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शुभाशीष- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Benediction’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



शुभाशीष



इस लघु प्राणी को आशीष दो, इस शुभ्र आत्मा को। जिसने जीता है स्वर्ग का चुंबन,
हमारी धरती के लिए|
उसे सूर्य के प्रकाश से प्रेम है, उसे अपनी माता की सूरत प्यारी
लगती है|
उसने न तो धूल को धिक्कारना सीखा है, और न स्वर्ण के पीछे
भागना|


उसे अपने हृदय से लगा लो और आशीष दो|
वह सैंकड़ों चौराहों वाले इस क्षेत्र में आया है|
मुझे नहीं मालूम कि भीड़ में उसने तुम्हें कैसे चुना, तुम्हारे द्वार पर आया,
और तुम्हारा हाथ थामा, अपना मार्ग जानने के लिए|


वो तुम्हारे पीछे चलेगा, हँसता और बतियाता, और उसके हृदय में कोई
संदेह नहीं होगा|
उसका विश्वास कायम रखो, उसको सीधा मार्ग बताओ और आशीष दो|


उसके सिर पर अपना हाथ रखो, और यह प्रार्थना करो कि यद्यपि नीचे
लहरें कठिन चुनौती दे रही हैं, परंतु ऊपर से हवा आ जाए, उसकी नौका की पाल को भर दे,
और उसको दिशा देते हुए, शांति के स्वर्ग में ले जाए|


जल्दबाजी में उसे भूल न जाना, उसे अपने हृदय से लगाना और
उसे आशीष देना|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Benediction



Bless this little heart, this white soul that has won the kiss of
heaven for our earth.
He loves the light of the sun, he loves the sight of his
mother’s face.
He has not learned to despise the dust, and to hanker after
gold.
Clasp him to your heart and bless him.
He has come into this land of an hundred cross-roads.
I know not how he chose you from the crowd, came to your door,
and grasped you hand to ask his way.
He will follow you, laughing the talking, and not a doubt in
his heart.
Keep his trust, lead him straight and bless him.
Lay your hand on his head, and pray that though the waves
underneath grow threatening, yet the breath from above may come and
fill his sails and waft him to the heaven of peace.
Forget him not in your hurry, let him come to your heart and
bless him.



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं!

आज फिर से दुष्यंत कुमार जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक प्रतिनिधि कवि थे लेकिन उनको सामान्य जनता के बीच विशेष ख्याति आपातकाल में लिखी गई गज़लों के कारण मिली थी, जिनको बाद में एक संकलन – ‘साये में धूप’ के रूप में प्रकाशित किया गया|


प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी के इसी संकलन से यह गजल-


कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं|

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं|

वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको,
क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं|

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,
जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं|

मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने,
उस तरफ़ जाने से क़तराने लगे हैं|

मौलवी से डाँट खा कर अहले-मक़तब,
फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं|

अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम,
आदमी को भूल कर खाने लगे हैं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं!

आज फिर से दुष्यंत कुमार जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक प्रतिनिधि कवि थे लेकिन उनको सामान्य जनता के बीच विशेष ख्याति आपातकाल में लिखी गई गज़लों के कारण मिली थी, जिनको बाद में एक संकलन – ‘साये में धूप’ के रूप में प्रकाशित किया गया|
प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी के इसी संकलन से यह गजल-


नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं,
जरा-सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं|

वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है,
मेरे बयान को बंदिश निगल न जाए कहीं|

यों मुझको ख़ुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन,
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं|

चले हवा तो किवाड़ों को बंद कर लेना,
ये गरम राख़ शरारों में ढल न जाए कहीं|

तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है,
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं|

कभी मचान पे चढ़ने की आरज़ू उभरी,
कभी ये डर कि ये सीढ़ी फिसल न जाए कहीं|

ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते है,
चलो यहां से चलें, हाथ जल न जाए कहीं|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता!

उर्दू के विख्यात शायर निदा फाजली साहब की एक गजल शेयर कर रहा हूँ, निदा साहब बड़ी सहज भाषा में बहुत गहरी बात कह देते हैं| उनकी कुछ पंक्तियाँ जो बरबस याद आ जाती हैं, वे हैं- ‘मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’, ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए’, ‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’|

couple romancing

लीजिए आज उनकी इस गजल का आनंद लेते हैं-

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता,
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता|

सब कुछ तो है, क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें,
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता |

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता|

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता|

वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है ,
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नहीं जाता |

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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कैसा मौसम है ये!

