एक मैं कि तेरे नाम से, ना-आशना आवारगी|

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग-पोस्ट को दोहरा रहा हूँ|

एक फिल्मी गाना याद आ रहा है, फिल्म थी- ’मैं नशे में हूँ’, यह गीत राज कपूर जी पर फिल्माया गया है, शैलेंद्र जी ने लिखा है, शंकर जयकिशन का संगीत और आवाज़ है मेरे प्रिय गायक मुकेश जी की। बोल हैं-

हम हैं तो चांद और तारे
जहाँ के ये रंगी नज़ारे
हाय री हाय ओ दुनिया
हम तेरी नज़र में आवारे.
.

ये आवारगी भी अज़ीब चीज है, कहीं इसको पवित्र रूप भी दिया जाता है। यायावर कहते हैं, परिव्राजक कहते हैं, और भी बहुत से नाम हैं। जब हम एक रूटीन से बंधे होते हैं, तब हम चाहें तब भी आवारगी नहीं कर सकते। आवारगी में मुख्य भाव यही है कि कोई उद्देश्य इसमें नहीं होता, वैसे नकारात्मक अर्थों में ऐसी भी आवारगी होती है, जिसमें उद्देश्य गलत होता है, लेकिन उसके लिए कुछ दूसरे शब्द भी हैं, इसलिए उसको हम अपनी इस चर्चा में नहीं लाएंगे।

भंवरा जो फूलों पर मंडराता रहता है, वह भी प्रकृति की सुंदरता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, परागण करके, फूलों की सुंदरता को फैलाने में सहायक होता है। मधुमक्खी की आवारगी तो जैसे हमारे मधु-उद्योग को ही चलाती है, लेकिन कहीं अगर उनके इस कार्य के दौरान, उनके हत्थे चढ़ गए तो खैर नहीं। इंसान तो खैर बहुत चालाक है, उनकी मेहनत से भी खूब वसूली करता है, और इस काम में बाबा रामदेव भी पीछे नहीं रहते।

खैर निरपेक्ष भाव से गीतों, गज़लों में आए ‘आवारगी’ के ज़िक्र पर चर्चा करते हैं, पवित्र आवारगी के बारे में-

जिस गीत का उल्लेख पहले किया, उसमें ही आगे पंक्तियां हैं-

जीवन के ये लंबे रस्ते, काटेंगे गाते-हंसते,
मिल जाएगी हमको मंज़िल, एक रोज़ तो चलते चलते,
अरमान जवां हैं हमारे, छूने को चले हैं सितारे,
हाय रे हाय ओ दुनिया—

एक जोश है अपने दिल में, घबराए नहीं मुश्किल में,
सीखा ही नहीं रुक जाना, बढ़ते ही चले महफिल में,
करते हैं गगन पे इशारे, बिजली पे कदम हैं हमारे,
हाय रे हाय ओ दुनिया—

राहों में कोई जो आए, वो धूल बने रह जाए,
ये मौज़ हमारे दिल की, न जाने कहाँ ले जाए,
हम प्यार के राजदुलारे, और हुस्न के दिल से सहारे,

हाय रे हाय ओ दुनिया, हम तेरी नज़र में आवारे।

एक और गीत है, जो भगवान दादा पर फिल्माया गया है-

हाल-ए-दिल हमारा, जाने न बेवफा ये ज़माना-ज़माना
सुनो दुनिया वालों, आएगा लौटकर दिन सुहाना-सुहाना।

एक दिन दुनिया बदलकर, रास्ते पर आएगी,
आज ठुकराती है हमको, कल मगर शर्माएगी,
बात ये तुम जान लो, अरे जान लो भैया।

दाग हैं दिल पर हज़ारों, हम तो फिर भी शाद हैं,
आस के दीपक जलाए देख लो आबाद हैं,
तीर दुनिया के सहे और खुश रहे भैया।

और फिर आवारगी की पवित्रता का संकल्प-

झूठ की मंज़िल पे यारों, हम न हर्गिज़ जायेंगे
हम ज़मीं की खाक सही पर, आसमां पर छाएंगे।
क्यूं भला दबकर रहें, डरते नहीं भैया।

