91. हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ!

बचपन में चंदामामा पत्रिका में विक्रम और वैताल की कहानियां पढ़ा करता था, जिनकी शुरुआत इस प्रकार होती थी- ‘विक्रमादित्य ने जिद नहीं छोड़ी’ और फिर अपनी ज़िद के कारण जब वह वैताल को लादकर चलता है, तब वैताल उसे कहानी सुनाता है और बीच में टोकने पर वह फिर वापस उड़कर चला जाता है।

कुछ इस तरह ही मुझे याद है, और मुझे लगता है कि ब्लॉग लिखना एक बार शुरू किया तो फिर इसको बार-बार लिखने की ज़िद भी कुछ ऐसी ही है, यहाँ कहानी सुनाने वाले भी खुद और सुनने वाले भी खुद ही। हाँ ये देखकर अच्छा लगता है कि मेरी साइट पर जाकर बहुत सारे अजनबी लोग, पुराने ब्लॉग्स को खोज-खोजकर पढ़ते हैं।

हाँ तो मैंने अपने एनटीपीसी के सेवाकाल के संबंध में काफी लिखा है। वहाँ पर मुझे क्रय-समितियों में बहुत बार दौरों पर जाना पड़ा है। सच बात तो ये है कि मैं कभी खुद अपने लिए भी खरीदारी नहीं करता। क्रय समितियों में जो औपचारिकताएं हैं, चयन से संबंधित, वे सब वित्त और सामग्री विभाग के लोग पूरा करते थे, मैं मानव संसाधन विभाग का प्रतिनिधि होने के नाते, केवल मौन मध्यस्थ की भूमिका में उनके साथ रहता था। क्रय समिति में जाने का आकर्षण मेरे लिए मात्र दूसरे शहर में घूमना ही होता था।

हाँ कभी-कभी मेरी भूमिका आती थी, जैसा कि मैंने एक ब्लॉग में लिखा था, चरित्र की शिक्षा देने वाले एक विद्यालय के शिक्षक जब, स्कूल से संबंधित खरीदारी के लिए साथ गए थे, और कमीशन खाने के चक्कर में एक खास पार्टी की वकालत करने लगे थे, तब हमने वहाँ से न खरीदने का फैसला लिया और कोटेशन लेकर वापस आ गए थे।

आज अचानक शुरू-शुरू का एक क्रय-समिति में जाने का अनुभव याद आ गया। विंध्यनगर, मध्य प्रदेश में मैं कार्यरत था, कार्यपालक के रूप में और वहाँ पास के ही बाज़ार से कुछ पुरस्कार आदि खरीदने थे। हमारी क्रय समिति में, अन्य लोगों के साथ ही साथ, मेरे अपने विभाग के एक पर्यवेक्षक थे, जो संभवतः काफी आदर करने वाले थे और मुझसे बात करते समय, उनके हर वाक्य में दो बार ‘सर’ आता था।

आज यह घटना अचानक क्यों याद आ गई, उसका कारण यही है कि वह दुकान, जहाँ से हमने सामान खरीदा वहाँ पर ही मैंने इस तरफ ध्यान दिया कि मेरा यह साथी जो हर वाक्य में दो बार ‘सर’ बोलता था, दुकान पर एक घंटा चर्चा करने के दौरान उसके मुंह से एक बार भी ‘सर’ नहीं निकला और इसके अलावा यदि ध्यान से दुकानदार से बातचीत के अंदाज को देखा जाए तो यही लगेगा कि वह साथी ही मेरे बॉस थे।

खैर अचानक मेरा यह ऑब्ज़र्वेशन मुझे आज याद आ गया, इस बदले अंदाज़ से यदि मेरे उस साथी को कोई लाभ हुआ तो वही जानता होगा, वैसे मैं बाद में सामान्यतः दूसरे विभागों के अपने समकक्ष या अपने से वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ही गया और विक्रेता को अपनी स्थिति के बारे में ‘इम्प्रेस’ करने में मेरी कभी कोई रुचि नहीं रही, मुझे तो यही जल्दी रहती थी कि यह झमेला खत्म हो तो मैं कुछ समय शहर में घूम लूं।

खरीदारी की विशेषज्ञता तो मैं चाहता हूँ कि मेरी ऐसी ही बनी रहे-

हूँ बहुत नादान, करता हूँ ये नादानी

बेचकर खुशियां खरीदूं आंख का पानी,

हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ।

आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ॥

 

नमस्कार।

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90. मेरे नाम से खत लिखती है तुमको मेरी तन्हाई!