आज हम ऐसे समय में चल रहे हैं जिसकी न किसी ने पहले कल्पना की होगी और निश्चित रूप से किसी ने इसकी कामना तो नहीं ही की होगी| जी हाँ कोरोना की महामारी का यह काल, पूरी मानव जाति को इसने त्रस्त करके रखा है| सब यही सोचते रहते हैं कि कब यह दौर समाप्त होगा, कब हम पहले की तरह अपनी ज़िंदगी जी पाएंगे|


हम पहले फिल्मों आदि में देखते थे कि किसी दूसरे ग्रह के प्राणियों के चेहरे कुछ अलग तरह के होते हैं, या जैसा ‘पेपा पिग’ आदि में हम देखते हैं, आज इंसानों की हालत कुछ वैसी ही हो गई है|


मैं अब गोवा में रहता हूँ (यद्यपि फिलहाल बंगलौर में हूँ)| गोवा जैसे अनेक नगर और राज्य तो ऐसे हैं जिनकी आमदनी का मुख्य स्रोत ही पर्यटन है| लेकिन फिलहाल जहां अर्थव्यवस्था पर अनेक गंभीर संकट आए हैं, वहीं पर्यटन पर तो शायद इस महामारी की मार सबसे ज्यादा पड़ी है|


ऐसे में कवि बिहारी जी की एक सतसई याद आ गई, जिसमें वह प्रेमी नायक द्वारा सिर्फ अपने नयनों से ही की जाने वाली विभिन्न अभिव्यक्तियों का बहुत सुंदर चित्रण कराते हैं –


कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन मैं करत हैं नैननु ही सब बात॥


इस सतसई के प्रसंग को याद करके ये खयाल आया कि जब प्रेमी-प्रेमिका नयनों के माध्यम से ही ये सारे संप्रेषण, ये अभिव्यक्ति करते हैं, तब वे भले ही कोई शब्द न बोलते हों, परंतु उनके होंठ, उनकी नासिका, उनके गाल आदि भी कुछ योगदान उनके इस संप्रेषण में करते हैं, जैसे गालों में गड्ढे पड़ जाना, जैसे कहते हैं सुर्ख लाल हो जाना आदि| मतलब ऐसी बॉडी लैंग्वेज़, जिसका संबद्ध उनके चेहरे से ही है| आज मुह पर मास्क लगाकर, जबकि केवल आँखें ही दिखाई देती हैं, आँखों से ही किया जाने वाला, ये संप्रेषण कुछ और मुश्किल हो जाता न बिहारी जी!


कहते हैं न- ‘बरबादियों का जश्न मनाता चला गया’| तो इस तरह की बातें सोचकर ही हम कोरोना से कह सकते हैं कि ऐसी मुसीबत हमने पहले नहीं देखी है, लेकिन हम मनुष्य, हम भारतवासी इसका सामना करने के लिए तैयार हैं| एक तरह से हमारे सक्रिय जीवन-काल से यह अवधि, शायद कुल मिलाकर 7-8 महीने की, कम हो गई है| हम आशा करते हैं कि तब तक कोरोना वेक्सीन के कारण और हमारे सम्मिलित प्रयासों के बल पर इस दुष्ट दानव का अंत हो जाएगा|


सामाजिकता की सारी गतिविधियों को, सारे आयोजनों को इस दुष्ट महामारी ने ध्वस्त करके रख दिया है| कई ऐसी घटनाएँ हुईं कि जरा सी लापरवाही बहुत महंगी पड़ गई| जैसे एक विवाह में दूल्हा कहीं से बीमारी लेकर आ गया था और वैवाहिक आयोजन के माध्यम से बहुत सारे लोगों को अपने साथ लेकर चला गया| इसलिए इस माहौल में बहुत फूँक-फूँक कर कदम रखने की ज़रूरत है| यह समय बहादुरी दिखाने का बिलकुल नहीं है| कहते हैं न कि ‘दिल की बाज़ी, जो हारा- वही जीता’ इसी तरह इस दुष्ट महामारी का मुक़ाबला धैर्य और सावधानी के साथ करना होगा| इसको चुनौती देने से काम नहीं चलेगा|

