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मिला विहान को नया सृजन!

आज शुद्ध और बेलौस प्रेम के कवि स्वर्गीय रामानन्द दोषी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| दोषी जी की प्रेम के अभिव्यक्ति अलग ही किस्म की होती थी, उनका प्रसिद्ध गीत है- ‘मन होता है पारा, ऐसे देखा नहीं करो’! काव्य लेखन के अलावा दोषी जी ने कई पत्रिकाओं का संपादन किया, जिनमें ‘कादंबिनी’ भी शामिल थी|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामानन्द दोषी जी का यह गीत-

कि तुम मुझे मिलीं
मिला विहान को नया सृजन,
कि दीप को प्रकाश-रेख
चाँद को नई किरन ।

कि स्वप्न-सेज साँवरी
सरस सलज सजा रही,
कि साँस में सुहासिनी
सिहर-सिमट समा रही|
कि साँस का सुहाग
माँग में निखर उभर उठा,
कि गंध-युक्त केश में
बंधा पवन सिहर उठा|

कि प्यार-पीर में विभोर
बन चली कली सुमन,
कि तुम मुझे मिलीं
मिला विहान को नया सृजन ।


कि प्राण पाँव में भरो
भरो प्रवाह राह में,
कि आस में उछाह सम
बसो सजीव चाह में|
कि रोम-रोम रम रहो
सरोज में सुबास-सी,
कि नैन कोर छुप रहो
असीम रूप प्यास-सी|
अबाध अंग-अंग में
उफान बन उठो सजनि,
कि तुम मुझे मिलीं

मिला विहान को नया सृजन ।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वो दबदबा वो रौब-ए-हुकूमत कहाँ है आज!

अली सरदार जाफ़री साहब का उर्दू अदब में एक अहम मुकाम है, उनको प्रतिष्ठित भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा और अन्य अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए थे| भारतीय फिल्मों में भी उनकी अनेक रचनाओं को शामिल किया गया था|

लीजिए प्रस्तुत है अली सरदार जाफ़री साहब की यह ग़ज़ल-


एक जू-ए-दर्द दिल से जिगर तक रवाँ है आज,
पिघला हुआ रगों में इक आतिश-फ़िशाँ है आज|

लब सी दिये हैं ता न शिकायत करे कोई,
लेकिन हर एक ज़ख़्म के मुंह में ज़बाँ है आज|


तारीकियों ने घेर लिया है हयात को,
लेकिन किसी का रू-ए-हसीं दर्मियाँ है आज|

जीने का वक़्त है यही मरने का वक़्त है,
दिल अपनी ज़िन्दगी से बहुत शादमाँ है आज|

हो जाता हूँ शहीद हर अहल-ए-वफ़ा के साथ,
हर दास्तान-ए-शौक़ मेरी दास्ताँ है आज|


आये हैं किस निशात से हम क़त्ल-गाह में,
ज़ख़्मों से दिल है चूर नज़र गुल-फ़िशाँ है आज|

ज़िन्दानियों ने तोड़ दिया ज़ुल्म का ग़ुरूर,
वो दब-दबा वो रौब-ए-हुकूमत कहाँ है आज|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सूरज सोख न लेना पानी!

डॉक्टर कुँवर बेचैन जी मेरे लिए गुरु तुल्य हैं, मैं भी कुछ समय उसी महाविद्यालय का छात्र रहा जिसमें वे प्रोफेसर थे| दिल्ली में रहते हुए कवि गोष्ठियों में तो उनसे भेंट होती ही रही, बाद में एक आयोजक की भूमिका निभाते हुए भी उनको कवि सम्मेलनों में आमंत्रित करने का सौभाग्य मुझे मिला| बहुत समर्थ रचनाकार और सरल हृदय व्यक्ति हैं, ईश्वर उनको लंबी उम्र दें|

लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह गीत-

सूरज !
सोख न लेना पानी !

तड़प तड़प कर मर जाएगी
मन की मीन सयानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !

बहती नदिया सारा जीवन
साँसें जल की धारा,
जिस पर तैर रहा नावों-सा
अंधियारा उजियारा,
बूंद-बूंद में गूँज रही है
कोई प्रेम कहानी !

सूरज, सोख न लेना पानी !