पिछला ब्लॉग लिखने का जब खयाल आया था, तब मन में एक छवि थी, बाद में लिखता गया और वह मूल छवि जिससे लिखने का सोचा था भूल ही गया, तन्हाई का यही तो  मूल भाव है कि लोग अचानक भूल जाते हैं। वह बात अब कर लेता हूँ।

कुछ समय पहले प्रसिद्ध अभिनेता विनोद खन्ना का देहांत हो गया। बहुत से कलाकार हैं जो कुदरत ने हमसे छीन लिए हैं, जाना तो सभी को होता है, लेकिन एक बात कुछ अलग हुई थी विनोद खन्ना जी के मामले में। जैसा हम जानते हैं विनोद खन्ना जी ने फिल्म जगत में जिन ऊंचाइयों को प्राप्त किया था, वहाँ तक बहुत कम अभिनेता पहुंच पाते हैं। वे अमिताभ बच्चन जी के समकक्ष माने जाते थे। एक अत्यंत सफल फिल्मी हीरो थे और बाद में राजनीति में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।

कुछ दिन तक विनोद खन्ना जी खबरों से बाहर रहे और फिर एक दिन अचानक सोशल मीडिया में एक फोटो आई, उनकी मृत्यु से शायद एक-दो महीने पहले, एक कृशकाय व्यक्ति और यह सवाल किया गया कि क्या यह  विनोद खन्ना हैं। देखकर विश्वास ही नहीं हुआ, ऐसा लगा कि जिस तरह सोशल मीडिया पर बेसिर-पैर की बातें फैलाई जाती हैं, वैसा ही कुछ है। लेकिन फिर यह स्पष्ट हो गया कि वास्तव में विनोद खन्ना जी को कैंसर हुआ था और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु भी हो गई।

उस समय सचमुच वो शेर याद आया था-

दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिजरां में खड़ा सोचता हूँ

हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले।

लगभग 25-30 साल पहले दिल्ली में, साहित्य अकादमी में एक शायर से उनके कुछ शेर सुने थे ‘तन्हाई’ पर, शायद पाकिस्तानी शायर थे, दो शेर आज तक याद हैं (शायर कौन थे, मैं नहीं कह सकता),  शेर इस तरह हैं-

मैं तो खयालों की दुनिया में खुद को बहला लेता हूँ,

मेरे नाम से खत लिखती है, तुमको मेरी तन्हाई।

घर में मुकफ्फल करके उसको, मैं तो सफर पे निकला था,

रेल चली तो बैठी हुई थी, मेरे बराबर तन्हाई।

तन्हाई नाम का यह शत्रु, कोई छोटा-मोटा शत्रु नहीं है। इस शत्रु का सामना करने के लिए, जहाँ तक संभव हो, हम दिल से एक साथ हो जाएं तो इस शत्रु का अस्तित्व ही नहीं रहेगा, लेकिन इस बात को कहना आसान है, करना नहीं।

शायद तन्हाई से बचने का ही लोगों को सबसे अच्छा रास्ता यह लगता है कि वे एक पार्टी का झंडा थाम लेते हैं और दूसरी पार्टी को गालियां देने में अपनी पूरी प्रतिभा का इस्तेमाल करते हैं।

इस ब्लॉग के मामले में मैंने यह विकल्प नहीं चुना है। वैसे भी जो लोग यह सोचते हैं कि एक पार्टी दूध की धुली है और दूसरी को वे कौरव सेना मानते हैं उनको शायद कल्पना लोक में रहना ज्यादा अच्छा लगता है।

इस ब्लॉग के माध्यम से मैं उन ही नर्म-नाज़ुक दिलों का दरवाज़ा खटखटाना चाहता हूँ, जो मानवीय संवेदनाओं के लिए खुले हैं, बाकी निश्चिंत रहें उनको डिस्टर्ब करने का मेरा कोई इरादा नहीं है।

नमस्कार।

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89. हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले!

जीवन के जो अनुभव सिद्ध सिद्धांत हैं, वही अक्सर कविता अथवा शायरी में भी आते हैं, लेकिन ऐसा भी होता है कि कवि-शायर अक्सर खुश-फहमी में, बेखुदी में भी रहते हैं और शायद यही कारण है कि दिल टूटने का ज़िक्र शायरी में आता है या यह कहा जाता है-

मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए, मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो!

अब हर समय व्यावहारिक बना रहे तो कवि-शायर क्या हुआ, सामान्य जीवन में, सभी लोग वैसे भी कहीं न कहीं धोखा खाते ही हैं और कुछ लोग जो ज्यादा भरोसा करने वाले होते हैं, वो खाते ही रहते हैं।

इसीलिए शायद कविवर रवींद्र नाथ ठाकुर ने लिखा था-

जदि तोर डाक सुनि केऊ ना आशे, तबे एकला चलो रे!

इसी बात को एक हिंदी फिल्मी गीत में बड़ी खूबसूरती से दोहराया गया है-

चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला

तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला’

हजारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते

यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते,

यहाँ पूरा खेल अभी जीवन का, तूने कहाँ है खेला।

 

जगजीत सिंह जी की गाई एक गज़ल है, शायर शायद बहुत मशहूर नहीं हैं- अमजद इस्लाम ‘अमजद’, इस गज़ल में कुछ बहुत अच्छे शेर हैं जिनको जगजीत जी ने बड़े  खूबसूरत अंदाज़ में प्रस्तुत किया है-

चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले

कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले,

फस्ल-ए-गुल आई है फिर आज असीराने वफा

अपने ही खून के दरिया में नहाने निकले,

दिल ने इक ईंट से तामीर किया ताजमहल

तूने इक बात कही, लाख फसाने निकले,

दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिजरा में खड़ा सोचता हूँ

हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले।

आज यही भाव मन पर अचानक छा गया, बड़ा सुंदर कहा गया है इस गज़ल में, खास तौर पर आखिरी शेर में- अकेलेपन के जंगल में खड़ा हुआ मैं सोचता हूँ कि कैसे लोग थे जो मेरा साथ निभाने चले थे!