यही कामना है कि मानव समुदाय इस संकट पर शीघ्र विजय प्राप्त करे और हम सभी फिर से अपना जीवन पूर्णता के साथ जी सकें| जहां मन हो वहाँ आने-जाने का मौसम फिर से लौटकर आए|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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पुष्पों का विद्यालय – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Flower School’ का भावानुवाद-




गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


पुष्पों का विद्यालय



तूफानी बादल जब आकाश में गरजते हैं और जून माह की वर्षा बौछार धरती पर आती है|
नमी से भरी पुरवाई जब रेतीले मैदानों पर आगे बढ़ती आती है
बांस वनों में अपना मधुर वाद्य बजाने के लिए|


तब अचानक पुष्प टोलियों में प्रकट हो जाते हैं, कोई नहीं जानता कहाँ से
और घास के ऊपर वे जंगली मस्ती में नृत्य करते हैं|
माँ, मुझे वास्तव में ऐसा लगता है की पुष्प किसी भूमिगत विद्यालय में जाते हैं|


बंद दरवाजों के भीतर वे अपने पाठ पढ़ते हैं, और यदि वे चाहते हैं कि
नियत समय से पहले वे बाहर आकर खेलें, तो उनके शिक्षक उनको
किनारे पर खड़ा कर देते हैं|
जब वर्षा आती है, तब उनकी छुट्टियाँ हो जाती हैं|


जंगल में शाखाएँ आपस में उलझ जाती हैं, और पत्तियाँ सरसराती हैं
जंगली हवा के कारण, तूफानी बादल अपने विशाल हाथों से तालियाँ बजाते हैं, और
बालक पुष्प बाहर आते हैं अपने गुलाबी, पीत और श्वेत वस्त्रों में|


क्या तुम जानती हो माँ, उनका घर आकाश में वहाँ है, जहां सितारे हैं|
क्या तुमने यह नहीं देखा कि वे वहाँ जाने के लिए इतने आतुर क्यों हैं? क्या तुम
यह नहीं जानतीं कि वे इतनी जल्दी में क्यों हैं?


बेशक, मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि वे किसकी ओर अपना हाथ उठाते हैं; उनकी भी माँ है, जैसे मेरी है|



-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



The Flower School


When storm-clouds rumble in the sky and June showers come down.
The moist east wind comes marching over the heath to blow its
bagpipes among the bamboos.
Then crowds of flowers come out of a sudden, from nobody knows
where, and dance upon the grass in wild glee.
Mother, I really think the flowers go to school underground.
They do their lessons with doors shut, and if they want to
come out to play before it is time, their master makes them stand
in a corner.
When the rain come they have their holidays.
Branches clash together in the forest, and the leaves rustle
in the wild wind, the thunder-clouds clap their giant hands and the
flower children rush out in dresses of pink and yellow and white.
Do you know, mother, their home is in the sky, where the stars
are.
Haven’t you see how eager they are to get there? Don’t you
know why they are in such a hurry?
Of course, I can guess to whom they raise their arms; they
have their mother as I have my own.


-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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राजा को खबर तक नहीं!

आज मैं पंडित श्रीकृष्ण तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जो मेरे हमनाम हैं (मैं शर्मा हूँ, वे तिवारी हैं), वाराणसी के निवासी हैं और उन्होंने कुछ बहुत सुंदर नवगीत लिखे हैं| मैंने अपनी संस्था के लिए किए गए आयोजनों में से एक में श्री तिवारी जी को बुलाया था जिसमें उन्होंने अपने श्रेष्ठ काव्य पाठ के अलावा बहुत सुंदर संचालन भी किया था|


लीजिए प्रस्तुत है श्री तिवारी जी का यह गीत जो अव्यवस्था, अराजकता और शासन की असफलताओं की ओर इशारा करता है –



भीलों ने बाँट लिए वन,
राजा को खबर तक नहीं|

पाप ने लिया नया जनम
दूध की नदी हुई जहर,
गाँव, नगर धूप की तरह
फैल गई यह नई ख़बर,
रानी हो गई बदचलन
राजा को खबर तक नहीं|

