं छिपाता।

नमस्कार।

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61. अरुण यह मधुमय देश हमारा

आज याद आ रहा है, शायद 27 वर्ष तक, मैं स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर संदेश तैयार किया करता था, ये संदेश होते थे पहले 5 वर्ष (1983 से 1987) हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की इकाइयों (मुसाबनी और खेतड़ी) और बाद में 22 वर्ष तक एनटीपीसी की कुछ इकाइयों के कर्मचारियों के लिए, और यह संदेश पढ़ते थे वहाँ के परियोजना प्रधान, महप्रबंधक आदि। यह सिलसिला 2010 में बंद हो गया, क्योंकि 1 मई 2010 से मैं सेवानिवृत्त हो गया था। वरना जैसे 3 ईडियट्स में भाषण लिखने वाले पंडित जी बोलते थे कि आप सुनिए उसको और देखिए मुझको, क्योंकि ये भाषण मैंने ही लिखा है, की हालत थी। खैर वैसा परिणाम कभी मुझे नहीं भुगतना पड़ा।

सेवानिवृत्ति के 7 वर्ष बाद, आज मन हो रहा है कि अपनी ओर से, अपने स्वाभिमान और राष्ट्राभिमान के लाल किले की प्राचीर पर खड़े होकर आज राष्ट्र के नाम संदेश जारी करूं। ये अलग बात है कि उस समय हजारों की कैप्टिव ऑडिएंस होती थी, कुछ शुद्ध राष्ट्रप्रेम की भावना से समारोह में आते थे, बहुत से ऐसे भी थे जिन्हें इस अवसर पर पुरस्कार आदि मिलते थे और बहुत सारे अभिभावक, स्कूल स्टाफ के सदस्य आदि इसलिए भी आते थे कि वहाँ स्कूली बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे, उन बच्चों को प्रोत्साहित करना होता था, उनके फोटो खींचने होते थे और फिर उनको अपने साथ घर लेकर जाना होता था।

परियोजनाओं में होने वाले उस भाषण में, उस अवधि की उपलब्धियों का उल्लेख होता था, और एनटीपीसी में एक शब्द समूह जो बार-बार आता था, वह था ‘प्लांट लोड फैक्टर’ (संयंत्र सूचकांक), जिसका आशय होता था कि हम कितनी अधिक क्षमता के साथ विद्युत उत्पादन कर रहे हैं।

आज वह सीमित परिवेश नहीं है मेरा, और मैं उस सेवा-क्षेत्र से दूर, राजधानी क्षेत्र से दूर, जहाँ मैं सेवा में न होने की अवधि में अधिकतर रहा, आज देश के सुदूर छोर पर, गोआ में हूँ। यहाँ की समस्याओं के बारे में भी अभी ज्यादा नहीं जानता, पास के शहर पणजी को भी अभी, ठीक से क्या बिल्कुल नहीं खंगाला है, एक-दो ‘बीच’ देखी हैं, वैसे यहाँ इतनी ‘बीच’ हैं  कि इंसान उनके बीच ही घूमता रह जाए।

संदेश क्या, मेरे जैसा साधारण नागरिक देशवासियों को शुभकामना ही दे सकता है। हम सभी मिल-जुलकर प्रगति करें। देश में विकास के नए अवसर पैदा हों। हमारी प्रतिभाओं को देश में ही महान उपलब्धियां प्राप्त करने और देश की सर्वांगीण प्रगति में अंशदान करने का अवसर मिले। जो नफरत फैलाने वाले लोग और संगठन हैं, उनकी समाप्ति हो और सभी भारतीय प्रेम से रहें।

आज परिस्थितियां बड़ी विकट हैं, हमारे दो पड़ौसी हमेशा ऐसा वातावरण बनाए रहते हैं, कि जैसे अघोषित युद्ध चल रहा हो और वास्तविक युद्ध की आशंका भी बनी रहती है। हम यह आशा ही कर सकते हैं कि ऐसी स्थितियां न बनें, लेकिन यह पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं है। यदि अनिच्छित स्थिति आती हैं तो हमारी सेनाएं अपने पराक्रम से उनका मुकाबला करें और पूरा देश उनके साथ हो, वैसे युद्ध न हो, यही  सबके लिए श्रेयस्कर है, हमारे लिए भी और अन्य देशों के लिए भी।

श्री जयशंकर प्रसाद जी की पंक्तियां हैं-

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा॥

लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा॥

बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनन्त की, पाकर जहाँ किनारा॥

आज अपनी एक कविता भी शेयर कर रहा हूँ, जैसी मुझे याद है अभी तक, क्योंकि गीत तो याद रह जाते हैं, स्वच्छंद कविता को याद रखने में दिक्कत होती है-