जीवन में जो बहुत से रंग-बिरंगे भावानुभव होते हैं, उनमें से यह भी एक है और यह काफी बार सामने आने वाला भाव है। और यह ऐसा भाव है जिसे मीना कुमारी जैसी महान कलाकार को भी भरपूर झेलना पड़ा है। उनके ही शब्दों मे आइए पढ़ते हैं-

चांद तनहा है आस्मां, तन्हा

दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा।

बुझ गई आस, छुप गया तारा,

थरथराता रहा धुआं तन्हा।

                                                            ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं,

जिस्म तन्हा है और जां तन्हा।

हमसफर कोई गर मिले भी कहीं

दोनों चलते रहे कहाँ तन्हा।

                                                         जलती-बुझती सी रोशनी के परे,

सिमटा-सिमटा सा एक मकां तन्हा।

राह देखा करेगा सदियों तक,

छोड़ जाएंगे ये जहाँ तन्हा।

तन्हाई, अकेलापन, बेरुखी- ये तो सबको झेलने पड़ते हैं, लेकिन मीना कुमारी जी जैसा कोई महान कलाकार ही यह दावा कर सकता है कि ‘छोड़ जाएंगे ये जहाँ तन्हा’ ।

 

नमस्कार।

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88. गोद लिए हुलसी फिरै तुलसी सो सुत होय!

आज की बात शुरू करते समय मुझे चुनाव के समय का एक प्रसंग याद आ रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी जी के विरुद्ध डॉ. कर्ण सिंह चुनाव लड़ रहे थे। दोनों श्रेष्ठ नेता हैं और एक दूसरे का आदर भी करते हैं। एक चुनावी सभा में डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि वाजपेयी जी इस राजनीति के चक्कर में क्यों पड़े हैं, वे मेरे महल में रहें और वहाँ रहकर कविताएं लिखें। इस पर वाजपेयी ने चुनावी जवाब देते हुए कहा था कि अच्छी कविता महलों में रहकर नहीं लिखी जाती, वह तो कुटिया में लिखी जाती है।

असल में जो प्रसंग मुझे याद आ रहा है, बहुत से पुराने प्रसंग ऐसे होते हैं कि उनकी सत्यता प्रमाणित करना तो संभव नहीं होता लेकिन उनसे प्रेरणा अवश्य ली जा सकती है।

कहा जाता है कि एक गरीब ब्राह्मण तुलसीदास जी के पास आया, वैसे यह भी अजीब बात है कि गरीब और ब्राह्मण, एक-दूसरे के पर्याय जैसे बन गए हैं। चलिए मैं इस तरह कहूंगा कि एक गरीब व्यक्ति तुलसीदास जी के पास आया। उसकी बेटी की शादी होनी थी और उसको इस विवाह के आयोजन के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी। उसने तुलसीदास जी से इस संबंध में प्रार्थना की। अब तुलसीदास जी तो खुद धन-संपत्ति से बहुत दूर थे, वे क्या सहायता करते! लेकिन उनके समकालीन और अच्छे मित्र रहीम जी (अब्दुर्रहीम खानखाना) महाराज अकबर के दरबार में थे, उनके नवरत्नों में शामिल थे। वे उस व्यक्ति की सहायता कर सकते थे।

तुलसीदास जी ने उस व्यक्ति को एक कागज़ पर एक पंक्ति लिखकर दी और कहा कि यह लेकर आप  रहीम जी के पास चले जाओ, वे आपकी सहयता करेंगे। उस कागज़ पर तुलसीदास जी ने लिखा था- ‘सुरतिय, नरतिय, नागतिय- सबके मन अस होय’, जिसका आशय है कि चाहे देवताओं की पत्नियां हों, चाहे महिलाएं हों या नागवंश में भी, नागिन हों- उन सभी को धन-संपत्ति, जेवर, मणि आदि अच्छे लगते हैं, उनकी आवश्यकता होती है।

वह व्यक्ति उस पर्ची को लेकर रहीम जी के पास गया, वे आशय समझ गए और उन्होंने उस व्यक्ति की भरपूर सहायता की, फिर उन्होंने उस व्यक्ति से कहा कि यह पर्ची वापस तुलसीदास जी को दे देना। उन्होंने उस पर्ची पर एक और पंक्ति लिख दी थी और अब दोनों पंक्तियां मिलकर इस प्रकार हो गई थीं-

सुरतिय, नरतिय, नागतिय- सबके मन अस होय

गोद लिए हुलसी फिरै, तुलसी सो सुत होय

यहाँ रहीम जी ने तुलसीदास जी से कहा कि आपने सही नहीं कहा, धन-संपत्ति महिलाओं को प्रिय हो सकती हैं, लेकिन सबसे बड़ी सौभाग्यशाली तो वह मां है, जिसका तुलसीदास जैसा बेटा हो।