कच्चा मन राजकुंवर का
बेलगाम इस कदर हुआ,
आवारे छोरे के संग
रोज खेलने लगा जुआ,
हार गया दांव पर बहन
राजा को खबर तक नहीं|

उलटे मुंह हवा हो गई
मरा हुआ सांप जी गया,
सूख गए ताल -पोखरे
बादल को सूर्य पी गया,
पानी बिन मर गए हिरन
राजा को खबर तक नहीं|

एक रात काल देवता
परजा को स्वप्न दे गए,
राजमहल खंडहर हुआ
छत्र -मुकुट चोर ले गए,
सिंहासन का हुआ हरण
राजा को खबर तक नहीं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|



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आँचल बुनते रह जाओगे!

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का लिखा एक सुंदर गीत| रामावतार त्यागी जी किसी समय हिन्दी कवि सम्मेलनों में गूंजने वाला एक प्रमुख स्वर हुआ करते थे| यह गीत भी उनकी रचनाशीलता का एक उदाहरण है-

मैं तो तोड़ मोह के बंधन
अपने गाँव चला जाऊँगा,
तुम आकर्षक सम्बन्धों का,
आँचल बुनते रह जाओगे|

मेला काफी दर्शनीय है
पर मुझको कुछ जमा नहीं है,
इन मोहक कागजी खिलौनों में
मेरा मन रमा नहीं है|


मैं तो रंगमंच से अपने
अनुभव गाकर उठ जाऊँगा,
लेकिन, तुम बैठे गीतों का
गुँजन सुनते रह जाओगे|

आँसू नहीं फला करते हैं
रोने वाले क्यों रोता है?
जीवन से पहले पीड़ा का,
शायद अंत नहीं होता है|


मैं तो किसी सर्द मौसम की
बाँहों में मुरझा जाऊँगा,
तुम केवल मेरे फूलों को
गुमसुम चुनते रह जाओगे|

मुझको मोह जोड़ना होगा
केवल जलती चिंगारी से,
मुझसे संधि नहीं हो पाती
जीवन की हर लाचारी से|


मैं तो किसी भँवर के कंधे
चढकर पार उतर जाऊँगा,
तट पर बैठे इसी तरह से
तुम सिर धुनते रह जाओगे|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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That stone, broke everything!

This is the story of Ravi, which I would write, as if he is writing it.

Today is going to be a day full of activities. Election results are to be announced today. My Netaji, who is my mentor, I have been living at his bungalow, the MLA residence, here in the capital city of the state, for over 10 years now.

Netaji is from my village and have been MLA for 3 terms now, he is considered to be quite senior and respectable leader in the state, whether his party is in power or not.

I remember the day almost 10 years back when I had done my graduation and Netaji was at his home in our village, where he kept visiting since his family lived there only and it was his constituency. Netaji personally knew my family, like so many other families in his village and also his constituency.

I had scored good marks in my graduation exams and my father took me to the Netaji residence to get his blessings on my becoming a graduate. Netaji had been a witness to my academic record, I also received awards in my school from him.

My father informed Netaji about my result, I touched his feet to get his blessings and while my father expressed his worries regarding my future, Netaji proposed that I can live at his MLA residence, attend to his works as his Personal Secretary and the salary he offered was nice, such that I could not think of  at that time, while I had mostly been confined to my village.

It is since then that I have been living at the official residence of Netaji, looking after his requirements, making his travel and stay arrangements whenever he visited somewhere. It was mostly during the sessions of the assembly only that Netaji lived there otherwise it was I only who lived at the bungalow all the time.

I do not carry very good image about political persons, now that I have lived over 10 years in the capital city, but I still feel that Netaji who is considered among the old guard in politics, still carries some values and has got a good image among the people.

Netaji have been winning elections almost in one-sided way, it was considered that there is nobody in his constituency who could give him a good fight. But it was not so this time. A young person from the opposition had served the local people in many ways before being declared the candidate against him. He put many proposals before the people regarding development and progress in the area and it was considered to be a tough fight this time.

In the meanwhile, politics have become quite dirty, there are fights among the supporters of various candidates and use of undignified language also by some people. Anyway, this time it was being felt that Netaji might lose the elections for the first time in his career. An incident which happened during the campaign actually changed the situation. Netaji had gone to campaign in his area when some person in the crowd threw a stone on him, he was hit in the forehead, was hospitalized and had to skip campaign for 2-3 days and this incident created a great sympathy wave among his electorate, who had been electing him term after term till now.

