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सूर्यमुखी का प्रण!

अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में आज यह अंतिम पुरानी रचना है, जो बहुत प्रयास करने पर भी पूरी याद नहीं आ सकी| इसे मैं कुछ जगह इसकी तुरपाई करने के बाद प्रस्तुत कर रहा हूँ|

इस रचना में मैंने जीवन के, दिन के और मौसम के तीन चरणों को एक साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है|

लीजिए प्रस्तुत हैं आज की रचना-

प्रिय तेरा विश्वास लिए मैं कब से सोच रहा हूँ,
सूर्यमुखी के प्रण पर मुझे हँसी किसलिए आई|

बन कागज की नाव, तैरतीं बालक की आशाएं,
इंद्रधनुष के रंग निरूपित करते नव-उपमाएं,
उदित सूर्य की किरणों में बचपन को खोज रहा हूँ,
ताकि कर सकूँ उस सपने की, हल्की सी तुरपाई|

सूरज तपता, धरती तपती, चलतीं गर्म हवाएं,
ताप-ताप संयोग, चैन से कैसे समय बिताएं,
भीतर-बाहर ताप लिए आकुल हो खोज रहा हूँ,
वह आंचल की छाँव जहां यौवन पाए ठंडाई |


धुंधलाया आकाश, धरा अलसाई सी लगती है,
प्रकृति ठिठुरती किन्तु सूर्य को जाने की जल्दी है,
तुलसी की मंजरियों में, स्मृतियों को सूंघ रहा हूँ,
ताकि पा सकूं बीते कल की हल्की सी परछाईं|


सूर्यमुखी के प्रण पर मुझको हँसी किसलिए आई||

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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टोले के कवि!

मैं पिछले दिनों (फ़ेसबुक पर) अपनी पुरानी कुछ कविताएं शेयर कर रहा था, परंतु आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ, वह पुराना नहीं, अभी का है|

एक पुरानी घटना याद आ रही है, मैं उस समय अपने संस्थान के लिए कवि-सम्मेलन आयोजित करता था| उस समय मंच के एक कवि थे- निर्भय हाथरसी, वे इतने लोकप्रिय थे कि उनके रहते अन्य कवि मंच पर जम नहीं पाते थे|

उस समय एक कवि ने मुझे पत्र लिखकर कहा कि अगर आप निर्भय हाथरसी जी को बुलाएंगे तो ये 100 से ज्यादा कवि नहीं आएंगे, और उन्होंने कवियों की एक लंबी सूची भेजी थी|

बस कवियों की यह असुरक्षा की भावना याद आई और कुछ अनुभव याद आ गए और ये गीत प्रकट हो गया|

लीजिए यह गीत प्रस्तुत है-

टोले के कवि हो तुम, बाहर मत झांकना!

मिल-जुलकर हम सबको ऊपर उठना है,
एक दूसरे की प्रशस्ति सदा करना है|
मुश्किल पहचान बनाना सबको अपनी,
इसके लिए भी अभियान एक चलना है|

यदि बाहर की रचना भा जाए तब भी,
आँख मूंदकर हम सबको आगे बढ़ना है|
टोले के कवि हैं, सबके उद्धारक नहीं,
अपना ही कीर्ति-ध्वज हमें ऊंचा करना है|

यह टोला हमसे, हम सब हैं इस टोले से,
और भी कुछ है तो, जो उसमें हैं वह जानें,
हमको मिल-जुलकर अपनी जड़ें जमानी हैं,
और किसी का तो उल्लेख नहीं करना है|

कविता का जो होगा, वह खुद हो जाएगा,
हमको बाहर अपना पाँव नहीं धरना है,
मिल-जुलकर जब हम बन जाएंगे महाकवि,
तब बाहर का कोई विचार हमें करना है|

यह है कवियों का सहकारी आंदोलन,
किसी तरह भी इसको क्षीण नहीं करना है|
सब मिल अंधे, लंगड़े, बहरे ज्यों साथ बढ़ें,
इस कथा को भी यथार्थ हमें करना है|

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’



आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते!

अकबर इलाहाबादी साहब एक महान शायर थे जिन्होंने मजाहिया से लेकर गंभीर तक, सभी प्रकार की शायरी की है| जैसे- ‘क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ’ से लेकर ‘हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है’ तक|

लीजिए आज प्रस्तुत है, अकबर इलाहाबादी साहब की यह ग़ज़ल–

आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते,
अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते
|

ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते,
सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते|

किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल,
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते|

परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले,
क्यों हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते|

हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना,
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते|

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त,
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते|

गर्मी-ए-मोहब्बत में वो है आह से माने,
पंखा नफ़स-ए-सर्द का झलने नहीं देते|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार

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टूटा पहिया!

मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत !



क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !



अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज़ को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें
तब मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !


मैं रथ का टूटा पहिया हूँ|


लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार

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तुम प्राणों की अगन हरो तो!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

एक बार फिर से आज मैं हिन्दी के दुलारे गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक प्रेम की गहनता और पवित्रता से भरा गीत शेयर कर रहा हूँ| भावुकता और समर्पण वैसे तो जीवन में कठिनाई से ही कहीं काम आते हैं, आजकल बहुत कम मिलते हैं इनको समझने वाले, परंतु कवि-गीतकारों के लिए तो यह बहुत बड़ी पूंजी होती है, अनेक गीत इनके कारण ही जन्म लेते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है भारत भूषण जी का यह खूबसूरत गीत-

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ
प्रिय मिलने का वचन भरो तो !
पलकों-पलकों शूल बुहारूँ
अँसुअन सींचू सौरभ गलियाँ,
भँवरों पर पहरा बिठला दूँ
कहीं न जूठी कर दें कलियाँ|
फूट पड़े पतझर से लाली
तुम अरुणारे चरन धरो तो !
रात न मेरी दूध नहाई
प्रात न मेरा फूलों वाला,
तार-तार हो गया निमोही
काया का रंगीन दुशाला|
जीवन सिंदूरी हो जाए
तुम चितवन की किरन करो तो !
सूरज को अधरों पर धर लूँ
काजल कर आँजूँ अँधियारी,
युग-युग के पल छिन गिन-गिनकर
बाट निहारूँ प्राण तुम्हारी|
साँसों की जंज़ीरें तोड़ूँ
तुम प्राणों की अगन हरो तो|


इस गीत के साथ मैं उस महान गीतकार का विनम्र स्मरण करता हूँ।

नमस्कार
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अखबारवाला!

श्री रघुवीर सहाय जी अपने समय के एक श्रेष्ठ कवि रहे हैं, बेबाक अंदाज़ में अपनी बात कहते थे, टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ जिसे अज्ञेय जी ने शुरू किया था, उनके बाद उसके संपादक रघुवीर सहाय जी बने थे| खबरों के विश्लेषण के मामले में ‘दिनमान’ का अपना विशेष स्थान था|


रघुवीर सहाय जी के अनेक कविता संकलन प्रकाशित हुए हैं और उन्हें अनेक सम्मानों से विभूषित किया गया था|

लीजिए आज रघुवीर सहाय जी की यह कविता प्रस्तुत है –

धधकती धूप में रामू खड़ा है
खड़ा भुलभुल में बदलता पाँव रह रह
बेचता अख़बार जिसमें बड़े सौदे हो रहे हैं ।

एक प्रति पर पाँच पैसे कमीशन है,
और कम पर भी उसे वह बेच सकता है
अगर हम तरस खायें, पाँच रूपये दें
अगर ख़ैरात वह ले ले ।

लगी पूँजी हमारी है छपाई-कल हमारी है
ख़बर हमको पता है, हमारा आतंक है,
हमने बनाई है
यहाँ चलती सड़क पर इस ख़बर को हम ख़रीदें क्यो ?

कमाई पाँच दस अख़बार भर की क्यों न जाने दें ?

वहाँ जब छाँह में रामू दुआएँ दे रहा होगा
ख़बर वातानुकूलित कक्ष में तय कर रही होगी
करेगी कौन रामू के तले की भूमि पर कब्ज़ा ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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जितनी गठरी भारी होगी!

आज हिन्दी मंचों और फिल्मों के लाडले गीतकार स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी के गीतों में अक्सर दर्शन भी शामिल होता है, जैसे इस गीत में भरपूर है|



लीजिए आज नीरज जी का यह सुंदर गीत प्रस्तुत है –

जितना कम सामान रहेगा,
उतना सफ़र आसान रहेगा|

जितनी भारी गठरी होगी,
उतना तू हैरान रहेगा|

उससे मिलना नामुमक़िन है,
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा|

हाथ मिलें और दिल न मिलें,
ऐसे में नुक़सान रहेगा|

जब तक मंदिर और मस्जिद हैं,
मुश्क़िल में इंसान रहेगा|

‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा,
उसका गीत-विधान रहेगा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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कल फिर सुबह नई होगी!