आवारगी को प्रोमोट करने का मेरा कोई इरादा नहीं है, मेरा यही मानना है कि जो कवि-कलाकार होते हैं, वे मन से आवारा होते हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो लीक पर चलने वाले नहीं होते, अज्ञेय जी ने कहा, वे राहों के अंवेशी होते हैं। इस पवित्र आवारगी को प्रणाम करते हुए बता दूं कि इस विषय पर आगे भी बात करूंगा।

आखिर में गुलाम अली जी की गाई गज़ल का एक शेर-

एक तू कि सदियों से मेरे हमराह भी, हमराज़ भी,
एक मैं कि तेरे नाम से ना-आशना आवारगी।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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वक़्त करता जो वफ़ा!

आज फिर से मैं हम सबके प्यारे मुकेश जी का गाया एक नायाब गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत मुकेश जी ने फिल्म- ‘दिल ने पुकारा’ के लिए गाया था, इसे लिखा था इंदीवर जी ने और इसका संगीत तैयार किया था कल्याणजी – आनंदजी की संगीतमय जोड़ी ने|
वक़्त के कारनामे बहुत से होते हैं, जिनमें से एक चाहने वालों का बिछड़ जाना भी है| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत जिसे मुकेश जी ने अपना स्वर देकर अमर बना दिया है-

वक़्त करता जो वफ़ा, आप हमारे होते,
हम भी औरों की तरह आपको प्यारे होते|
वक़्त करता जो वफ़ा …


अपनी तक़दीर में पहले से ही कुछ तो ग़म हैं
और कुछ आपकी फ़ितरत में वफ़ा भी कम है,
वरना जीती हुई बाज़ी तो न हारे होते|
वक़्त करता जो वफ़ा…


हम भी प्यासे हैं ये साक़ी को बताया भी न सके,
सामने जाम था और जाम उठा भी न सके,
काश हम ग़ैरत-ए-महफ़िल के न मारे होते|
वक़्त करता जो वफ़ा…


दम घुटा जाता है सीने में फिर भी ज़िंदा हैं,
तुमसे क्या हम तो ज़िंदगी से भी शर्मिंदा हैं,
मर ही जाते न जो यादों के सहारे होते|


वक़्त करता जो वफ़ा, आप हमारे होते,
हम भी औरों की तरह आपको प्यारे होते|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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ओ दुनिया के रखवाले!

आज मैं 1952 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘बैजू बावरा’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो भजन अथवा कहें कि पीड़ित भक्त के आर्तनाद के रूप में है, शकील बदायुनी साहब ने लिखा था और नौशाद साहब ने इसका संगीत दिया था, यह गीत रफी साहब के अनमोल गीतों में शामिल है, जिसमें उन्होंने अपने स्वरों की उच्चतम रेंज का प्रदर्शन किया था| ऐसा भी कहा जाता है कि इस गीत के दौरान उनके कंठ से खून भी निकल आया था|
लीजिए आज प्रस्तुत है रफी साहब का गाया यह अमर गीत-


भगवान, भगवान … भगवान
ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले
सुन दर्द भरे मेरे नाले|

आश निराश के दो रंगों से, दुनिया तूने सजाई
नय्या संग तूफ़ान बनाया, मिलन के साथ जुदाई
जा देख लिया हरजाई
ओ … लुट गई मेरे प्यार की नगरी, अब तो नीर बहा ले
अब तो नीर बहा ले
ओ … अब तो नीर बहा ले, ओ दुनिया के रखवाले …

आग बनी सावन की बरसा, फूल बने अंगारे
नागन बन गई रात सुहानी, पत्थर बन गए तारे
सब टूट चुके हैं सहारे, ओ … जीवन अपना वापस ले ले
जीवन देने वाले, ओ दुनिया के रखवाले …

चांद को ढूँढे पागल सूरज, शाम को ढूँढे सवेरा
मैं भी ढूँढूँ उस प्रीतम को, हो ना सका जो मेरा
भगवान भला हो तेरा, ओ … क़िस्मत फूटी आस न टूटी
पांव में पड़ गए छाले, ओ दुनिया के रखवाले …

महल उदास और गलियां सूनी, चुप-चुप हैं दीवारें
दिल क्या उजड़ा दुनिया उजड़ी, रूठ गई हैं बहारें
हम जीवन कैसे गुज़ारें, ओ … मंदिर गिरता फिर बन जाता
दिल को कौन सम्भाले, ओ दुनिया के रखवाले …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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अब रात गुजरने वाली है!