अभी जबकि दशहरा बीता है और दीवाली आने वाली है, मन हुआ कि रामकथा के अमर गायक, तुलसीदास जी से जुड़ा यह प्रसंग साझा करूं।

 

नमस्कार।

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87. आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की

आज भारत की दो महान विभूतियों की  जयंती है, एक तो जिन्हें हम राष्ट्रपिता के नाम से जानते हैं और दूसरे भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री जी। इन महापुरुषों की जयंती आज देश मना रहा है। राजनीति के क्षेत्र से ऐसे अनेक और लोग हैं जिनको ‘भारत रत्न’ का दर्जा दिया गया, मैं आज एक ऐसे भारत रत्न का ज़िक्र करना चाहूंगा, जो सृजन के क्षेत्र से थे और शायद मेरी सीमित जानकारी के अनुसार एकमात्र कवि हैं, जिन्हें ‘दादा साहब फाल्के’ सम्मान दिया गया।

इनकी लिखी पंक्तियां सुन-सुनकर हम बड़े हुए हैं और हमारे बाद की पीढ़ियां भी  काफी हद तक उनको सुनती हैं-

जलियांवाला बाग ये देखो यहाँ चली थीं गोलियां,

ये मत पूछो किसने खेली यहाँ खून की होलियां,

एक तरफ बंदूकें दन-दन एक तरफ थी टोलियां,

मरने वाले बोल रहे थे इंकलाब की बोलियां।

यहाँ लगाई बहनों ने भी बाज़ी अपनी जान की,

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की।

आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की॥

उनके कुछ अन्य प्रमुख गीत हैं-

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल

साबरमति के संत तूने कर दिया कमाल।

एक और-

हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के,

इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के।

एक और गीत जिसे लता जी ने गाया था और चीन से युद्ध के बाद इस गीत को सुनकर नेहरू जी रो पड़े थे, आज भी यह गीत हमें झकझोर जाता है-

ऐ मेरे वतन के लोगो, जरा आंख में भर लो पानी,

जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी।

थी खून से लथपथ काया, फिर भी बंदूक उठाकर,

दस-दस को एक ने मारा, फिर गिर गए होश गंवाकर,

जब अंत समय आया तो कह गए कि अब चलते हैं,

खुश रहना देश के प्यारों, अब हम तो सफर करते हैं।

प्रदीप जी की कुछ अन्य अत्यंत लोकप्रिय रचनाएं हैं- पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द न जाने कोय’, ‘देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान’, ‘तुमको तो करोड़ों साल हुए, बतलाओ गगन गंभीर, इस प्यारी-प्यारी दुनिया में क्यों अलग-अलग तक़दीर’, ‘चल अकेला, चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला’ ‘मैन एक छोटा सा बच्चा हूँ, तुम हो बड़े बलवान, प्रभु जी मेरी लाज रखो’, ‘तूने खूब रचा भगवान, खिलौना माटी का

मुझे याद है कि जब वाजपेयी जी की सरकार थी, तब कवि प्रदीप जी को दादा साहब फाल्के सम्मान प्रदान किया गया था, कवि प्रदीप इस समारोह में नहीं आ सके थे, तब केंद्रीय मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज उनके घर गई थीं और उनके चरण छूकर उनको यह सम्मान भेंट किया था। कवि प्रदीप वास्तव में इस सम्मान के पात्र थे। इस महान सृजनधर्मी को सादर नमन।

नमस्कार।

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86. मैं चंद ख्वाब ज़माने में छोड़ आया था!

आज मुकेश जी की गाई हुई दो प्रायवेट गज़लें शेयर कर रहा हूँ, ऐसी पहचान रही है मुकेश जी की, कि उन्होंने जो कुछ गाया उसको अमर कर दिया। उनके गायन में शास्त्रीयता का अभाव विद्वान लोग बताते हैं। मैं यह मानता हूँ कि मंदिरों में, पूजा में पहले गाया जाता था, उसके बाद गायन के आधार पर शास्त्रीयता के मानक तैयार किए गए। गायन की प्रभाविता के मूल में थी-आस्था। जो बात सीधे दिल से निकल रही है, वो दिल तक पहुंचेगी और अमर हो जाएगी, आपके शास्त्रीयता के मानक कुछ भी बताते रहें।

तो आज जो पहली गज़ल मुकेश जी की गाई हुई शेयर कर रहा हूँ, वह है-

जियेंगे मगर मुस्कुरा ना सकेंगे,

कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

लबों पे तराने अब आ न सकेंगे,

कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

बहारें चमन में जो आया करेंगी,

नज़ारों की महफिल सजाया करेंगी,

नज़ारे भी हमको हंसा ना सकेंगे,

कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

जवानी जो  लाएगी सावन की रातें,

ज़माना करेगा मुहब्बत की बातें,

मगर हम ये सावन मना ना सकेंगे

कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

आप अगर सिर्फ इस गज़ल को पढ़ रहे हैं, तब भी जो शायर ने कहा है, वह आप तक पहुंच ही रहा है, लेकिन अगर आपने इसको मुकेश जी की आवाज़ में सुना है तो आपको इसका अतिरिक्त आयाम भी महसूस होगा, ऐसी आवाज़ जो गूंगे सुर को गूंज प्रदान करती है, विस्तार देती है। खासकर के उदासी के गानों में तो मुकेश जी कलेजा उंडेल देते हैं, हालांकि मस्ती के गानों में भी उनका कोई जवाब नहीं है।  