Anyway, it was almost a month back and by now elections were over and results were to be announced today. Many people would be visiting today and I have to make necessary arrangements for the guests, who are all sure about the victory of Netaji.

An incident happened last night however which have changed the image of my well-wisher and employer Netaji. He has been quite concerned about his image. He sometimes drinks but alone only, may be in my presence. But yesterday some of his friends and campaign in-charges had come they enjoyed drinks and also requested him to join and being thankful to them for their efforts, he also joined them.

He took whiskey in limits only however while they were discussing about elections somebody said ‘that very incident changed the situation completely’, on that Netaji suddenly said, ‘Your people should have acted more wisely. It hit me so hard that for a while I felt whether I would survive or not!’. The person replied, “ For reaping such benefits, this much is necessary, thank God it would get you elected this time.”
On listening all that I felt that I would suddenly fall down, it was such a sudden and big blow for me. It was too late to do anything when I found out who was behind it.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt-Write a short story that starts or ends with-  “It was too late to do anything when I found out who was behind it.” #shortstory

Thanks for reading.


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हर लड़की की अम्मा मुझको!

आज स्वर्गीय गोपाल प्रसाद व्यास जी की एक हास्य कविता शेयर कर रहा हूँ| व्यास जी किसी समय दिल्ली  में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के कर्ता-धर्ता हुआ करते थे| लाल-किले पर प्रतिवर्ष स्वाधीनता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर आयोजित होने वाले विराट कवि-सम्मेलन के भी वही आयोजक होते थे, जहां मुझे बहुत से प्रमुख कवियों को सुनने का सौभाग्य मिला|

व्यास जी प्रत्येक रविवार को दैनिक हिंदुस्तान में ‘नारद जी खबर लाए हैं’ स्तंभ भी लिखते थे, जो काफी लोकप्रिय था और उसमें सामयिक घटनाओं पर रोचक एवं सटीक टिप्पणियाँ की जाती थीं|

लीजिए प्रस्तुत है गोपाल प्रसाद ‘व्यास’ जी की यह प्रसिद्ध  कविता-

 

 

हिन्दी के कवियों को जैसे
गीत-गवास लगा करती है,
या नेता टाइप लाला को
नाम-छपास लगा करती है।

 

मथुरा के पंडों को लगती
है खवास औरों के घर पर,
उसी तरह श्रोतागण पाकर
मुझे कहास लगा करती है।

 

पढ़ते वक्त मुझे बचपन में
अक्सर प्यास लगा करती थी,
और गणित का घंटा आते
शंका खास लगा करती थी।

 

बड़ा हुआ तो मुझे इश्क के
दौरे पड़ने लगे भंयकर,
हर लड़की की अम्मा मुझको
अपनी सास लगा करती थी।

 

कसम आपकी सच कहता हूं
मुझको सास बहुत प्यारी है,
जिसने मेरी पत्नी जाई
उस माता की बलिहारी है!

 

जरा सोचिए, अगर विधाता
जग में सास नहीं उपजाते,
तो हम जैसे पामर प्राणी
बिना विवाह ही रह जाते।

 

कहो कहां से मुन्नी आती?
कहो कहां से मुन्ना आता?
इस भारत की जनसंख्या में
अपना योगदान रह जाता।

 

आधा दर्जन बच्चे कच्चे
अगर न अपना वंश बढ़ाते,
अपना क्या है, नेहरू चाचा
बिना भतीजों के रह जाते

 

एक-एक भारतवासी के
पीछे दस-दस भूत न होते,
तो अपने गुलजारी नंदा
भार योजनाओं का ढोते।

 

क्या फिर बांध बनाए जाते?
क्या फिर अन्न उगाए जाते?
कर्जे-पर-कर्जे ले-लेकर
क्या मेहमान बुलाए जाते?

 

यह सब हुआ सास के कारण
बीज-रूप है वही भवानी,
सेओ इनको नेता लोगो!
अगर सफलता तुमको पानी

 

श्वसुर-प्रिया, सब सुखदाता हैं
भव-भयहारिणि जगदाता हैं,
सुजलां सुफलां विख्याता है
सास नहीं, भारत माता है।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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