आज मैं 1951 में रिलीज़ हुई राजकपूर जी की फिल्म- ‘आवारा’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे हसरत जयपुरी जी ने लिखा था और शंकर जयकिशन जी की संगीत जगत की प्रसिद्ध जोड़ी के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर जी ने अपने मधुर कंठ से यह गीत गाया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

आ जाओ तड़पते हैं अरमां,
अब रात गुजरनेवाली है
मैं रोऊँ यहाँ, तुम चुप हो वहाँ,
अब रात गुजरनेवाली है|

चाँद की रंगत उड़ने लगी
वो तारों के दिल अब डूब गये, डूब गये
है दर्दभरा बेचैन समा,
अब रात गुजरनेवाली है|


इस चाँद के डोले में आई नज़र
ये रात की दुल्हन चल दी किधर, चल दी किधर
आवाज़ तो दो, खोये हो कहाँ,
अब रात गुजरनेवाली है|

घबरा के नज़र भी हार गई
तकदीर को भी नींद आने लगी, नींद आने लगी
तुम आते नहीं, मैं जाऊँ कहाँ,
अब रात गुजरनेवाली है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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ओ जाने वाले हो सके तो!

कल हमारे प्रिय गायक, महान कलाकार और इंसान मुकेश चंद्र माथुर जी का जन्म दिन है| जिन्हें हम प्रेम से सिर्फ ‘मुकेश’ नाम से पुकारते हैं|

उनकी स्मृति में प्रस्तुत आज का यह गीत फिल्म- ‘बंदिनी’ से है, जिसे लिखा था शैलेन्द्र जी ने और इसका संगीत दिया था सचिन देव बर्मन जी ने|

मुकेश जी के गाए गीत मुझ जैसे बहुत से लोगों को जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं|

आइए आज उस महान गायक की स्मृति में उनका गाया यह गीत दोहराते हैं-


ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना,
ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना|


बचपन के तेरे मीत तेरे संग के सहारे,
ढूंढेंगे तुझे गली-गली सब ये ग़म के मारे|
पूछेगी हर निगाह कल तेरा ठिकाना|
ओ जाने वाले —

है तेरा वहां कौन सभी लोग हैं पराए,
परदेश की गर्दिश में कहीं, तू भी खो न जाए|
कांटों भरी डगर है तू दामन बचाना|
ओ जाने वाले—


दे देके ये आवाज कोई हर घड़ी बुलाए,
फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए,
है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना|
ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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बस प्यार ही प्यार पले !

आज किशोर कुमार जी द्वारा स्वयं निर्मित फिल्म – ‘दूर गगन की छाँव में’ के लिए उनके ही द्वारा गाया गया एक गीत शेयर कर रहा हूँ, इस गीत का संगीत भी किशोर कुमार जी ने ही दिया है और इसमें उनके पुत्र अमित कुमार की भी आवाज है|

कुल मिलाकर ये एक बहुत सुंदर और आशावादी गीत है, लीजिए प्रस्तुत है ये गीत-  

आ चल के तुझे मैं लेके चलूँ एक ऐसे गगन के तले,

जहाँ ग़म भी ना हो, आँसू भी ना हो, बस प्यार ही प्यार पले|

++++

सूरज की पहली किरण से आशा का सवेरा जागे

चंदा की किरण से धुलकर घनघोर अंधेरा भागे,

कभी धूप खिले, कभी छाँव मिले, लंबी सी डगर ना खले|

+++++

जहाँ दूर नज़र दौड़ाएं, आज़ाद गगन लहराये

जहाँ रंगबिरंगे पंछी आशा का संदेसा लाये, 

सपनों में पली, हँसती हो कली, जहाँ शाम सुहानी ढले|

++++

सपनों के ऐसे जहां में, जहाँ प्यार ही प्यार खिला हो

हम जा के वहाँ खो जाएं, शिकवा ना कोई गीला हो,

कहीं बैर ना हो, कोई गैर ना हो, सब मिल के यूँ चलते चलें|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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दो पल के जीवन से, एक उम्र चुरानी है!