काबुलीवाला, खूंखार पठान-

जेब में बच्ची के हाथ का जो छापा लिए घूमता है,

उसमें पैबस्त है उसके वतन की याद।

वतन जो कहीं हवाओं की महक,

और कहीं आकाश में उड़ते पंछियों के

सतरंगे हुज़ूम के बहाने याद आता है,

आस्थाओं के न मरने का दस्तावेज है।

इसकी मिसाल है कि हम-

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई होने के नाते नहीं

नागरिक होने के नाते बंधु हैं,

सहृदय होने के नाते सखा हैं,

 वतन हमसे आश्वासन चाहता है-

कि अब किसी होरी के घर और खेत-

 महाजनी खाते की हेरे-फेर के शिकार नहीं होंगे,

कि गोबर शहर का होकर भी-

दिल में बसाए रखेगा अपना गांव 

और घर से दूर होकर भी

हर इंसान को भरोसा होगा-

कि उसके परिजन सदा सुरक्षित हैं।  

सभी भारतीयों को स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं।

नमस्कार।

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60. बच्चों के लिए जो धरती मां, सदियों से सभी कुछ सहती है

आज मन है कि पिछले ब्लॉग की बात को ही आगे बढ़ाऊं। सभी को समान अवसर मिले, यह कम्युनिस्टों का नारा हो सकता है, लेकिन इस विचार पर उनका एकाधिकार नहीं है। भारतीय विचार इससे कहीं आगे की बात करता है, हम समूचे विश्व को  अपना परिवार मानते हैं। एक विचार जो इससे पनपता है, वह है कि सब एक साथ मिलकर प्रगति की राह पर बढ़ें। जहाँ कम्युनिस्ट कहते हैं-दुनिया भर के मज़दूरों एक हो जाओ। निश्चित रूप से यह एक वर्ग के दूसरे वर्ग के विरुद्ध इकट्ठा होने का, वर्ग-संघर्ष का विचार है, जबकि आज दुनिया भर में व्यवहार में लाया जा रहा है, कि सभी पक्ष एक साथ मिलकर उद्योग की प्रगति के लिए कार्य करें। कहीं समस्या आती है तो उसके लिए अनेक फोरम हैं, न्यायिक व्यवस्था है, यदि सभी लोगों का समय आपस में संघर्ष के स्थान पर उत्पादन बढ़ाने में, प्रगति करने में लगे तो  सभी का भला होगा, लेकिन कम्युनिस्ट ऐसा मान ही नहीं पाते कि सब एक साथ मिलकर काम कर सकते हैं। उनकी तो किताब में लिखा है कि वर्ग-संघर्ष अनिवार्य है।

जहाँ तक लेखकों, कवियों की बात है, कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित लेखकों, कवियों, फिल्मकारों ने बहुत अच्छी  रचनाएं दी हैं, लेकिन वे स्वयं ही कभी एक नहीं हो पाए। मुझे कुछ घटनाएं याद आती हैं, जैसे अज्ञेय जी जैसे लेखक तो कम्युनिस्टों के घोषित शत्रु थे ही, एकाध बार ऐसा हुआ कि कमलेश्वर जी को किसी प्रगतिशील लेखक सम्मेलन में अध्यक्ष बनाकर बुलाया गया, फिर एक के बाद एक प्रतिभागी ने उनको जमकर गालियां दीं और अंत में अध्यक्ष महोदय को वहाँ से अपमानित करके निकाला गया।

दो वर्ष पहले की बात है, कोटा में एक लेखक महोदय से एक गोष्ठी में मुलाकात हुई, उनको मेरी कविताएं अच्छी लगीं और उन्होंने मुझे अपने घर बुलाया। घर पर आंगन में एक छोटा सा मंदिर बना था, जाहिर है कि घर में पूजा होती थी, जो भी करता हो। उन्होंने मुझे अपनी कुछ पुस्तकें भेंट कीं जिसके लिए मैं उनका आभारी हूँ, उनकी पुस्तकों में कुछ काफी अच्छी कविताएं थीं, कुछ अच्छी कहानियां भी थीं। मैं उनसे काफी प्रभावित हुआ लेकिन फिर अंत में एक कहानी देखी, जिसके बाद जितना प्रभाव मुझ पर पड़ा था, वो पूरा धुल गया। ये कहानी श्रीराम को लेकर लिखी गई थी, जिन्हें करोड़ों लोग भगवान मानते हैं। इस कहानी में सीता जी के त्याग को लेकर श्रीराम जी को क्या-क्या नहीं कहा गया।  उन्हें कायर, नपुंसक, हिजड़ा, निर्लज्ज और न जाने क्या-क्या कह दिया गया था। वे व्यवहार से बहुत सज्जन व्यक्ति थे, बहुत अच्छा लिखा भी था उन्होंने, मैं समझ सकता हूँ कि उन्होंने यह रचना मठाधीशों के समक्ष मान्यता प्राप्त करने के लिए ही लिखी थी। वरना अच्छा लिखते रहो, कौन ध्यान देता है!