लगे हाथ एक और प्रायवेट गज़ल मुकेश जी की गाई हुई शेयर कर रहा हूँ-

ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था,

दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था।

मुआफ कर न सकी मेरी ज़िंदगी मुझको,

वो एक लम्हा कि मैं तुझसे तंग आया था।

शगुफ्ता फूल सिमट के कली बने जैसे,

कुछ इस कमाल से तूने बदन चुराया था।

गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह,

अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था।

पता नहीं कि मेरे बाद उनपे क्या गुज़री,

मैं चंद ख्वाब ज़माने में छोड़ आया था।

यहाँ शायरी तो शानदार है ही, लेकिन उसको जो प्रभाव मुकेश जी की गायकी देती है, वो लाजवाब है। जहाँ इस गज़ल में खुद्दारी को ज़ुबान मिली है, वहीं वह शेर भी बहुत अच्छा है कि जैसे कोई ऐसे मिला कि जैसे हमारी आंखों के सामने चमककर लुप्त हो जाए और यह भी कि हर कोई जब इस दुनिया से जाता है तब यह खयाल उसके मन में ज़रूर आता होगा कि काश मैंने यह काम और कर लिया होता, बहुत सारे सपने हमारे यहीं छूट जाते हैं।

खैर मेरा ज्ञान देने का कोई इरादा नहीं है, बस इन गज़लों का आनंद लें।

नमस्कार।

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85. ये दिल्ली है बाबू!

दिल्ली में मेरा जन्म हुआ, 30 वर्ष की आयु तक मैं दिल्ली में ही रहा, शुरू की 2-3 नौकरियां भी वहीं कीं और सेवानिवृत्ति के बाद भी लगभग 7 वर्ष तक, दिल्ली के पास गुड़गांव में रहा। इसलिए कह सकता हूँ कि दिल्ली को काफी हद तक जानता हूँ, और मैंने दिल्ली के अपने अनुभव शुरू के ब्लॉग्स में लिखे भी हैं।

दिल्ली देश की राजधानी है, राजनीति का केंद्र है, हर जगह के लोग दिल्ली में आपको मिल जाएंगे। बड़ी संख्या में ऐसे लोग वहाँ हैं जो अध्ययन के लिए या सेवा के लिए दिल्ली अथवा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहते हैं, क्योंकि उन सबको बसाने और नियोजित करने के लिए, दिल्ली का मूल क्षेत्र अब बहुत छोटा पड़ गया है। यह भी कि दिल्ली में जितने सड़क के पुल और फ्लाई-ओवर बन रहे हैं, उतना ही ट्रैफिक जाम बढ़ता जाता है।

एक बात और कि अक्सर किसी स्थान की अपनी पहचान, अपनी संस्कृति होती है, लेकिन दिल्ली एक संस्कृति विहीन नगर है। वहाँ पर जहाँ अनेक संस्थानों के राष्ट्रीय कार्यालय अथवा केंद्र हैं, बहुत से अंतर्राष्ट्रीय केंद्र भी हैं, वहीं लूट के बहुत से अंतर्राष्ट्रीय स्तर के केंद्र भी हैं, वहाँ रहते हुए बहुत सी बार ऐसा महसूस किया, आज सोचा कि इस बारे में लिख भी दूं, कुछ फर्क पड़ेगा कि नहीं, पता नहीं, लेकिन आज मन हो रहा है कि इस विषय में लिखूं। वैसे ये बात अगर बहुत से लोगों के माध्यम से सही जगह तक पहुंचे तो सुधार हो भी सकता है।

एक उदाहरण मैंने अपने शुरू के ब्लॉग्स में दिया था, दिल्ली में कटरा नील के पास एक अहाता या छत्ता थ, ‘मोहम्मद दीन’ नाम से, जहाँ मैं उस समय पीतांबर बुक डिपो में पहली नौकरी करता था। हमारे बगल में ही एक कपड़े की दुकान थी जहाँ लंबा टीका लगाकर एजेंट लोग ग्राहक फंसाते थे, लगते थे जैसे शिष्टाचार की मूर्ति हैं, बोलते थे कि आज ही कपड़ा आया है, विदेश भेजने वाले थे, लेकिन कुछ पीस यहाँ के लिए रखे हैं, ए-वन माल है। खैर जैसे भी हो वे ग्राहक को पटाकर माल ठिकाने लगा देते थे। अगर इत्तफाक़ से ग्राहक ‘लोकल’ हुआ तो यह तय था कि कपड़ा बेकार निकलेगा और वह वापस आएगा, इस बार उनका स्वरूप एकदम अलग होता था, वे उसको पहचानते भी नहीं थे और ये साबित कर देते थे कि सभ्यता और शिष्टाचार उनके पास से भी होकर नहीं गुज़रे हैं।

खैर यह एक दुकान की बात मैंने की, क्योंकि उसको निकट से देखा था, मैं समझता हूँ कि उस इलाके में हजारों दुकानें ऐसी होंगी और अन्य बाज़ारों में भी होंगी।