संतोषानंद जी के बहाने आज की बात करना चाहूँगा| मेरे विचार में संतोषानंद जी इसका उदाहरण हैं, कि किस प्रकार साहित्य की शुद्धतावादी मनोवृत्ति वास्तव में कविता को ही नुकसान पहुंचाती है|

संतोषानंद जी की आज जो स्थिति हो गई है, उसके पीछे उनके पुत्र के साथ हुआ हादसा जिम्मेदार है, मैं उसको भूलते हुए, उससे पहले की उनकी स्थिति की बात करना चाहूँगा|

मुझे अक्सर यह खयाल आता है कि यदि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने समकालीन विद्वद-जनों के अनुमोदन की प्रतीक्षा की होती तो क्या वे ऐसे अमर ग्रंथ दे पाते, सच्चाई तो यह है कि उनके समकालीन विद्वानों ने तो उनको मान्यता दी ही नहीं थी|

सच्चाई यह भी है कि मैं और मेरे साथी कविगणों ने संतोषानंद जी को कभी गंभीरता से नहीं लिया था, फिल्मों में सफल होने के बावज़ूद! मुझे याद है कि मैंने अपने संस्थान में उनको एक कवि सम्मेलन में आमंत्रित किया था क्योंकि मेरे बॉस उनके फैन थे, और मेरे बॉस कोई कवि नहीं थे, बहरहाल मैंने संतोषानंद जी को आमंत्रित किया, जिस कवि सम्मेलन का संचालन- श्रीकृष्ण तिवारी जी कर रहे थे और कई साहित्यिक रूप से मान्यता प्राप्त कवि उसमें शामिल थे|

उस कवि सम्मेलन में भी कुछ आत्म मुग्ध कवियों ने संतोषानंद जी को उचित सम्मान नहीं दिया, और उस समय तो संतोषानंद जी भी सफलता के नशे में चूर थे और बोले कि मंच पर बैठे सभी कवि मुझसे जलते हैं, क्योंकि ये लोग मेरी तरह सफल नहीं हो पाए|

उस समय उनका यह कथन मुझे अहंकार से भरा लगा, लेकिन मुझे अब लगता है कि इसमें मठाधीशों से मान्यता न मिलने का उनका दर्द शामिल था| सामान्य जन को आपके साहित्यिक मानदंडों से मतलब नहीं है| जो बात दिल से निकलकर दिल तक पहुँचती है, वही वास्तविक रचना है –

एक प्यार का नग़मा है, मौजों की रवानी है,
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है|

कवि ने कुछ कहा, लोगों के दिल तक पहुँच गया, और चमत्कार हो गया| आप सोचते रहिए लोगों को क्या पसंद आया, क्यों पसंद आया!
फिर यही बात होती है- ‘उतर-दखिन के पंडिता, रहे विचार-विचार

ध्यान से सोचता हूँ तो खयाल आता है, कि संतोषानंद जी ने कितने सहज तरीके से ये बड़ी बातें कह दी हैं-

कुछ पाकर खोना है, कुछ खोकर पाना है
जीवन का मतलब तो, आना और जाना है|

***
दो पल के जीवन से, एक उम्र चुरानी है|
आदि-आदि|

उनके अनेक गीत ऐसे हैं जिन्होंने लोगों के दिलों में अपना स्थान बना लिया है|

आज संतोषानंद जी की आर्थिक स्थित, उनकी रुग्णता और उनके बेटे के साथ हुए गंभीर हादसे के कारण बहुत खराब है, लेकिन मन है कि उनकी रचनाशीलता को प्रणाम करूं और उनका जीवन सुख से व्यतीत होने की कामना करूं|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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सदा खुश रहे तू !