सभी के बीच समानता का विचार बहुत अच्छा है, लेकिन इसके साथ इस तरह लोगों की आस्था पर आक्रमण करना, या देश के विरुद्ध बातें करना क्यों ज़रूरी है, और समानता के विचार में भी मुझे अज्ञेय जी की टिप्पणी याद आ रही है, जैसे जंगल में सभी पेड़ अपनी क्षमता के अनुसार विकसित होते हैं, सबको समान अवसर उपलब्ध हो, हवा पानी मिलें, इसके बाद वे जितना विकसित हो सकें, हो जाएं। कम्युनिज़्म का विचार कुछ इस तरह है कि पेड़ों को ऊपर से एक ऊंचाई पर काटकर बराबर कर दिया जाए, तब कैसा लगेगा!  

कुल मिलाकर कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित लेखकों/कवियों ने बहुत अच्छा लिखा है, रमेश रंजक इसका एक अच्छा उदाहरण हैं, जिनको मैं समय-समय पर याद करता रहता हूँ, राज कपूर की फिल्में भी इस विचारधारा से प्रभावित रही हैं, रचना धर्मिता के साथ यह विचार भली भांति जुड़ता है, लेकिन दिक्कत तब होती है जब इस विचारधारा के पुरोधा देश, धर्म आदि से से जुड़ी आस्थाओं पर चोट करना प्रारंभ करते हैं।

तुलसीदास जी ने कहा है-

जाके प्रिय न राम वैदेही

तजिये ताहि कोटि वैरी सम, जद्यपि परम सनेही।

आप अपनी विचारधारा को महान मानते रहिए, लेकिन जैसे ही आपकी विचारधारा आपको मेरे देश अथवा मेरी धार्मिक भावना के विरुद्ध बोलने के लिए प्रेरित करेगी, वह मेरे लिए अवांछनीय हो जाएगी।

बात साहित्य के स्तर पर उतनी बुरी नहीं होती, वहाँ थोड़ी-बहुत बहस होती रहती है। असली दिक्कत होती है राजनीति के स्तर पर जहाँ इनकी हरकतें राष्ट्रद्रोह की हद तक पहुंच जाती हैं, कन्हैया वाले मामले में माननीय न्यायाधीश महोदया की टिप्पणी इसको स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है।

मैंने अपनी जीवन यात्रा से जुड़े ब्लॉग्स में पहले इसका उल्लेख किया है कि किस प्रकार खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लेक्स में श्रमिक यूनियनों की आपसी प्रतियोगिता में एक रात सभी अधिकारियों को ऑफिस में बितानी पड़ी थी। अभी 2-3 वर्ष पहले गुड़गांव के मारुति उद्योग में घटी घटना तो दिल दहला देने वाली थी, जिसे में मानव संसाधन विभाग के एक प्रबंधक को मज़दूरों की भीड़ के बीच जिंदा जला दिया गया। यह देखकर तो यही खयाल आता है कि उस व्यक्ति के चारों ओर खड़े लोग इंसान थे भी या नहीं।

मैं यह मानता हूँ कि नफरत जो भी फैलाता है, वह किसी भी आधार या बहाने से हो, वह इंसानियत का दुश्मन है।

स्वाधीनता दिवस के अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि किसी भी प्रकार के अतिवाद को न पनपने दिया जाए और राष्ट्रहित में सभी मिल-जुलकर काम करें।

अंत में, भारतीय सादगी और विशाल हृदयता का यह उद्घोष

होठों पे सच्चाई रहती है, जहाँ दिल में सफाई रहती है,

हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है।

कुछ लोग जो ज्यादा जानते हैं, इंसान को कम पहचानते हैं,

ये पूरब है, पूरब वाले हर जान की कीमत जानते हैं।

बच्चों के लिए जो धरती मां, सदियों से सभी कुछ सहती है,

हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है।

 

नमस्कार।

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