माननीय रामदरश मिश्र जी ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने साहित्य की लगभग हर विधा में लिखा है| अनेक सम्मानों से विभूषित रामदरश जी ने आम आदमी की स्थितियों का चित्रण बड़ी बारीकी से किया है|

लीजिए आज मैं रामदरश जी का यह आशावादी गीत शेयर कर रहा हूँ –

दिन को ही हो गई रात-सी, लगता कालजयी होगी
कविता बोली- “मत उदास हो, कल फिर सुबह नई होगी।”

गली-गली कूड़ा बटोरता, देखो बचपन बेचारा
टूटे हुए ख्वाब लादे, फिरता यौवन का बनजारा
कहीं बुढ़ापे की तनहाई, करती दई-दई होगी!

जलती हुई हवाएँ मार रही हैं चाँटे पर चाँटा
लेट गया है खेतों ऊपर यह जलता-सा सन्नाटा
फिर भी लगता है कहीं पर श्याम घटा उनई होगी!


सोया है दुर्गम भविष्य चट्टान सरीखा दूर तलक
जाना है उस पार मगर आँखें रुक जाती हैं थक-थक
खोजो यारो, सूने में भी कोई राह गई होगी!

टूटे तारों से हिलते हैं यहाँ-वहाँ रिश्ते-नाते
शब्द ठहर जाते सहसा इक-दूजे में आते-जाते
फिर भी जाने क्यों लगता- कल धरती छंदमयी होगी!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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हम सिगार से जला किए!

आज स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने बड़े खूबसूरत तरीके से कहा है कि किस प्रकार ज़िंदगी ने हमारी हालत, राखदान में पड़े सिगार जैसी कर दी है| राखदान में सुलगता सिगार, जो मदिरा पान, संगीत और राजनैतिक गतिविधियों तथा बहस आदि का भी साक्षी बनता है|

लीजिए आज कुमार शिव जी की इस रचना का आनंद लेते हैं-

राखदान में पड़े हुए
हम सिगार से जला किए ।

उँगलियों में दाबकर हमें
ज़िन्दगी ने होंठ से छुआ
कशमश में एक कश लिया
ढेर सा उगल दिया धुआँ


लोग मेज़ पर झुके हुए
आँख बाँह से मला किए ।

बुझ गए अगर पड़े-पड़े
तीलियों ने मुख झुलस दिया
फूँक गई त्रासदी कभी
और कभी दर्द ने पिया


झण्डियाँ उछालते हुए
दिन जुलूस में चला किए ।

बोतलों-गिलास की खनक
आसपास से गुज़र गई
बज उठे सितार वायलिन
इक उदास धुन बिखर गई
|

राख को उछालते रहे
हम बुलन्द हौसला किए ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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तनहाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ!

सूर्यभानु गुप्त जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| सूर्यभानु जी की ग़ज़लों में वह चमत्कार अक्सर शामिल होता है, जिसकी अच्छी कविता से उम्मीद की जाती है|

उनकी एक बहुत खूबसूरत ग़ज़ल जो मैंने पहले शेयर की है, उसका एक शेर दोहराना चाहूँगा-

एक अच्छा शेर कह के मुझको ये महसूस हुआ,
बहुत दिनों के लिए, फिर से मर गया हूँ मैं|


अभिव्यक्ति की ईमानदारी और प्रभाविता के लिए प्रतिबद्ध शायर ही यह बात कह सकता है|
लीजिए आज सूर्यभानु गुप्त जी की इस ग़ज़ल का आनंद लेते हैं-

हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ,
मैं भी किसी क़मीज़ के कॉलर का रंग हूँ|

मोहरा सियासतों का, मेरा नाम आदमी,
मेरा वुजूद क्या है, ख़लाओं की जंग हूँ|

रिश्ते गुज़र रहे हैं लिए दिन में बत्तियाँ,
मैं बीसवीं सदी की अँधेरी सुरंग हूँ|

निकला हूँ इक नदी-सा समन्दर को ढूँढ़ने,
कुछ दूर कश्तियों के अभी संग-संग हूँ|


माँझा कोई यक़ीन के क़ाबिल नहीं रहा,
तनहाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ|

ये किसका दस्तख़त है, बताए कोई मुझे,
मैं अपना नाम लिख के अँगूठे-सा दंग हूँ |


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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