यह दुनिया पनघट की हलचल
पनिहारिन का मेला,
नाच रहा है मन पायल का
हर घुंघुरू अलबेला|
लहरें बाँच रही हैं
मन की कोई बात पुरानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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शुभाशीष- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Benediction’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



शुभाशीष



इस लघु प्राणी को आशीष दो, इस शुभ्र आत्मा को। जिसने जीता है स्वर्ग का चुंबन,
हमारी धरती के लिए|
उसे सूर्य के प्रकाश से प्रेम है, उसे अपनी माता की सूरत प्यारी
लगती है|
उसने न तो धूल को धिक्कारना सीखा है, और न स्वर्ण के पीछे
भागना|


उसे अपने हृदय से लगा लो और आशीष दो|
वह सैंकड़ों चौराहों वाले इस क्षेत्र में आया है|
मुझे नहीं मालूम कि भीड़ में उसने तुम्हें कैसे चुना, तुम्हारे द्वार पर आया,
और तुम्हारा हाथ थामा, अपना मार्ग जानने के लिए|


वो तुम्हारे पीछे चलेगा, हँसता और बतियाता, और उसके हृदय में कोई
संदेह नहीं होगा|
उसका विश्वास कायम रखो, उसको सीधा मार्ग बताओ और आशीष दो|


उसके सिर पर अपना हाथ रखो, और यह प्रार्थना करो कि यद्यपि नीचे
लहरें कठिन चुनौती दे रही हैं, परंतु ऊपर से हवा आ जाए, उसकी नौका की पाल को भर दे,
और उसको दिशा देते हुए, शांति के स्वर्ग में ले जाए|


जल्दबाजी में उसे भूल न जाना, उसे अपने हृदय से लगाना और
उसे आशीष देना|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Benediction



Bless this little heart, this white soul that has won the kiss of
heaven for our earth.
He loves the light of the sun, he loves the sight of his
mother’s face.
He has not learned to despise the dust, and to hanker after
gold.
Clasp him to your heart and bless him.
He has come into this land of an hundred cross-roads.
I know not how he chose you from the crowd, came to your door,
and grasped you hand to ask his way.
He will follow you, laughing the talking, and not a doubt in
his heart.
Keep his trust, lead him straight and bless him.
Lay your hand on his head, and pray that though the waves
underneath grow threatening, yet the breath from above may come and
fill his sails and waft him to the heaven of peace.
Forget him not in your hurry, let him come to your heart and
bless him.



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं!

आज फिर से दुष्यंत कुमार जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक प्रतिनिधि कवि थे लेकिन उनको सामान्य जनता के बीच विशेष ख्याति आपातकाल में लिखी गई गज़लों के कारण मिली थी, जिनको बाद में एक संकलन – ‘साये में धूप’ के रूप में प्रकाशित किया गया|


प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी के इसी संकलन से यह गजल-


कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं|

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं|

वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको,
क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं|

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,
जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं|

मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने,
उस तरफ़ जाने से क़तराने लगे हैं|

मौलवी से डाँट खा कर अहले-मक़तब,
फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं|

अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम,
आदमी को भूल कर खाने लगे हैं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं!

आज फिर से दुष्यंत कुमार जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक प्रतिनिधि कवि थे लेकिन उनको सामान्य जनता के बीच विशेष ख्याति आपातकाल में लिखी गई गज़लों के कारण मिली थी, जिनको बाद में एक संकलन – ‘साये में धूप’ के रूप में प्रकाशित किया गया|
प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी के इसी संकलन से यह गजल-


नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं,
जरा-सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं|

वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है,
मेरे बयान को बंदिश निगल न जाए कहीं|

यों मुझको ख़ुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन,
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं|

चले हवा तो किवाड़ों को बंद कर लेना,
ये गरम राख़ शरारों में ढल न जाए कहीं|

तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है,
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं|

कभी मचान पे चढ़ने की आरज़ू उभरी,
कभी ये डर कि ये सीढ़ी फिसल न जाए कहीं|

ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते है,
चलो यहां से चलें, हाथ जल न जाए कहीं|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता!

उर्दू के विख्यात शायर निदा फाजली साहब की एक गजल शेयर कर रहा हूँ, निदा साहब बड़ी सहज भाषा में बहुत गहरी बात कह देते हैं| उनकी कुछ पंक्तियाँ जो बरबस याद आ जाती हैं, वे हैं- ‘मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’, ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए’, ‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’|

couple romancing

लीजिए आज उनकी इस गजल का आनंद लेते हैं-

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता,
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता|

सब कुछ तो है, क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें,
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता |

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता|

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता|

वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है ,
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नहीं जाता |

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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कैसा मौसम है ये!