अब एक उदाहरण देता हूँ, जब मैं सेवाकाल में दिल्ली से बाहर रहने लगा था। एक बार हम बाहर से नई दिल्ली स्टेशन आए, हमें एक दिन दिल्ली में रुककर कहीं जाना था। नई दिल्ली स्टेशन के बाहर ही पहाड़ गंज की तरफ एक दुकान थी, टूरिस्ट सेंटर शायद नाम रहा होगा, बताया कि सरकारी है। हम सुबह 9 बजे करीब पहुंचे थे, हमने बताया कि एक दिन के लिए होटल चाहिए, अगले दिन हमें बाहर जाना है, उसने हमारी पर्ची काट दी पैसे लेकर और बताया कि करोल बाग के इस होटल में आपके कल तक रुकने की व्यवस्था हो गई है। हम करीब 10 बजे होटल पहुंचे, नहाकर तैयार हुए और 12 बजे के बाद भोजन के लिए बोला, तब होटल वालों ने बताया कि आपका एक दिन पूरा हो चुका है, अब अगले दिन का किराया दीजिए, तब आप और रुक पाएंगे। इसके बाद क्या कुछ हुआ, वह महत्वपूर्ण नहीं है, बस इन लोगों के घटियापन की तरफ मैं इशारा कर रहा था।

इतना ही नहीं रेलवे स्टेशन के पास अथवा कश्मीरी गेट बस अड्डे पर लोग खाने की दुकानों पर किस तरह ठगते हैं, यह कल्पना से परे है, आईएसबीटी की एक घटना याद आ रही है, मैंने दाम पूछकर छोले भटूरे लिए, उसने साथ में कुछ दही मिला पानी, उसने उसको रायता बताया और कहा यह लीजिए, प्याज को सलाद बताकर दिया और बाद में- रायता, सलाद, अचार वगैरह के अलग से दाम जोड़कर, मूल दाम के दो-गुने से भी ज्यादा की वसूली कर ली, क्योंकि असभ्यता में उसका मुकाबला करने की मेरी हिम्मत नहीं थी।

ऐसे उदाहरण अनेक मिल जाएंगे, मुंबई में चौपाटी पर भी बहुत से लोग, जैसे बंदूक से गुब्बारे फुड़वाने वाले, पहले बताएंगे 5 रुपये प्रति राउंड, आपसे कहेंगे कि राउंड तो पूरा कर लो और फिर 100 रुपये का हिसाब बना देंगे।

मैंने जो घटनाएं बताईं वे बहुत पुरानी हैं, क्योंकि बाद में तो मैं इतना समझ गया था कि कहाँ और कौन लोग ऐसा जाल बिछाते हैं। लेकिन मैं समझता हूँ कि हमारी यह ज़िम्मेदारी  है कि ऐसा माहौल बनाएं कि नए, भोले-भाले लोग, ऐसे लोगों के जाल में न फंस पाएं।

समय के साथ इतना तो हुआ है कि लोग बात उठाते हैं, प्राधिकारियों के सामने, पोर्टल पर, इंटरनेट के माध्यम से, तो फर्क पड़ता है। बस यही मन हुआ कि शहर में आने वाले लोगों के साथ धोखा बंद हो, इसके लिए आज मैंने बात उठाई, जिन लोगों की जानकारी में ऐसी घटनाएं आएं वे उनको सही जगह पर उठाएं जिससे दिल्ली का यह संस्कृतिविहीन नगर, संस्कारविहीन भी सिद्ध न हो।    

नमस्कार।

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84. जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाए तरुवर की छाया

एनटीपीसी में अपनी सेवा के दौरान बहुत से सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन से जुड़ा रहा और इस सिलसिले में अनेक जाने-माने कवियों, कलाकारों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, बहुत से श्रेष्ठ कवियों से तो मित्रता हो गई थी, बहुतों की कविताओं/गीतों को मैंने अपने ब्लॉग में उद्धृत भी किया है।

कुछ अलग किस्म के कलाकार रहे, जैसे पण्डवानी, कठपुतली आदि का प्रदर्शन करने वाले। गायन के कार्यक्रमों में जहाँ- नितिन मुकेश, जगजीत सिंह, अनूप जलोटा आदि के कार्यक्रम हुए, वहीं आज जिस कलाकार समूह अथवा परिवार का बरबस खयाल आ रहा है, वह अपनी तरह का एक अलग कलाकार परिवार है, जिसकी अलग पहचान बनी है, ये हैं- शर्मा बंधु।

पहले जब इन कार्यक्रमों का आयोजन शुरू किया था, आठवें दशक में, उस समय मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से संपर्क की आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं, अतः व्यक्तिगत रूप से मिलने और कार्यक्रम निश्चित करने के लिए जाना पड़ता था, ईवेंट मैनेजर्स पर, मैंने जब तक संभव हुआ निर्भर होना स्वीकार नहीं किया।