आज मैं फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत 1961 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘प्यार का सागर’ के लिए मुकेश जी ने रवि जी के संगीत निर्देशन में गाया था,इस गीत के रचनाकार थे प्रेम धवन जी|

लीजिए प्रस्तुत है यह गीत, जो इतना समय बीत जाने के बाद, आज भी लोगों को याद है –

सदा खुश रहे तू जफ़ा करने वाले
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले|

सुनाते ग़म-ए-दिल, जो तुम पास होते
मेरी बेकसी पे भी क्या तुम न रोते

मगर क्या दिखाएं तुम्हे दिल के छाले
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले
सदा खुश रहे तू|

सितम और भी हों तो वो भी किये जा
हो ग़म और भी हों तो वो भी दिए जा
नहीं फिर भी तुझसे गिला करने वाले|
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले||

सदा खुश रहे तू, जफ़ा करने वाले
दुआ कर रहे हैं दुआ करने वाले|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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रहम जब अपने पे आता है तो हंस लेता हूँ!

आज पुरानी फिल्म- किनारे-किनारे के लिए मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत लिखा है न्याय शर्मा जी ने और इसका संगीत दिया है जयदेव जी ने|

यह जीवन बहुत जटिल है| कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ बन जाती हैं कि किस बात पर हंसा जाए और किस बात पर रोया जाए पता ही नहीं चलता| कुछ ऐसी ही स्थिति का गीत है ये|

लीजिए आज प्रस्तुत है, मुकेश जी का गाया यह अमर गीत –

जब ग़म ए इश्क़ सताता है
तो हँस लेता हूँ,
हादसा याद जब आता है
तो हँस लेता हूँ|

मेरी उजड़ी हुई दुनिया में
तमन्ना का चिराग़,
जब कोई आ के जलाता है
है तो हँस लेता हूँ|

जब ग़म ए इश्क़ सताता है
तो हँस लेता हूँ|


कोई दावा नहीं फ़रियाद नहीं
तंज़ नहीं,
रहम जब अपने पे आता है
तो हँस लेता हूँ|

जब ग़म ए इश्क़ सताता
है तो हँस लेता हूँ.


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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संसार है एक नदिया!

साथियो आज मैं आपके साथ शेयर कर रहा हूँ 1975 में रिलीज़ हुई फ़िल्म- ‘रफ्तार’ का एक गीत जिसे – अभिलाष जी ने लिखा था। इस शानदार गीत को मेरे परम प्रिय गायक मुकेश जी ने आशा भौंसले जी के साथ गाया था और इसके लिए संगीत दिया था सोनिक जी ने। इस गीत को मदनपुरी जी और अभिनेत्री मौसमी चटर्जी जी पर फिल्माया गया था।

इस गीत में, एक अलग प्रकार से जीवन दर्शन प्रस्तुत किया गया है और यह बहुत सुंदर गीत है-

संसार है इक नदिया
दुःख सुख दो किनारे हैं!
न जाने कहाँ जाएँ
हम बहते धारे हैं!!
संसार है इक नदिया….


चलते हुए जीवन की,
रफ़्तार में एक लय है!
इक राग में इक सुर में,
संसार की हर शय है !!
संसार की हर शय है!!


इक तार पे गर्दिश में,
ये चाँद सितारे है!
न जाने कहाँ जाएँ,
हम बहते धारे हैं!!
संसार है इक नदिया….


धरती पे अम्बर की,
आँखों से बरसती हैं!
इक रोज़ यही बूंदें,
फिर बादल बनती हैं!
इस बनने बिगड़ने के,
दस्तूर में सारे हैं!


कोई भी किसी के लिए,
अपना न पराया है!
रिश्तों के उजाले में,
हर आदमी साया है!
हर आदमी साया है!!

क़ुदरता के भी देखो तो,
ये खेल निराले हैं!
न जाने कहाँ जाएँ,
हम बहते धारे हैं!!
संसार है इक नदिया……


है कौन वो दुनिया में,
न पाप किया जिसने!
बिन उलझे कांटो से,
हैं फूल चुने किसने!
हैं फूल चुने किसने!!
बेदाग नहीं कोई,
यहां पापी सारे हैं!
संसार है एक नदिया!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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