आज हम ऐसे समय में चल रहे हैं जिसकी न किसी ने पहले कल्पना की होगी और निश्चित रूप से किसी ने इसकी कामना तो नहीं ही की होगी| जी हाँ कोरोना की महामारी का यह काल, पूरी मानव जाति को इसने त्रस्त करके रखा है| सब यही सोचते रहते हैं कि कब यह दौर समाप्त होगा, कब हम पहले की तरह अपनी ज़िंदगी जी पाएंगे|


हम पहले फिल्मों आदि में देखते थे कि किसी दूसरे ग्रह के प्राणियों के चेहरे कुछ अलग तरह के होते हैं, या जैसा ‘पेपा पिग’ आदि में हम देखते हैं, आज इंसानों की हालत कुछ वैसी ही हो गई है|


मैं अब गोवा में रहता हूँ (यद्यपि फिलहाल बंगलौर में हूँ)| गोवा जैसे अनेक नगर और राज्य तो ऐसे हैं जिनकी आमदनी का मुख्य स्रोत ही पर्यटन है| लेकिन फिलहाल जहां अर्थव्यवस्था पर अनेक गंभीर संकट आए हैं, वहीं पर्यटन पर तो शायद इस महामारी की मार सबसे ज्यादा पड़ी है|


ऐसे में कवि बिहारी जी की एक सतसई याद आ गई, जिसमें वह प्रेमी नायक द्वारा सिर्फ अपने नयनों से ही की जाने वाली विभिन्न अभिव्यक्तियों का बहुत सुंदर चित्रण कराते हैं –


कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन मैं करत हैं नैननु ही सब बात॥


इस सतसई के प्रसंग को याद करके ये खयाल आया कि जब प्रेमी-प्रेमिका नयनों के माध्यम से ही ये सारे संप्रेषण, ये अभिव्यक्ति करते हैं, तब वे भले ही कोई शब्द न बोलते हों, परंतु उनके होंठ, उनकी नासिका, उनके गाल आदि भी कुछ योगदान उनके इस संप्रेषण में करते हैं, जैसे गालों में गड्ढे पड़ जाना, जैसे कहते हैं सुर्ख लाल हो जाना आदि| मतलब ऐसी बॉडी लैंग्वेज़, जिसका संबद्ध उनके चेहरे से ही है| आज मुह पर मास्क लगाकर, जबकि केवल आँखें ही दिखाई देती हैं, आँखों से ही किया जाने वाला, ये संप्रेषण कुछ और मुश्किल हो जाता न बिहारी जी!


कहते हैं न- ‘बरबादियों का जश्न मनाता चला गया’| तो इस तरह की बातें सोचकर ही हम कोरोना से कह सकते हैं कि ऐसी मुसीबत हमने पहले नहीं देखी है, लेकिन हम मनुष्य, हम भारतवासी इसका सामना करने के लिए तैयार हैं| एक तरह से हमारे सक्रिय जीवन-काल से यह अवधि, शायद कुल मिलाकर 7-8 महीने की, कम हो गई है| हम आशा करते हैं कि तब तक कोरोना वेक्सीन के कारण और हमारे सम्मिलित प्रयासों के बल पर इस दुष्ट दानव का अंत हो जाएगा|


सामाजिकता की सारी गतिविधियों को, सारे आयोजनों को इस दुष्ट महामारी ने ध्वस्त करके रख दिया है| कई ऐसी घटनाएँ हुईं कि जरा सी लापरवाही बहुत महंगी पड़ गई| जैसे एक विवाह में दूल्हा कहीं से बीमारी लेकर आ गया था और वैवाहिक आयोजन के माध्यम से बहुत सारे लोगों को अपने साथ लेकर चला गया| इसलिए इस माहौल में बहुत फूँक-फूँक कर कदम रखने की ज़रूरत है| यह समय बहादुरी दिखाने का बिलकुल नहीं है| कहते हैं न कि ‘दिल की बाज़ी, जो हारा- वही जीता’ इसी तरह इस दुष्ट महामारी का मुक़ाबला धैर्य और सावधानी के साथ करना होगा| इसको चुनौती देने से काम नहीं चलेगा|

यही कामना है कि मानव समुदाय इस संकट पर शीघ्र विजय प्राप्त करे और हम सभी फिर से अपना जीवन पूर्णता के साथ जी सकें| जहां मन हो वहाँ आने-जाने का मौसम फिर से लौटकर आए|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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पुष्पों का विद्यालय – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Flower School’ का भावानुवाद-




गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


पुष्पों का विद्यालय



तूफानी बादल जब आकाश में गरजते हैं और जून माह की वर्षा बौछार धरती पर आती है|
नमी से भरी पुरवाई जब रेतीले मैदानों पर आगे बढ़ती आती है
बांस वनों में अपना मधुर वाद्य बजाने के लिए|


तब अचानक पुष्प टोलियों में प्रकट हो जाते हैं, कोई नहीं जानता कहाँ से
और घास के ऊपर वे जंगली मस्ती में नृत्य करते हैं|
माँ, मुझे वास्तव में ऐसा लगता है की पुष्प किसी भूमिगत विद्यालय में जाते हैं|


बंद दरवाजों के भीतर वे अपने पाठ पढ़ते हैं, और यदि वे चाहते हैं कि
नियत समय से पहले वे बाहर आकर खेलें, तो उनके शिक्षक उनको
किनारे पर खड़ा कर देते हैं|
जब वर्षा आती है, तब उनकी छुट्टियाँ हो जाती हैं|


जंगल में शाखाएँ आपस में उलझ जाती हैं, और पत्तियाँ सरसराती हैं
जंगली हवा के कारण, तूफानी बादल अपने विशाल हाथों से तालियाँ बजाते हैं, और
बालक पुष्प बाहर आते हैं अपने गुलाबी, पीत और श्वेत वस्त्रों में|


क्या तुम जानती हो माँ, उनका घर आकाश में वहाँ है, जहां सितारे हैं|
क्या तुमने यह नहीं देखा कि वे वहाँ जाने के लिए इतने आतुर क्यों हैं? क्या तुम
यह नहीं जानतीं कि वे इतनी जल्दी में क्यों हैं?


बेशक, मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि वे किसकी ओर अपना हाथ उठाते हैं; उनकी भी माँ है, जैसे मेरी है|



-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



The Flower School


When storm-clouds rumble in the sky and June showers come down.
The moist east wind comes marching over the heath to blow its
bagpipes among the bamboos.
Then crowds of flowers come out of a sudden, from nobody knows
where, and dance upon the grass in wild glee.
Mother, I really think the flowers go to school underground.
They do their lessons with doors shut, and if they want to
come out to play before it is time, their master makes them stand
in a corner.
When the rain come they have their holidays.
Branches clash together in the forest, and the leaves rustle
in the wild wind, the thunder-clouds clap their giant hands and the
flower children rush out in dresses of pink and yellow and white.
Do you know, mother, their home is in the sky, where the stars
are.
Haven’t you see how eager they are to get there? Don’t you
know why they are in such a hurry?
Of course, I can guess to whom they raise their arms; they
have their mother as I have my own.


-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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राजा को खबर तक नहीं!

आज मैं पंडित श्रीकृष्ण तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जो मेरे हमनाम हैं (मैं शर्मा हूँ, वे तिवारी हैं), वाराणसी के निवासी हैं और उन्होंने कुछ बहुत सुंदर नवगीत लिखे हैं| मैंने अपनी संस्था के लिए किए गए आयोजनों में से एक में श्री तिवारी जी को बुलाया था जिसमें उन्होंने अपने श्रेष्ठ काव्य पाठ के अलावा बहुत सुंदर संचालन भी किया था|


लीजिए प्रस्तुत है श्री तिवारी जी का यह गीत जो अव्यवस्था, अराजकता और शासन की असफलताओं की ओर इशारा करता है –



भीलों ने बाँट लिए वन,
राजा को खबर तक नहीं|

पाप ने लिया नया जनम
दूध की नदी हुई जहर,
गाँव, नगर धूप की तरह
फैल गई यह नई ख़बर,
रानी हो गई बदचलन
राजा को खबर तक नहीं|

कच्चा मन राजकुंवर का
बेलगाम इस कदर हुआ,
आवारे छोरे के संग
रोज खेलने लगा जुआ,
हार गया दांव पर बहन
राजा को खबर तक नहीं|

उलटे मुंह हवा हो गई
मरा हुआ सांप जी गया,
सूख गए ताल -पोखरे
बादल को सूर्य पी गया,
पानी बिन मर गए हिरन
राजा को खबर तक नहीं|

एक रात काल देवता
परजा को स्वप्न दे गए,
राजमहल खंडहर हुआ
छत्र -मुकुट चोर ले गए,
सिंहासन का हुआ हरण
राजा को खबर तक नहीं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|



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