तो शर्मा बंधु का काफी नाम उस समय था, अब तो मैं इन गतिविधियों से काफी दूर गोआ में सेवा निवृत्ति का जीवन बिता रहा हूँ, पता ही नहीं है कि आयोजनों की मार्केट में कौन चल रहा है। हाँ तो यह विचार किया गया कि शर्मा बंधुओं का कार्यक्रम रखा जाए, यह शायद 1990 के आसपास की बात है। शर्मा बंधुओं के गाए कुछ भजन उस समय काफी लोकप्रिय थे, इनमें से एक और शायद सबसे अधिक लोकप्रिय था-

जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को

मिल जाए तरुवर की छाया

ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है

मैं जबसे शरण तेरी आया, मेरे राम।

शर्मा बंधुओं की कौन सी पीढ़ी उस समय थी और कौन सी अब चल रही है, आजकल वे कार्यक्रम दे भी रहे हैं या नहीं, मुझे मालूम नहीं है। लेकिन मैंने और शायद उस कार्यक्रम का आनंद लेने वाले अधिकांश लोगों ने महसूस किया कि जिस प्रकार संगीत के लिए समर्पित घराने लोगों के मन पर छाप छोड़ते हैं, उसी प्रकार भक्ति संगीत के लिए समर्पित इस परिवार ने भी अपनी अलग पहचान बनाई है।

मुज़फ्फरनगर में इनके घर पर जब मैं संपर्क करने गया, तब मालूम हुआ कि वहाँ भी आश्रम जैसा माहौल था, एक बड़ा सा आंगन था और जहाँ तक मुझे याद है उसमें कुआं भी था। पीढ़ी दर पीढ़ी भक्ति के प्रति समर्पित इस संगीतमय संकल्प को आज प्रणाम करने का मन हुआ, जिसमें आस्था ही जीवन में आगे बढ़ने का संबल बनती है-

भटका हुआ मेरा मन था कोई

मिल ना रहा था सहारा

लहरों से लड़ती हुई नाव को जैसे

मिल ना रहा हो किनारा,

इस लड़खड़ाती नाव को ज्यों

किसी ने किनारा दिखाया,

ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है

मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे राम।  

कुल  मिलाकर उस आयोजन के बाद जैसा अनुभव हुआ कि शर्मा बंधु पूरे मन से तल्लीन होकर अपने भजन और उनकी व्याख्या प्रस्तुत करते हैं, जैसे वे शिव जी के बारे में एक भजन गाते हुए कहते हैं कि वे-‘राम नाम का नशा किए हैं’, जबकि ऐसा दिखाया जाता है कि शिव जी भांग-धतूरे आदि का नशा करते हैं।

मुझे याद है कि उन्होंने इसकी भी बड़ी सुंदर व्यख्या की थी-

भवानी शंकरौ वंदे, श्रद्धा विश्वास रूपिणो

उन्होंने बताया था कि भवानी श्रद्धा की प्रतीक हैं और शंकर जी के मन में विश्वास अटूट है, भवानी का विश्वास श्रीराम जी को वन में भटकते देखकर डिग गया था और उन्होंने अपने पूर्व स्वरूप में, श्रीराम जी की परीक्षा लेने का प्रयास किया था, जिसका परिणाम उनको भोगना पड़ा था।

कुल मिलाकर आज अचानक भक्ति संगीत की परंपरा में अपनी अलग पहचान बनाने वाले इस परिवार की याद आई, मैं इनके प्रति सद्भाव एवं सम्मान व्यक्त करता हूँ।

नमस्कार।

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83. काम नए नित गीत बनाना

काफी अरसा बीत गया यह ब्लॉग लिखते-लिखते, जैसा बाबा तुलसीदास जी ने कहा- स्वांतः सुखाय। सोशल मीडिया के ये मंच, जो विद्वानों से भरे पड़े हैं, वहाँ सोचा कि अनुभूतियों की बात ज्यादा से ज्यादा करूं। ऐसे ही एक दिन खयाल आया कि ब्लॉग लिखना शुरू किया जाए। इस बहाने अपनी कुछ कविताएं भी, जो सिर्फ ज़ेहन में सुरक्षित थीं उनको डिजिटल रूप में रक्षित कर लिया। कोशिश की है कि जहाँ तक संभव हो, दलगत राजनीति पर चर्चा न करूं।

शुरू में एक लक्ष्य था कि अपने बचपन से लेकर सेवाकाल के अंत तक के अनुभवों को इसमें संजो लूं। वह हो  गया, अब यदा-कदा जो मन में आएगा, वह लिखता रहूंगा। मेरे लिए प्रेरणा के सबसे बड़े स्रोत कवि-कलाकार हैं, फिल्मकार राजकपूर हैं, मुकेश, शैलेंद्र और उनकी सारी टीम है, अपनी पसंद की बड़े कवियों की रचनाएं भी मैंने जब मन हुआ है, इसमें शेयर की हैं।

सोशल मीडिया पर जुड़े लोगों के पास सामान्यतः इतना समय नहीं होता कि वे लिंक को खोलकर ब्लॉग पढ़ें। सच्चाई है कि मैंने भी कभी किसी के ब्लॉग नहीं पढ़े हैं, लेकिन जब ब्लॉग वाले मूल पृष्ठ पर से यह सूचना मिलती है कि कोई नया पाठक/ब्लॉगर मेरा ब्लॉग पढ़ना प्रारंभ कर रहा है तो और आगे लिखने की प्रेरणा मिलती है। ये प्रेरणा अपने नियमित संपर्कों के मुकाबले अजनबियों से ज्यादा मिलती है।  

मुझे ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का राजू याद आता है, जो कहता है-

काम नए नित गीत बनाना,

गीत बना के, जहाँ को सुनाना,

कोई न मिले तो अकेले में गाना,

कविराज कहे, न ये ताज रहे,

न ये राज रहे, न ये राजघराना,

प्रेम और प्रीत का गीत रहे,

कोई लूट सका न कभी ये खजाना,

मेरा नाम राजू, घराना अनाम,

बहती है गंगा, जहाँ मेरा धाम।

मैं सामान्यतः मुकेश जी के गीत उद्धृत करता हूँ, वैसे मैंने जगजीत सिंह जी और गुलाम अली जी की गाई गज़लें भी शेयर की हैं, आज किसी और के गाये फिल्मी गीत की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

दिल की गिरह खोल दो, चुप न बैठो, कोई गीत गाओ,

महफिल में अब कौन है अजनबी, तुम मेरे पास आओ।

अंत में इतना ही-

चलता ही रहूं, हर मंज़िल तक, अंजाम से बेगाना,

दिवाना मुझको लोग कहें, मैं समझूं जग है दिवाना।

नमस्कार।

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82. कल और आएंगे, नगमों की खिलती कलियां चुनने वाले!

अज्ञेय जी की एक कविता है-‘नए कवि से’, काफी लंबी कविता है, उसका कुछ हिस्सा यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ- 

, तू आ, हाँ, आ,
मेरे पैरों की छाप-छाप पर रखता पैर,
मिटाता उसे, मुझे मुँह भर-भर गाली देता-
आ, तू आ।

तेरा कहना है ठीक: जिधर मैं चला
नहीं वह पथ था:
मेरा आग्रह भी नहीं रहा मैं चलूँ उसी पर
सदा जिसे पथ कहा गया, जो

इतने-इतने पैरों द्वारा रौंदा जाता रहा कि उस पर
कोई छाप नहीं पहचानी जा सकती थी।
मेरी खोज नहीं थी उस मिट्टी की
जिस को जब चाहूँ मैं रौंदूँ: मेरी आँखें

उलझी थीं उस तेजोमय प्रभा-पुंज से
जिस से झरता कण-कण उस मिट्टी को
कर देता था कभी स्वर्ण तो कभी शस्य,
कभी जीव तो कभी जीव्य,

अनुक्षण नव-नव अंकुर-स्फोटित, नव-रूपायित।
मैं कभी न बन सका करुण, सदा
करुणा के उस अजस्र सोते की ओर दौड़ता रहा जहाँ से
सब कुछ होता जाता था प्रतिपल——

कविता का इतना ही भाग यहाँ दूंगा अन्यथा बहुत ज्यादा हो जाएगा। अज्ञेय जी कवि थे, महान रचनाकार थे, सो वे अपने बाद के रचनाकारों को संबोधित कर रहे थे। कह रहे थे कि सृजन के इस पथ पर, नई राहों के अंवेषी के रूप में, उनसे जो बन पड़ा उन्होंने किया, अब नए रचनाकार की बारी है कि वह अपने झंडे गाड़े, अपनी रचनाधर्मिता का लोहा मनवाए।

साहित्य का क्षेत्र हो, पत्रकारिता का या कोई भी क्रिएटिव फील्ड हो, हर क्षेत्र में कितने महारथी आए, उन्होंने अपने कृतित्व से लोगों को चमत्कृत किया और फिर पताका नए लोगों के हाथों में सौंपकर आगे बढ़ गए। आज खयाल आया कि रचनाधर्मिता की इस अनंत यात्रा को सलाम करूं, क्योंकि जो ऊंचाई एक तारीख में एक मिसाल होती है वही कभी बहुत छोटी लगने लगती है, ऐसे में कुछ लोग हैं जो हमेशा नए लोगों के लिए चुनौती और प्रेरणा बने रहते हैं।

हालांकि एक क्षेत्र ऐसा भी है- राजनीति का, जहाँ बहुत से लोग पूरी तरह अपनी चमक खो देते हैं-

जो आज रौनक-ए-महफिल दिखाई देता है,

नए लिबास में क़ातिल दिखाई देता है।

खैर आज की चर्चा का विषय यह नहीं है। आज तो इस चर्चा का समापन साहिर लुधियानवी जी की इन पंक्तियों से करना सर्वथा उपयुक्त होगा-

कल और आएंगे नगमों की खिलती कलियां चुनने वाले,

मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले,

कल कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे,  

मसरूफ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक्त अपना बर्बाद करे।

मैं पल दो पल का शायर हूँ——

कुल मिलाकर शायरों, कलाकारों की यह परंपरा, जिसमें भले ही कोई किसी समय विशेष कालखंड में ही सृजनरत रहा हो, लेकिन यह निरंतर चलने वाली परंपरा हमारी महान धरोहर है।

इस परंपरा को प्रणाम करते हुए आज यहीं समापन करते हैं।

नमस्कार।

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